मुख्तार अंसारी की क्राइम हिस्ट्री, परिवार के कहने पर चलता तो नहीं बनता पूर्वांचल का सबसे बड़ा डॉन

Author :- RAJESH SAHU

– कौन है मुख्तार अंसारी?
– एक स्वतंत्रता सेनानी का पौत्र कैसे बन गया डॉन?
– गरीबों का मसीहा या सबसे बड़ा अपराधी?
– रास्ते में नहीं तो क्या जेल में होगी मुख्तार की हत्या?
– क्या कोर्ट और जांच एजेंसियां उसे नहीं दिलवा सकती सजा?


इन सभी सवालों के जवाब आज के इस आर्टिकल में हम विस्तार से बताएंगे। वेब सीरीज मिर्जापुर देखी होगी आपने। कालीन भैया को भी जानते होंगे। उनका धंधा, उनका रुतबा और उनका अपराध सबकुछ एकदम टॉप लेवल का हुआ करता था। कब किसे गोली मार दें, कब किसको धंधा सौंपकर राजा बना दे सबकुछ कालीन भैया के मूड पर डिपेंड करता था। जिधर गुजरते इलाका के लोग खड़े होकर सलामी देते।  कालीन फिल्मी कैरेक्टर है। लेकिन मुख्तार अंसारी रियल कालीन भैया हैं। वैसे यहां थे भी कहा जा सकता है। जिधर से गुजरते थे उधर समर्थक दौड़ पड़ते थे, विरोधी घरों में घुस जाते थे। 18 लोगों की हत्याओं का केस चल रहा। 10 मुकदमे हत्या के प्रयास के चल रहे। गैंगस्टर एक्ट, टाडा, एनएसए, आर्म्स एक्ट व मकोका ऐक्ट भी लगा हुआ है। अपराध की दुनिया के सारे केस लगने के बावजूद मुख्तार पूर्वांचल के एक बड़े हिस्से में पूजे जाते हैं। उनके लिए इबादत की जाती है। ऐसा क्यों है हम इसे समझने की कोशिश करते हैं। 


मुख्तार का परिवार 

महात्मा गांधी जब देश की आजादी के लिए आंदोलन कर रहे थे उस वक्त मुख्तार अहमद अंसारी भी उनके साथ संघर्ष कर रहे थे। अहमद अंसारी कांग्रेस के दिग्गज नेता थे। न सिर्फ नेता बल्कि 1926-27 के दौरान कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। ये कोई और नहीं बल्कि डॉन मुख्तार अंसारी के दादा थे। आजादी के महासंग्राम में सेना की तरफ से ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान लड़ाई लड़ रहे थे। जब देश आजाद हुुआ तो उस्मान को पाकिस्तानी सेना में शामिल होने का प्रस्ताव आया उसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया। कहा- लड़ा है इस देश के लिए तो मरेंगे भी इस देश के लिए। 1948 में वह शहीद हो गए। मरणोपरांत उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। 

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ब्रिगेडियर उस्मान डॉन मुख्तार अंसारी के नाना थे। मुख्तार के पिता सुभानउल्ला अंसारी सादगी पसंद व्यक्ति थे। कांग्रेस के नेता थे, मऊ समेत आसपास के जिलों में बड़ा सम्मान था। नगर पालिका के चुनाव में उतरे तो बाकी सारे प्रत्याशियों ने इनके सम्मान में अपना नाम  वापस ले लिया। मुख्तार अंसारी के चाचा हामिद अंसारी देश के दो बार उपराष्ट्रपति रहे। अब आप देखिए। दादा ने महात्मा गांधी के साथ देश की लड़ाई लड़ी। नाना ने देश के लिए सेना की तरफ से दुश्मनों से लड़ा। पिता चुनाव में खड़े हुए तो बाकी लोग बैठ गए। चाचा देश में दो बार उप राष्ट्रपति रहे। इतने सम्पन्न परिवार से होने के बाद भी आखिर मुख्तार ने अपराध की दुनिया को क्यों चुना। क्या उसकी कोई मजबूरी थी या फिर हल्के मूड में आया और बाद में अपराध में ही मन लग गया। 

पूर्वांचल में विकास की शुरुआत

अस्सी के दशक में यूपी की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने एवं भारत सरकार ने पूर्वांचल का कायाकल्प करने के लिए तमाम योजनाओं की शुरुआत की। योजनाएं आई तो ठेकेदार भी सामने आने लगे। सरकारी ठेका हथियाने के लिए जितनी दबंगई इस वक्त चलती है ठीक वही दबंगई उस वक्त भी चलती थी। पूर्वांचल में दो गैंग थी। पहली मकनु सिंह की गैंग दूसरी साहिब सिंह की गैंग। नौजवान मुख्तार अंसारी अपने कॉलेज दोस्त साधु सिंह के साथ मकनु सिंह गैंग से था। मऊ जिले के ही सैदपुर में दोनो गैंग की ठेके संबंधित विवाद को लेकर भिड़ंत हुई यहीं से दोनो की राहें एकदम अलग हो गई। साहिब सिंह गैंग का सबसे खतरनाक खिलाड़ी था ब्रजेश सिंह। लेकिन इस विवाद के बाद उसने उस गैंग को छोड़ अपनी गैंग बना ली। ध्यान रहे उस वक्त ब्रजेश और मुख्तार में किसी तरह का कोई विवाद नहीं था लेकिन दो दशक बाद दोनो एकदूसरे के खून के प्यासे हो गए। कहानी आगे बताने से पहले ब्रजेश का बैकग्राउंड जानना जरूरी है। 

ब्रजेश का क्राइम की दुनिया में आगाज 

ब्रजेश एक होनहार लड़का था। पढ़ाई से उसे फुर्सत ही नहीं मिलती।  इंटरमीडिएट फर्स्ट डिवीजन से पास करने के बाद सिंचाई विभाग में कार्यरत  पिता रविंदर सिंह ने ब्रजेश को बनारस के यूपी कॉलेज में बीएससी में दाखिला दिलवा दिया। ब्रजेश बनारस में था तभी पता चला कि उसके पिता की स्थानीय गुंडे पांचू ने चाकू मारकर हत्या कर दी। यहां से उसका पढा़ई से मोहभंग हो गया। चूंकि पांचू गांव का ही था तो एकदिन ब्रजेश उसके घर गया. पांचू के पिता का पैर छुआ, साल भेंट की और पिस्टल निकाल कर गोली मार दी। इसी के साथ ब्रजेश का अपराध की दुनिया में श्रीगणेश हो गया। ब्रजेश के पिता की हत्या में ग्राम प्रधान ऱघुनाथ यादव भी शामिल था, एकदिन कचहरी में मामले की सुनवाई चल रही थी, ब्रजेश एके-47 के साथ वहां पहुंचा और भरी कचहरी में रघुनाथ को गोलियों से छलनी कर दिया। न सिर्फ पूर्वांचल में बल्कि पूरे यूपी में एके-४७ से हत्या का ये पहला मामला था। इसके बाद ब्रजेश पूर्वांचल का एक नामी डॉन बन गया। लोगो को जोड़ा और बना लिया गिरोह.  


मुख्तार एवं ब्रजेश में विवाद की शुरुआत 

ब्रजेश और मुख्तार के बीच यहां तक कोई खास विवाद नहीं था। लेकिन गैंग बढ़ाते-बढ़ाते ब्रजेश ने अपनी टीम में त्रिभुवन सिंह को शामिल कर लिया। त्रिभुवन उस वक्त मुख्तार का दुश्मन हुआ करता था। मुख्तार का दुश्मन, ब्रजेश का दोस्त। त्रिभुवन का दोस्त मुख्तार का दुश्मन। यहीं से शुरु होती है वर्चस्व की जंग। रेलवे का ठेका हो या शराब का। किडनैपिंग का मामला हो या फिर हत्याओं का। हम मामलें में दोनो ही एक दूसरे को पछाड़ने में लगे थे। साल 1988 में मंडी परिषद के ठेकेदार सच्चिदानंद की हत्या कर दी गई। इस हत्या में नाम आया मुख्तार अंसारी का और साधु सिंह का। पुलिस खोजती रही लेकिन दोनो को खोज नहीं पाई। इसी दौरान बनारस पुलिस लाइन में कॉस्टेबल पद पर तैनात राजेंद्र सिंह की हत्या कर दी गई। एकबार फिर से केस दर्ज हुआ मुख्तार अंसारी और साधु सिंह के खिलाफ। इस घटना ने ब्रजेश के खून को खौलाकर कर दिया। 

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इस मामले में पुलिस ने साधु सिंह को गिरफ्तार किया। जब वह जेल में था तब उसकी पत्नी को अस्पताल में बच्चा हुआ। साधु सिंह पुलिस टीम के साथ पत्नी और बच्चों को देखने अस्पताल पहुंचा। पुलिस की वर्दी पहने व्यक्ति ने साधु सिंह पर गोली चलाई और अस्पताल के भीतर ही उसकी हत्या कर दी। जिस दिन ये हत्या हुई उस दिन साधु सिंह के गांव में उसकी मां एवं भाई समेत परिवार के आठ लोगों की निर्मम हत्या कर दी गई। बताया जाता है कि पुलिस की वर्दी में आया हत्यारा कोई और नहीं बल्कि ब्रजेश सिंह ही था। साधु सिंह की हत्या के बाद लगा कि मुख्तार कमजोर हो जाएगा। हुआ भी। बताया जाता है कि पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया लेकिन तभी दो पुलिस वालों को गोली लगी और वह फरार हो गया। 

गैंग्स ऑफ वासेपुर स्टाइल में मुठभेड़

ब्रजेेश और मुख्तार के बीच अब खुली जंग छिड़ गई थी। एकदम गैंग्स ऑफ वासेपुर की तरह। छोटी मोटी मुठभेड़ लगातार होने लगी। कभी इस पक्ष का एक गुर्गा मारा जाता तो कभी उस पक्ष का। कभी बड़ी मुठभेड़ हुई तो एक साथ तीन-चार गुर्गे भी मार दिए गए। इस दौरान पुलिस लाशे उठाने व पोस्टमार्टम करवाने के लिए थी। कहीं भी छापेमारी करने से पहले पता करती कि उक्त बदमाश किस गैंग का है। अगर ब्रजेश या मुख्तार गैंग का होता तो वह बचने की कोशिश करती। अगर जाती भी तो बड़े दल बल के साथ। ये सब चल ही रहा था कि मुख्तार को राजनीति का चस्का लगा। उसने मऊ विधानसभा से चुनाव लड़ने का फैसला किया। अब चूंकि उसका रसूख इस लेवल पर था कि कोई पार्टी टिकट देने से मना ही नहीं कर सकती थी। सो मायावती ने भरोसा जताया और उसे प्रत्याशी बना दिया।

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मुख्तार ने भाजपा के विजय प्रताप सिंह को करीब 26 हजार वोटों से हरा दिया। यहां से मुख्तार की शक्ति में बेहिसाब इजाफा हो गया। जितनी उसकी शक्ति बढ़ी उतनी ही ब्रजेश की कम हो गई। अब ठेका लेने और दिलवाने में मुख्तार को किसी तरह की कोई मुश्किल नहीं होती थी। चुनाव जीतने के बाद मुख्तार की छवि को रॉविनहुड में बदलने की कोशिश की जाने लगी। किसी की बेटी की शादी है तो आओ पैसा ले जाओ। किसी की तेरहवीं करनी है तो आओ पैसा ले जाओ। कचहरी में कोई काम रुका है तो फोन कर देते। यहां तक कि अगर कोई दूल्हा दहेज के लिए शादी से इंकार कर देता तो उसे भी उठवा लिया जाता था और उसकी शादी करवा दी जाती थी। ब्रजेश इन सबके बीच बदला लेने का मौका खोजता रहा। उसने तरीका बदला और राजनीति के जरिए ही पूर्वांचल के नए नवेले रॉबिनहुड को चुनौती देना तय किया। 

कृष्णानंद राय की हत्या

गाजीपुर जिले की एक सीट है मोहम्मदाबाद। कहा जाता है कि यहां की राजनीति फाटक के अंदर शुरु होती है और वहीं खत्म होती है। इसी फाटक के पीछे लगता था मुख्तार अंसारी एवं उनके भाई अफजाल अंसारी का दरबार। ध्यान रहे मोहम्मदाबाद ही मुख्तार का पैतृक निवास है। 1985 से इस सीट पर अंसारी परिवार का ही कब्जा था। साल 2002 में अंसारी परिवार के अजेय रथ को रोकते हुए भाजपा नेता कृष्णानंद राय ने जीत दर्ज की। कृष्णानंद ने अफजाल अंसारी को करीब 8 हजार वोटों से हराया। इस हार से मुख्तार अंसारी तिलमिला गया। इस तिलमिलाहट के दो कारण थे। या कहें दो शिकस्त थी एक चुनाव की दूसरी हमले की। साल 2001 में मुख्तार अंसारी के काफिले पर जोरदार हमला हुआ था। हालांकि मुख्तार को पहले खबर हो गई थी कि उसपर हमला हो सकता है इसलिए वह आगे वाली गाड़ी पर नहीं बैठा। उस हमले में मुख्तार के तीन लोग मारे गए थे। चुनाव हारने के बाद ये बदला लेने की कसक बढ़ गई। 

25 नवंबर 2005 का दिन था। विधायक कृष्णानंद पास के ही गांव में एक क्रिकेट टूर्नामेंट का उद्धाटन करने जा रहे थे। चूंकि पास के ही गांव में जाना था इसलिए उन्होंने अपनी बुलेट प्रूफ गाड़ी निकालने के बजाय नार्मल गाड़ी ही निकाली। क्रिकेट टूर्नामेंट का उद्धाटन करके वहां से निकले ही थे की भांवरकोल की बसनिया पुलिस के पास सामने से एक सिल्वर ग्रे कलर की एसयूपी आकर खड़ी हो गई। विधायक कुछ समझ पाते उसके पहले ही एसयूवी से सात-आठ लोग उतरे और विधायक की गाड़ी पर फायरिंग झोक दी। फायरिंग किसी पिस्टल,कट्टा या रिवाल्वर से नहीं बल्कि एके-47 से हो रही थी। शरीर के साथ साथ पूरी गाड़ी छलनी हो गई। मौत का ये खेल काफी देर चला। कम से कम 500 राउंड फायर हुए। गुुंडो को भरोसा हो गया कि विधायक समेत सात लोग मर चुके हैं तब वह वहां से निकले। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आई तो पता चला सात लोगों की बॉडी से 67 गोलियां मिली हैं। असल में ये सिर्फ एक हत्याकांड नहीं था बल्कि एक संदेश देने की कोशिश थी कि भाई से पंगा लेने पर ऐसी सजा मिलेगी की कलेजा कांप जाएगा। 

इस हत्याकांड में विधायक कृष्णानंद राय के साथ पूर्व ब्लाक प्रमुख श्याम शंकर राय, भांवरकोल ब्लाक के मंडल अध्यक्ष रमेश राय, अखिलेश राय, शेषनाथ पटेल, मुन्ना यादव एवं उनके अंगरक्षक निर्भय नारायण उपाध्याय की हत्या की गई। इस हत्याकांड के बाद पूरा पूर्वांचल दहल उठा। विधायक के लोगों ने जमकर तोड़फोड़ एवं आगजनी की। विधायक की पत्नी अलका राय ने पति की हत्या के आरोप में बाहुबली मुख्तार अंसारी, अफजाल अंसारी, माफिया डॉन मुन्ना बजरंगी, अताहर रहमान उर्फ बाबू, संजीव महेश्वरी उर्फ जीवा। फिरदौस एवं राकेश पांडेय पर मुकदमा दर्ज हुआ। चूंकि मामला हाई प्रोफाइल था इसलिए जिले के एसपी तक जांच करने से कतरा रहे थे। अलका राय सीबीआई जांच की मांग कर रही थी, सीबीआई भी इस केस को नहीं लेना चाहती थी। केस लिया तो कुछ दिन बाद दबाव बढ़ गया और उसने केस छोड़ दिया। अलका राय के दोबारा केस दर्ज करवाया और जांच शुरु हुई। लेकिन एक साल बाद ही इस घटना के एक मात्र चश्मदीद गवाह शशिकांत राय की रहस्यमय तरीके से मौत हो गई। बताया जाता है कि शशिकांत की भी हत्या की गई लेकिन जो अखबारों में जो खबर आई उसमें आत्महत्या करार दिया गया। इस तरह से न्याय की आखिरी उम्मीद भी खत्म हो गई। मुख्तार के खिलाफ जांच चली, सबूतों के अभाव में सभी बाइज्जत बरी हो गए। 


ब्रजेश की दोबारा वापसी

कृष्णानंद हत्याकांड में मुख्तार बरी जरूर हो गया लेकिन पिछले तमाम अपराधिक मामलों के चलते वह जेल में ही रहा। इसी बीच खबर 2008 में ओडिशा से ब्रजेश सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया गया। पहले बताया जा रहा था कि ब्रजेश सिंह भी मारा जा चुका है। लेकिन ऐसा नहीं था, ब्रजेश को जेल हुई तो वह जेल के भीतर से ही मानव समाज पार्टी में शामिल हो गया। चूंकि प्रदेश में बसपा की सरकार थी तो मुख्तार ने भी जेल के भीतर से ही बसपा का दामन थाम लिया। बसपा ने अंसारी की छवि को रॉबिनहुड बनाने पर जोर दिया। मायावती ने मंच से ही मुख्तार अंसारी को गरीबों को मसीहा बन दिया। 

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2009 में बसपा ने मुख्तार को वाराणसी से लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी बना दिया। चुनाव हुआ और मुख्तार महज 17 हजार वोटों से हार गया। अजब ये कि इस चुनाव को मुख्तार ने जेल से ही हैंडल किया। पुलिस ने एकबार गाजीपुर की जेल में छापेमारी की तो पता चला कि मुख्तार की जिंदगी बाहर से भी ज्यादा आलीशान है। उसके लिए खाना बनाने वाले अलग से हैं। कमरे में टीवी, फ्रिज मौजूद है। प्रशासन हरकत में आया और उसने मुख्तार को गाजीपुर जेल से मथुरा जेल भेज दिया। जेल बदली लेकिन सुविधाओं में कोई कमी नहीं आई। मथुरा से कभी बांदा भेजा गया तो कभी फिर से गाजीपुर लौट आया। 

सियासत और हत्या का क्रम जारी

राजनीति में नाम स्थापित करने के बाद भी मुख्तार की फितरत नहीं बदली। साल 2009 में एक कैटेगरी के बड़े ठेकेदार अजय प्रकाश सिंह उर्फ मन्ना की बाइक सवार बदमाशों ने दिनदहाड़े एके-47 से भून दिया। इस हत्याकांड का आरोप मुख्तार पर लगा। चूंकि मन्ना का मुनीम राम सिंह मौर्य इस मामले का चश्मदीद गवाह था, उसकी सुरक्षा को खतरा था इसलिए उसे एक गनर मिला था। साल भर के भीतर ही गाजीपुर के आरटीओ ऑफिस के पास मुनीम राम सिंह मौर्य और गनर सतीश को भी मौत के घाट उतार दिया गया। इस मामले में मुख्तार अंसारी मुख्य आरोपी हैं. पुलिस चार्जशीट भी दायर कर चुकी है, उम्मीद है कि अगले तीन-चार महीने में कोर्ट का फैसला आ जाए। 

मुख्तार पिछले करीब 14 सालों से यूपी की अलग-अलग जेलों में बंद है। 2018 में जब वह बांदा जेल में बंद था तो उसे हार्ट अटैक आया। तत्काल अस्पताल ले जाया गया जहां इलाज के बाद स्थिति समान्य हुई और दोबारा जेल भेज दिया गया। इसी दौरान मुख्तार की पत्नी अफ्सा अंसारी को भी हार्ट अटैक आया। वसूली के एक मामले में पंजाब पुलिस ने मुख्तार को हिरासत में ले लिया। जनवरी 2019 से वह पंजाब के रूप नगर जिले के रोपड़ जेल में बंद था। कोर्ट की अनुमति मिलने के बाद एकबार फिर से उसे यूपी के बांदा जेल में लाया गया है। तमाम लोग दुआएं कर रहे थे कि यूपी पुलिस एनकाउंटर कर दे तो बढ़िया रहे। असल में ऐसे लोगों को दुआओं का मतलब भी नहीं पता, दुआओं से इंसान की उम्र बढ़ती है मौत नहीं होती। 

बिना राजनीतिक संरक्षण के नहीं बना इतना 

मुख्तार बिना राजनीतिक संरक्षण के इतना बड़ा अपराधी नहीं बन सकता था। ये बात वह भी जानता था इसलिए उसने समय समय पर पार्टियों को बदला। सबसे अधिक संरक्षण उसे बसपा की सरकार ने दिया। मायावती का हाथ मुख्तार के सिर पर था। मुख्तार की सपा से नजदीकी बढ़ी भी तो उसे मायावती ने जल्दी से हाथ बढ़ाकर अपनी तरफ खींच लिया। शायद आपको पता हो कि मुख्तार ने तीन भाईयों के साथ कौमी एकता दल बनाई, उसका विलय सपा में करना चाहा तो अखिलेश यादव ने साफ मना कर दिया। इसके लिए चाचा शिवपाल से विवाद भी कर लिया लेकिन मुख्तार की पार्टी को अपने आप से दूर ही रखा। 

मऊ, गाजीपुर, जौनपुर व बनारस में मुख्तार अंसारी के नाम का असर है। घुमा के कहें तो मुख्तार पूर्वांचल का एक बरगद है। जिसकी वजह से दूसरा कोई नाम बढ़ ही नहीं पाया। यही कारण है कि राजनीतिक पार्टियां जब भी पूर्वांचल में बढ़त का सोचती हैं वह मुख्तार के कंधे को चुनती हैं। मुख्तार का अपराध पार्टियों के लिए मायने नहीं रखता। फिलहाल मुख्तार इस समय व्हील चेयर पर है। बांदा जेल में है। परिवार को मुख्तार की जान की फिक्र है। भाई एवं सांसद अफजाल को लगता है कि योगी सरकार में उनका भाई जेल में भी सुरक्षित नहीं है। वहीं जेल प्रशासन पूरी सुरक्षा की बात कर रहा है। फिलहाल हम उम्मीद करेंगे की जेल के भीतर कोई अनहोनी न हो। देश में सजा देने के लिए कानून है। 



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युवाओं के भविष्य को अंधकार में डाल रही मोदी सरकार, हरियाणा-पंजाब में रोजगार की स्थिति बद से बदतर- अनुपम

‘युवा हल्ला बोल’ के राष्ट्रीय संयोजक सह युवा नेता अनुपम रविवार को हरियाणा, पंजाब एवं चंडीगढ़ की सरकार के साथ-साथ केंद्र सरकार पर हमलावर रहे। बेहद आक्रोश के साथ कहा की युवाओं का भविष्य अंधकार में डाला जा रहा है। युवाओं को डिग्री प्राप्त करने के बाद भी रोजगार नहीं मिल रही है जो की अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। ‘युवा हल्ला बोल’ देश के अन्य राज्यों के साथ साथ हरियाणा, पंजाब एवं चंडीगढ़ के युवाओं को भी रोजगार दिलाने के लिए आवाज़ बुलंद करेगी। इसमें मुख्य रूप से सरकारी भर्तियों में हो रही देरी, नौकरियों में कटौती और रोज़गार के सवाल पर अभ्यर्थियों के साथ चर्चा की जाएगी।

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संगठन द्वारा देश के बड़े शहरों सहित राज्यों की राजधानी में युवा महापंचायत का आयोजन चल रहा है। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में 27 अप्रैल को कार्यक्रम होने जा रही है। जबकि राजधानी दिल्ली में 14 अप्रैल के कार्यक्रम के लिए प्रशासन से अनुमति की प्रक्रिया चल रही है। कई विभागों में रिक्तियों के बावजूद सरकार बहाली को लेकर गंभीर नहीं दिख रही। अगर कोई बहाली आती भी है तो वो समय पर पूरी नहीं होती है। जिससे की अभ्यर्थियों के युवावस्था का मुख्य समय बर्बाद हो जाता है। युवा नेता अनुपम ने आगे कहा कि जब देश में सफल चुनाव आयोजित करवाने के लिए चुनाव आचार संहिता हो सकती है तो फिर भर्ती पूरी करने के लिए भर्ती आचार संहिता क्यों नहीं हो सकती। इसके लिए सरकार को ‘मॉडल एग्जाम कोड’ लागू करना चाहिए ताकि अधिकतम 9 महीने में कोई भी भर्ती पूरी की जा सके। हाल के वर्षों का ट्रेंड देखें तो रिक्तियों में लगातार कटौती की जा रही है। आए दिन बेरोजगार अभ्यर्थियों की आत्महत्या की बातें सुनने को मिलती है जो की देश एवं समाज के लिए चिंताजनक है। अनुपम ने सरकारी उपक्रमों को निजी हाथों में सौंपने को लेकर केंद्र सरकार पर जमकर निशाना साधा।

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साथ ही उन्होंने युवाओं से अपील की है कि अगर सरकारी नौकरी लेना है तो निजीकरण का भी विरोध करना होगा। अगर सरकार इसी तरह सब कुछ बेचती चली गयी तो जॉब सिक्योरिटी, सम्मानित आय सहित कई तरह की समस्याएं भी उत्पन्न हो जाएंगी।

source link: https://www.molitics.in/article/812/modi-government-is-compromising-with-youth-future-employment-situation-in-haryana-punjab-is-worst-says-anupam

असम में भाजपा प्रत्याशी की गाड़ी में EVM खुद ही जाकर बैठी या किडनैप हुई?

असम में भाजपा और ईवीएम के पुराने रिश्ते की एक नई कहानी सामने आई है। इस कहानी में चुनाव आयोग फूफा बनकर अपना पक्ष रखने आए लेकिन अब फंस गए हैं। ऐसे फंसे की लोग मजे लेने लगे। अब चुनाव आयोग को गुस्सा आ जाए उससे पहले ये पूरा मामला जान लीजिए। 

1 अप्रैल को असम में दूसरे चारण की वोटिंग हुई। शाम को पथरकंडी विधानसभा से भाजपा प्रत्याशी कृष्णेंदु पॉल की कार में ईवीएम मिली। इस मामले से जुड़ा वीडियो जैसे ही सोशल मीडिया पर वायरल हुआ विपक्ष ने हंगामा कर दिया। प्रियंका गांधी, शशि थरूर, दिग्विजय सिंह, नितिन राउत ने भाजपा पर निशाना साधना शुरु कर दिया। इसीबीच सामने आया चुनाव आयोग का बयान। 

उम्मीद थी कि चुनाव आयोग कह देगा कि ये रिजर्व्ड बॉक्सेस थे जिसका मतदान से कोई मतलब नहीं। लेकिन इसबार स्क्रिप्ट में चेंज था। और फिर एक ही बात बार-बार बोलेंगे तो जनता को उनके निष्पक्ष होने पर भरोसा कैसे रहेगा। सो उन्होंने कहा- ईवीएम लेकर निकले तो रास्ते में गाड़ी खराब हो गई, लिफ्ट मांगा तो एक बोलेरो रुकी और हम उसी के जरिए आगे बढ़े। हमें नहीं पता था की वो गाड़ी भाजपा प्रत्याशी कृष्णेंदु पॉल की है। 

कई लोग ईवीएम पर सवाल उठाने वालों का मजाक बनाते हैं लेकिन इसका उत्तर नहीं दे पाते कि हरबार ईवीएम भाजपा नेताओं की गाड़ियों में क्यों मिलती है। उसमें तकनीकी गड़बड़ी होती है तो भाजपा को ही फायदा क्यों मिलता है। अगर आपने ईवीएम के विरोध का मतलब भाजपा का विरोध समझ लिया है तो कहीं न कहीं ये बात स्वीकार करते हैं कि भाजपा ईवीएम के भरोसे जीत रही है। हरियाणा में तो भाजपा नेता बख्शीश सिंह विर्क ने कह भी दिया था कि ईवीएम में आप कोई भी बटन दबाओ वोट तो कमल पर ही जाएगा। 

2019 में द क्विंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयोग के लिए ईवीएम बनाने वाली कंपनी ECIL ने ईवीएम और वीवीपैट की देखरेख के लिए मुंबई की एक फर्म M/s T&M Services Consulting Private Limited से कन्सल्टिंग इंजीनियर लिए।  मतलब साफ है कि ईवीएम तक प्राइवेट इंजीनियर्स की पहुंच थी। अब चुनाव आयोग की वेबसाइड पर जाएंगे तो इस कंपनी की मदद संबंधी कोई भी जानकारी नहीं मिलेगी। ऐसा क्यों किया गया इसके बारे में कुछ नहीं पता। 

जिन इंजीनियरों को ईवीएम की देखरेेख की जिम्मेदारी मिली जब उनसे क्विंट ने बात की तो पता चला कि उन्हें ईवीएम देखरेख के लिए क्रैश कोर्स करवाया गया और उसके बाद इसकी जिम्मेदारी मिली। लेकिन इस मामले पर जब चुनाव आयोग से बात की गई तो वह कुछ भी बताने से साफ मना कर गई। अब ये आपके ऊपर है कि आप इलेक्शन कमीशन को स्वतंत्र मानते हैं या फिर मानते हैं कि इसपर किसी तरह का दबाव है। 

आखिरी बात. ईवीएम पर देश की बड़ी आबादी को भरोसा नहीं है। भाजपा को छोड़ दें तो सभी दलों ने इसका विरोध किया है। दुनिया के जिन विकसित देशों ने इसे बनाया उन्होंने ही इसे त्याग दिया और बैलेट पेपर पर आ गए। लेकिन भारत में ऐसा नहीं हो रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि यहां एक पार्टी को इससे फायदा हो रहा है। चुनाव आयोग को गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। जनता को संतुष्ट करने की जिम्मदारी चुनाव आयोग की है। व्यक्ति जिसे वोट दे उसे ही जाए तो तो बेहतर होगा। 

 

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कोरोना को भगाने का एकमात्र विकल्प है कि हर राज्यों में चुनाव करवा दिया जाए

देश के पांच राज्यों को छोड़कर कोरोना वायरस महामारी फिर से चुनौती बन चुकी है। जिन पांच राज्यों में कोरोना नहीं है वहां चुनाव है। इसी को लेकर हमने एक पोल करवाया। 
जनता से पूछा- 

कोरोना वायरस कैसे खत्म होगा?

– लॉकडाउन से
– वैक्सीन से
– मास्क से
– चुनाव से

अधिकतर लोगों ने कहा- चुनाव से। सैद्धांतिक रूप से देखेंगे तो ये गलत जवाब लगेगा। लेकिन हमारे नेताओं ने कोरोना को लेकर ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि यही जवाब सबसे परफेक्ट लगता है। गुजरात के राजकोट से भाजपा विधायक गोविंद पटेल ने कहा भाजपा के कार्यकर्ता मेहनती होते हैं, जो मेहनत करते हैं उनको कोरोना नहीं हो सकता है। ऐसे में कोरोना को हराने के लिए जरूरी है कि सभी देशवासियों को भाजपा का कार्यकर्ता बन जाना चाहिए। है कि नहीं?


अब पीएम मोदी को देखिए। जब भी कोरोना पर बात करते हैं जनता को दो गज की दूरी और मास्क है जरूरी का अद्वितीय ज्ञान देते हैं। लेकिन जैसे ही रैलियों में जाते हैं मानों ये परम ज्ञान घर पर ही भूल जाते हैं। वहां भीड़ देखकर गदगद हो जाते हैं। कह भी देते हैं कि मैने जीवन में इतना बड़ा जनसमूह कभी देखा ही नहीं। 

अब सवाल है कि आम आदमी को क्या कोरोना से डरना चाहिए?

बिल्कुल। कोरोना एक गंभीर बीमारी है। सावधानी ही इससे बचाव है। कोरोना को भारत के नजरिए से देखेंगे तो ये एक राजनीतिक बिमारी लगेगी। बिहार में चुनाव होना था तो महामारी का प्रकोप कम हो गया। अब बंगाल, असम समेत पांच राज्यों में चुनाव होने हैं इसलिए वहां भी इसका प्रकोप कम हो गया। हर दिन 50 हजार नए केस जरूर आ रहे हैं लेकिन अधिकतर उन राज्यों से आ रहे हैं जहां चुनाव नहीं हैं। ऐसा लगता है कि कोरोना ने चुनावी राज्यों को लिखित में आश्वासन दे दिया है, आप चुनाव वगैरह करवा लो, हम 2 मई के बाद मिलेंगे। 

असल में ऐसा ही कुछ दिखाई दे रहा है। जिन राज्यों में चुनाव है वहां तो जांच ही बंद हो गई है, न किसी से मास्क के लिए जुर्माने वसूले जा रहे हैं और न ही किसी तरह का लॉकडाउन लगाया जा रहा है, हर गली में चुनावी मंच सजा है, चौराहों पर रैलियां हो रही हैं। सुबह से शाम तक सड़को पर रोड शो ही नजर आ रहे हैं। कोरोना अतीत की एक बीमारी बन चुका है। जिसकी चिंता किसी को भी नहीं है। खासकर नेताओं को तो एकदम नहीं। 

जैसी स्थिति बनी है वैसे में कहा जा सकता है कि कोरोना को भगाने के लिए चुनाव ही एकमात्र विकल्प नजर आता है। क्योंकि चुनाव के दौरान न सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखा जाता है और न ही मास्क पहनने या हाथ धोने जैसी सावधानियां बरती जाती हैं इसलिए नरेंद्र मोदी सरकार से अपील है कि सभी राज्यों में एक साथ चुनाव करवा दीजिए, कोरोना को भागना ही पड़ेगा। क्योंकि उससे भी बड़े वायरस चुनावी मंचो पर जो नजर आने लगेंगे। 

 

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भगत सिंह आज होते तो किसानों के साथ होते, भाजपा समर्थक उन्हें देशद्रोही मानता?

लाहौर हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान भगत सिंह ने कहा था कि- ‘क्रांति संसार का नियम है। वह मानवीय प्रगति का रहस्य है। लेकिन उनमें रक्तरंजित संघर्ष बिल्कुल लाजिमी नहीं है और न उसमें व्यक्तियों के खिलाफ हिंसा की कोई जगह है। क्रांति बम और पिस्तौल का सम्प्रदाय नहीं है’

भगत सिंह की इन बातों को अब वर्तमान में रखकर देखिए। केंद्र की मोदी सरकार ने तीन नए कृषि कानून पास किए जिसके विरोध में किसानों ने दिल्ली के विभिन्न बॉर्डरों पर धरना देना शुरु कर दिया। चार महीने बीत गए लेकिन उनकी मांगो पर किसी तरह का अमल नहीं किया गया। इस दौरान बड़ी संख्या में किसानों की मौत हो गई। भाजपा के तमाम नेता और मंत्री उनकी शहादत को व्यर्थ मानते हैं, उन्हें किसान मानने से भी इंकार करने से कुुछ गुरेज नहीं किया। 

आज की परिस्थिति में भगत सिंह को रखकर देखिए। वह होते तो किसके समर्थन में खड़े होते? किसान या सरकार? स्वाभाविक सी बात है कि वह किसानों के हित में ही खड़े होते। वह सरकार से कहते कि जिसके लिए आपने कानून बनाया अगर उसे ही पसंद नहीं तो फिर क्यों? आप क्यों नहीं किसानों से पूछकर उनके हिसाब से कानून बनाते? आप खेती का उद्धार करने के लिए क्यों निजीकरण को ही बेहतर विकल्प मान बैठे हैं?

जब वह ये सवाल सरकार से पूछ रहे होते तो भाजपा के समर्थक क्या उनके समर्थन में खड़े होते! निश्चित तौर पर नहीं खड़े होते. उन्हें देशभक्त के बजाय देशद्रोही साबित कर देते। ये बात इसलिए कह रहा हूं क्योंकि शहीद दिवस के मौके पर सिंघु, टीकरी और गाजीपुर बॉर्डर पर तमाम प्रोग्राम किए जा रहे हैं। भगत सिंह की बातों को लोगों के दिमाग में डालने की कोशिश की जा रही है। लोगों को बताया जा रहा है कि बिना हिंसा के भी अपने निश्चित लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। 

ऐसे में सरकार की भक्ति में सराबोर एक व्यक्ति भगत सिंह को भी शक की नजर से देखने लगता है। उनकी भूमिका पर सवाल खड़े करने लगता है लेकिन वह कुछ बोल नहीं पाता क्योंकि भगत सिंह के समर्थन में एक बड़ा जनादेश खड़ा है। लेकिन उसके मन के भीतर जो नफरत किसानों के प्रति है वही भगत सिंह के खिलाफ भी भरती चली जाती है। मानवीय सोच कुछ ऐसे ही काम करती है, वह एक ही पक्ष के दो लोगों को एक साथ बढ़िया नहीं मान सकता। 

यकीन मानिए भगत सिंह आज होते तो देशद्रोही होते, क्योंकि वह बेरोजगारी, शोषण, कुपोषण, असमानता, नफरत और अन्याय के खिलाफ बोलते, वे उन नेताओं से पूछते कि सवाल पूछना देशद्रोह क्यों है, समानता की बात करने वाला देशविरोधी कैसे हो सकता है, वे सरकारी नुमाइंदो से राष्ट्रवाद और देशभक्ति के मायनों पर सवाल पूछते। यकीन मानिए वर्तमान सत्ता ही उन्हें फांसी की सजा सुना चुकी होती क्योंकि भगत सिंह मनुष्य मुक्ति और महान परिवर्तन की बात करते। 


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Author :- RAJESH SAHU

सवाल है कि रेप क्यों होते हैं?

– क्योंकि लड़कियां छोटे कपड़े पहनती हैं। नहीं।
– क्योंकि लड़कियां पुरुषों को अट्रैक्ट करती हैं। नहीं नहीं। 
– क्योंकि लड़कियां रात में घूमने निकलती हैं। नहीं ये भी नहीं। 

तो फिर क्यों? नहीं पता! चलिए हम बताते हैं आपको क्यों होते हैं रेप?

उत्तराखंड के नवनियुक्त सीएम तीरथ सिंह रावत एकबार हवाई यात्रा कर रहे थे उनके बगल एक महिला बैठी थी उन्होंने पूछा बहन जी कहां जा रही हैं? महिला ने कहा- दिल्ली जा रही हूं. मेरे पति जेएनयू में प्रोफेसर हैं और मैं खुद एक एनजीओ चलाती हूं। 

बस इतनी सी बात ही तीरथ जी ने महिला से की। उसके बाद अपने दिमाग में तमाम ख्याल पाल लिए। उन्होंने कह दिया कि जो महिला फटी हुई जींस पहनती हो वह समाज में क्या संस्कृति फैलाती होगी। ये बयान सिर्फ मुंह से बक देने भर का नहीं है। बल्कि एक पूरी मानसिकता को दिखाता है जो सिर्फ सीएम तीरथ जी के भीतर नहीं है बल्कि देश के एक बड़े हिस्से के लोगों के भीतर बसी हुई है। 

ये मानसिकता क्या है इसे पांच प्वाइंट में समझिए। 

प्वाइंट नंबर- 1

असल में रेप ‘कल्चर’ की बात है। आम जीवन में सीखे गए व्यवहार की बात है। आप लाख कहें कि कोई भी समाज या संस्कृति रेप करने की इजाजत नहीं देती लेकिन सच्चाई यही है कि रेप कहने भर से रेप नहीं हो जाता। जब समाज की गालियों में, मजाक में, गॉसिप में, फिल्मों में, कहानियों में सेक्स से जुड़ी सैकड़ों गलतफहमियां पसरी हुई हैं तो समाज पुरुषों को एक पोटेंशियल रेपिस्ट के दौर पर ही तैयार कर रहा होता है। ऐसा नहीं है कि सारे पुरुष ऐसे हैं। कुछ लोगों में सहमति-असहमति समझने का विवेक विकसित हो जाता है। कुछ लोग महिलाओं का वास्तविक सम्मान करते हैं और कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें मौका नहीं मिल पाता। 

प्वाइंट नंबर – 2

बात मानसिकता की हो रही है इसलिए पिछले कुछ बयानों को याद करना जरूरी हो जाता है। 
– लड़के हैं गलतियां हो जाती है। 
– ताली दोनों हाथों से बजती है।
– रेप इसलिए होते हैं क्योंकि अब लड़कियां-लड़के इंटरैक्ट करती हैं। 
– लड़कियां 15-16 साल की उम्र में हार्मोनल आउटबर्स्ट के कारण खुद को संभाल नहीं पाती।

मतलब ऐसे न जाने कितने बयान हैं जो इस बात के सबूत हैं कि पुरुषों ने महिलाओं के खिलाफ हुए अपराध पर उन्हें ही दोषी ठहराया है। 


पाइंट नंबर – 3

जब कोई इंसान किसी को नीचा दिखाने के लिए मां-बहन-बेटी से जुड़ी गालियां दे रहा होता है तो उसके भीतर एक पोटेंशियल रेपिस्ट बोल रहा होता है। ऐसी गालियों किसी महिला के साथ उसकी मर्जी के खिलाफ सेक्स की कल्पना हो रही होती है। यही कल्पना रेप की कल्पना है। जब कोई इसके खिलाफ बोलना शुरु करता है तो एक बड़ा हिस्सा ही उनके खिलाफ खड़ा हो जाता है और उन्हें ही सलीके से रहने की हिदायत देना शुरु कर देता है। आप फेमिनिज्म या फिर आवाज उठाती महिलाओं को गलत साबित करने वाले तमाम लोगों को देखे ही होंगे। 

प्वाइंट नंबर – 4

आखिर लड़कियों के कपड़ों पर ही आपका ध्यान आकर रुक क्यों जाता है। वक्त की मांग है कि उनके कपड़ों, उनके खाने-पीने, उनके घर से बाहर आने-जाने  को लेकर पूर्वाग्रह से बाहर निकलें। महिलाओं को पुरुषों की तारीफ नहीं चाहिए। उन्हें इज्जत चाहिए। उन्हें किसी से कमतर और कमजोर न  आंका जाए, महिलाएं चाहती हैं कि उन्हें हर वक्त मजबूत-मजबूत कहकर ये अहसास न करवाया जाए कि तुम कमजोर हो हम तुमको मजबूत बता रहे हैं। ममता की मूरत, दया का सागर, त्याग की प्रतिमूर्ति के नाम पर शोषण करना बंद कीजिए। 

प्वाइंट नंबर – 5

दुनिया में कई ऐसे मानव समूह हैं जहां का समाज रेप मुक्त है। मैं फिर से कह रही हूं- रेप कल्चर की बात है। आम जीवन में सीखे गए व्यवहार की बात है। अपने आसपास देखेंगे तो पता लगेगा कि जेंडर असंवेदनशीलता कितना गंभीर खतरा बनती जा रही है। यही खतरा बड़ी संख्या में रेपिस्ट, मोलेस्टर और सेक्सुअल हरैसर पैदा कर रही है। किसी को नीचा दिखाने के लिए मां-बहन बेटी के नाम पर गाली देना बंद कीजिए। आप अगर ये सोचते हैं कि फांसी की सजा या फिर एनकाउंटर से महिलाओं के खिलाफ अपराध कम हो जाएंगे तो आप गलत हैं इससे बुराई को सिर्फ काटा जा रहा है जबकि इसके जड़ पर वार करने की जरूरत है। इसलिए हर इंसान की नैतिक जिम्मेदारी है कि वह खुद को संभाले। 

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Ripped jeans are better than ripped mindset…

Society is following nudity if it is following the trend or let us say it in the style of newly appointed Uttarakhand CM, Tirath Singh Rawat that the ripped jeans are a signal of nudity. If we go back to history, the trend of distressed denim had found its way into the punk culture in the 1970s. Before this, ripped jeans were linked with the working class who couldn’t afford to buy new jeans. Even at that time, denim became a target.

The episode of target started when a band named ‘Sex Pistols’ implanted British Punk ideology to fight against the state of affairs and the hidebound form of govt. After this, denim became one of the main targets for political deconstruction. Men and women who wore torn jackets and jeans adorned with pins and slogans were charged.

The ripped jeans were popular in the late 1980s and the 1990s and 2000s during the grunge era. Many international designers like Tom Ford and Helmut Lang, and others began to customize jeans again, which included broken, or slightly more discreet. In the 2010s, this trend came back in style as a revival of the 90s. The Italian firm Dolce & Gabanna presented this trend in their fashion shows. They showcased ripped pants, much shredded by the thigh area with the broken knee. If we talk about the new millennium, distressed jeans are just a fashion statement.

Coming back to the point made by Uttarakhand CM Tirath Singh Rawat, “Wearing ripped jeans destroys our culture, it seems. It leads to substance abuse and a societal breakdown. Women should strictly avoid this violation against our pristine customs.” Here, the word ‘women’ creates a differentiation. On one hand, Rawat is criticizing women over wearing ripped jeans, on the other Baba Ramdev put in a lot of effort to create the perfect ‘sanskari’ ripped jeans for women.

The big question is when will society stop adding ‘sanskar’, ethics, manners in the same basket as clothes? It is impossible until men/women in power stop telling women what to wear and how to dress. There is no law saying a woman cannot purchase or wear clothes that she likes. If she is physically capable of donning the garment, she has every right to do so. There are laws against baring breasts and genitalia, but that’s about it. Obscenity is not defined in any law including the Indian Penal Code.  Though the Indian Penal Code has provisions that prohibit obscenity, but that doesn’t mean that wearing shorts or a skirt amounts to it. No one is allowed to object to someone else’s choice of clothing.

The fight is not only for the ripped jeans but for every outfit that enables the exposure of skin. Recently, a Khap Panchayat in UP’s Muzaffarnagar district barred women from wearing jeans and men from wearing shorts. The reason they gave was that jeans are a part of western culture and people should avoid wearing this, instead, people should wear traditional Indian clothes. Maharashtra also set a dress code for govt offices. The state govt banned jeans, T-shirts, and slippers for govt employees and contractual staff.

It stated that as the people of Maharashtra represent its state, so they should wear ‘appropriate’ formal clothes. The circular mentioned that women should wear a sari, salwar, churidar-kurta, or trousers with a kurta or a shirt and a dupatta. But why? The fact that I have been noticing since childhood is that showing belly and back in a saree is fine with Indian culture but at the same time, showing leg is a crime. Not only this, a woman wearing a dupatta is considered to be ‘Sanskari’, but one without it is termed as a show-off or display. In a city like Mumbai, in 2016, St Xavier’s College added ripped jeans to the list of clothing women aren’t allowed to wear. Other Indian universities have enforced similar dress codes, and in 2009, all the colleges in Kanpur, Uttar Pradesh, ruled that women shouldn’t wear “vulgar Western” clothes to help prevent sexual harassment.

Stating that women’s clothes are a reason behind the sexual assault is something insane. What about the Hyderabad rape case when a 26-year-old veterinary doctor, wearing a ‘SUIT with DUPATTA’ was raped by four men? And what about the rape of a 6 months old baby, 6 years old girl, 69 years old woman? So, the context of relating assaults with one’s dressing style is senseless. Time after time, political leaders have been asking women to not wear fewer clothes.

Samajwadi Party leader Abu Azmi once said that scantily-clad women attracted male attention and that rape cases were on the rise due to “women wearing fewer clothes”. RSS chief, Mohan Bhagwat has also once said that rapes were an urban crime shaped by westernization, and were not happening in rural India where traditional values were upheld. This does not end here as making a controversial remark, a female politician Asha Mirje had remarked that rapes take place also because of a woman’s clothes, her behavior, and her being at inappropriate places. But, leaders like these should remember that rape-proof clothes are those which don’t have women inside them.

Chief of Delhi Commission for Women, Swati Maliwal once remarked, “These politicians should stop telling women what kind of clothes to wear and what not to wear. It’s time they stop underestimating these issues like rape and sexual harassment and do something constructive to address these serious problems.” So, instead of telling women about what to wear, boys should be advised how to behave.

On seeing a woman wearing ripped jeans and making remarks like, “Showing their knees~Is this good?”, BJP leader Tirath Singh Rawat has displayed his shabby mentality. He also said, “Ripped jeans are a result of “bad example” parents set for children, which also leads to substance abuse.” How? If one is moving with the trend, does it mean that his/ her parents have not given sacraments to him/ her? Sacraments or ‘Sanskar’ means a reduction of personality defects in self or making good or purifying. Apart from this, alleging that ripped jeans are a reason behind substance abuse is something funny and unarguable as the statement is itself wrong. Substance abuse, which doesn’t even relate to this, is a completely different issue.

Moreover, the blouse and petticoat which are worn with a saree, often described as India’s national dress, were introduced to India by the British. So the statements like “the western world are following us and we are adopting nudity” or “a woman wearing ripped jeans cannot give a proper environment to her children” are nothing but an example of a ripped mentality.

source: https://www.molitics.in/article/804/ripped-jeans-are-better-than-ripped-mindset

क्या बीजेपी के पास चुनाव लड़वाने के लिए उम्मीदवार नहीं?

अंतिम चार चरणों के लिए भारतीय जनता पार्टी द्वारा प्रेषित सूची ने पार्टी में बड़े बवाल को न्यौता दिया। दरअसल काशीपुरा-बेलगछिया से तरुण साहा और चौरिंगी विधानसभा से शिखा मित्रा को टिकट दिया गया। इसके बाद इन दोनों ने बीजेपी में होने या बीजेपी के टिकट से चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया। इससे पहले टिकट वितरण को लेकर बीजेपी आंतरिक कलह का शिकार भी हो चुकी है।

इन घटनाक्रमों ने एक बड़ा सवाल पैदा कर दिया है। सवाल ये कि क्या बीजेपी के पास चुनाव लड़वाने के लिए उम्मीदवार तक नहीं हैं? अगर ऐसा है तो किस आधार पर अमित शाह 200 से अधिक सीट जीतने का दावा कर रहे हैं।पहले ओपीनियन पोल और अब टिकट वितरण को लेकर भाजपा की समस्या ये छवि गढ़ रही है कि  बंगाल चुनावों की दौड़ में पार्टी पिछड़ चुकी है।

दहाई का आँकड़ा भी पार नहीं कर पाएगी बीजेपी


इन हालात में प्रशांत किशोर का एक पुराने ट्वीट की चर्चा की जानी चाहिए। चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने 21 दिसंबर को एक ट्वीट कर लिखा था कि “समर्थित मीडिया के द्वारा चाहे कितना भी प्रचार क्यों न करवा लिया जाए, वास्तविकता ये है कि बंगाल में बीजेपी दहाई का आँकड़ा पार करने के लिए भी संघर्ष करेगी।” ग़ौरतलब है कि प्रशांत फ़िलहाल टीएमसी का चुनाव प्रबंधन देख रहे हैं और इससे पहले 2014 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी के लिए भी काम कर चुके हैं। एक रणनीतिकार के तौर पर उनकी ख्याति काफ़ी अधिक है। प्रशांत किशोर ने किस आधार पर वो ट्वीट लिखा था, ये तो केवल वो ही बता सकते हैं, लेकिन फ़िलहाल जो हालात पैदा हुए हैं, उन्हें देखते हुए उस ट्वीट को ख़ारिज नहीं किया जा सकता।

शिखा मित्रा ने बीजेपी के टिकट से चुनाव लड़ने से किया इंकार


एक बार फिर से बीजेपी के टिकट वितरण पर नज़र डालते हैं। जिन दो उम्मीदवारों के कारण बीजेपी की छीछालेदर हुई है, उनमें से एक हैं शिखा मित्रा। शिखा, पूर्व कांग्रेस नेता सोमेन मित्रा की पत्नी हैं। इन्हें चौरिंगी से टिकट दिया गया है। हालांकि पहले शिखा ने ये बात कही थी कि अगर बीजेपी उन्हें चौरिंगी से टिकट देती है तो वो चुनाव लड़ सकतीं हैं, लेकिन अब जब नाम की घोषणा हुई तो उन्होंने एक वीडियो संदेश प्रेषित किया, जिसके अनुसार बीजेपी की टिकट पर उनका चुनाव लड़ना असंभव है। वो कांग्रेसी थीं, हैं और रहेंगी।

बीजेपी ने तरुण साहा को टिकट दिया, तरुण टीएमसी का प्रचार कर रहे हैं


दूसरे उम्मीदवार थे तरुण साहा। तरुण को काशीपुरा-बेलगछिया से बीजेपी का टिकट मिला।उनकी पत्नी टीएमसी की तरफ़ से इसी विधानसभा क्षेत्र से विधायक रह चुकी हैं। उत्तरी बंगाल के एक जाने-माने नेता तरुण टीएमसी की ओर से कोलकाता म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के काउंसलर हैं। जब स्थानीय पत्रकार ने तरुण साहा से इस संबंध में बातचीत की, तो उन्होंने कहा, “मैं तो टीएमसी के उम्मीदवार के प्रचार में व्यस्त हूँ। मैं बीजेपी में शामिल नहीं हुआ हूँ। बिना किसी चर्चा के बीजेपी ने मुझे टिकट दिया है।”

महुआ मोइत्रा ने अमित साह पर कसा तंज

इस पूरे मामले के बाद महुआ मोइत्रा ने ट्वीट करके बीजेपी पर तज कसा है। महुआ मोइत्रा ने ट्वीट में लिखा है कि “दो महीने की देरी के बाद आख़िरकार बीजेपी ने उम्मीदवारों के नामों की घोषणा की है, लेकिन सूची में मौजूद दो उम्मीदवार कह रहे हैं कि वो बीजेपी में नहीं हैं और उसकी टिकट पर चुनाव नहीं लड़ेंगे। अमित शाह जी, कुछ होमवर्क करने का समय आ गया है।”

पाँच सांसदों को बीजेपी ने दिया टिकट

इन दो मामलों के अलावा भी BJP के टिकट वितरण ने इस आरोप को बल दिया है कि पार्टी योग्य उम्मीदवारों की कमी से जूझ रही है। टीएमसी के नेताओं समेत अन्य विरोधी नेता भी ये सवाल उठा रहे हैं कि आखिर क्यों बीजेपी को विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए पाँच सांसदों को उतारना पड़ रहा है। बाबुल सुप्रियो, लॉकेट चटर्जी, निसिथ प्रामाणिक, जगन्नाथ सरकार और स्वपन दासगुप्ता को बीजेपी इन विधानसभा चुनावों में उतार रही है। स्वपन दासगुप्ता, जो राज्यसभा सांसद हैं, ने राज्यसभा से त्यागपत्र दे दिया है।

टीएमसी के बाग़ियों को टिकट का भी हो रहा विरोध


इनके अलावा बीजेपी ने टीएमसी से पार्टी में आए नेताओं को भी टिकट दिया है, जिसका काफ़ी आंतरिक विरोध भी हुआ। बीजेपी ने TMC के दिग्गज और अब भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुकुल रॉय को कृष्णनगर उत्तर से टिकट दिया है। अगर अनुभव की बात करें तो मुकुल रॉय केवल एक बार चुनाव लड़े वो भी 2001 में और हार गए थे।



टिकट वितरण के अलावा ओपिनियन पोल की बात करें, तो वहाँ भी बीजेपी पिछड़ती दिख रही है। ABP C Voter के हालिया सर्वे के मुताबिक TMC स्पष्ट जनादेश के साथ सरकार बनाती दिख रही है।

कुल मिलाकर टिकट वितरण को लेकर जिस तरह का छीछालेदर भारतीय जनता पार्टी की हुई है, वो प्रशांत किशोर के उस पुराने ट्वीट की तरफ जाने को मजबूर करता है।

source: https://www.molitics.in/article/806/two-bjp-candidates-denied-contesting-West-Bengal-election

जिस कुलपति को छात्रों की समस्या नहीं सुनाई देती उनकी नीदें अजान से ‘हराम’ हो रही हैं

अजान के कारण इलाहाबाद विश्वविद्यालय की कुलपति संगीता श्रीवास्तव की नींद में खलल पड़ रही है. उन्होंने इस समस्या को लेकर ज़िलाधिकारी समेत प्रशासन के कई अधिकारियों को चिट्ठी लिखी है. जिसमें उन्होंने कहा कि रोजाना सुबह लाउडस्पीकर से अजान होने के कारण उनकी नींद खराब होती है.


इसके साथ ही वीसी ने आगे कहा कि रमजान शुरू होने पर पूरे महीने तक रोजाना लाउडस्पीकर से अनाउसमेंट होंगी, जिससे नींद में और ज्यादा खलल पड़ेगी. उन्होंने अपनी चिट्ठी में इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश का हवाला भी दिया है. बता दें कि वीसी संगीता श्रीवास्तव जस्टिस विक्रम नाथ की पत्नी है जो गुजरात हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस हैं. 

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क्या था इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला


अजान के मामले पर कोर्ट ने 2020 को फैसला सुनाया था. जिसमें कोर्ट ने माना था कि अजान इस्लाम का धार्मिक भाग है लेकिन लाउडस्पीकर से अजान देना इस्लाम का धार्मिक भाग नहीं है. इसलिए मस्जिदों के मोइज्जिन यानी (अज़ान देने वाला) बिना लाउडस्पीकर के अजान दे सकते हैं. कोर्ट ने यह फैसला गाज़ीपुर के सांसद अफजाल अंसारी व फर्र्रुखाबाद के सैयद मोहम्मद की याचिकाओं को खारिज करते हुए दिया था.

इससे पहले किसने उठाई  थी आवाज़

आपको बता दें कि बॉलीवुड के जाने-माने गायक सोनू निगम लाउस्पीकर को लेकर अपनी परेशानी का इजहार कर चुके हैं. उन्होंने 2017 में एक ट्वीट कर कहा कि ऊपरवाला सभी को सलामत रखे, मैं मुसलमान नहीं हूं और सवेरे अज़ान की वजह से जागना पड़ता है. भारत में ये जबरन धार्मिकता कब थमेगी. सोनू ने आगे लिखा मोहम्मद ने इस्लाम बनाया था तब बिजली नहीं थी, तो फिर मुझे एडिसन के बाद ये शोर क्यों सुनना पड़ रहा है. यह बस एक गुंडागर्दी है. और इसके बाद सोनू विवादों में घिर गए कई लोगों ने उनकी बड़े लेवल पर आलोचना की.

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छात्रों का क्या कहना है

जब इस पूरे मामले को लेकर हमने इलाहाबाद विश्व विद्यालय के छात्र-छात्राओं से बात की तो उनका कहना कुछ अलग है. छात्र राजेश का कहना है कि चांसलर साहिबा को कभी भी छात्रों की परेशानी सुनाई नहीं देती हैं आए दिन छात्र अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करते रहते हैं, लेकिन उनकी मांगों को अनसुना करती है और यह उसी का असर है कि आज तक  यूनिवर्सिटी में महिला छात्रों के लिए पिंक हॉल की व्यवस्था नहीं की गई है.

राजेश ने आगे कहा कि इलाहाबाद विश्व विद्यालय मजहबी नफरतों से परे है,  हमेशा गंगा जमुनी तहजीब का एक उदाहऱण रही हैं. इसके पीछे चांसलर साहिबा का अपना निजी स्वार्थ है वह गुजरात हाईकोर्ट चीफ जस्टिस की पत्नी है और अपने पति के लिए दिल्ली पहुंचने का रास्ता साफ कर रही हैं. ताकि वो जल्द से जल्द सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच सकें.

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source: https://www.molitics.in/article/802/allahadad-univarsity-vice-chancellor-sangita-shriwastva-disturbed-by-ajan

पिछड़ गए अमित शाह, ममता रेस में मीलों आगे! – बंगाल चुनाव ओपीनियन पोल

किसी भी खेल को जीतने की संभावनाएँ तब बढ़ जातीं हैं, जब या तो नियम आपने ही बनाएँ हों या आप उन्हें अच्छे से जानते हों। पश्चिम बंगाल चुनाव भी एक मज़ेदार खेल बनता जा रहा है। बीजेपी ने अपने नियम इस खेल में सेट करने की कोशिश की, जैसे – सीएएएनआरसीएनपीआर और बांग्लादेशी घुसपैठिए। लेकिन फ़िलहाल ऐसा लग रहा है कि वो नियम सेट हो नहीं पाए।

कौन जीतेगा पश्चिम बंगाल के चुनाव” – ये आम लोगों के बीच चर्चा का सबसे बड़ा विषय बना हुआ है। इस खेल में जो दो दल सबसे आगे दिख रहे हैं वो हैं – सत्तारूढ़ टीएमसी और भारतीय जनता पार्टी। चुनाव प्रचार के शुरुआती दौर में अमित शाह ने कहा था कि उनकी पार्टी आने वाले चुनावों में 200 से अधिक सीटें हासिल करेगी। वहीं ममता बनर्जी पिछले दो बार के विस चुनावों के प्रदर्शन से बेहतर परिणाम को लेकर आश्वस्त दिख रहीं थीं। मतलब 294 सीटों वाली विधानसभा में दोनों ही नेता अपनी-अपनी पार्टी की सरकार बनने को लेकर आश्वस्त थे।

फिलहाल ABP के C Voter ने सर्वे कर लोगों के मूड का जायज़ा लिया। अगर आज चुनाव होते हैं तो संभावित परिणाम क्या होगा, किस पार्टी की सरकार बनेगी, क्या मुद्दे हावी रहेंगे, किन कारकों का प्रबाव प्रत्यक्ष तौर पर चुनावों में पड़ेगा, कौन मुक्य मंत्री बनेगा आदि सवाल लोगों से पूछे गए।


मुद्दा क्या होगा?


बीजेपी ने CAA, NRC, NPR और बांग्लादेशी घुसपैठिए को इन चुनावों का मुख्य मुद्दा बनाने की कोशिश की। नागरिकता संशोधन कानून पास करने के बाद अमित शाह के बाषणों में अक्सर बांग्लादेशी घुसपैठिओं और बंगाल का ज़िक्र होता था। स्पष्ट था कि वो बंगाल में रहने वालों को उद्वेलित कर सकें। इस चर्चा से हिंदू बनाम मुस्लिम के विमर्श को भी  का चाहती थी, लेकिन लोगों ने इसे लगभग ख़ारिज़ कर दिया। सर्वे के मुताबिक केवल 1.5 फीसदी लोगों ने बांग्लादेशी घुसपैठिओं को मुद्दा माना है।

इस मामले में शीर्ष पर रहा है बेरोज़गारी का मुद्दा। सर्वे में हिस्सा लेने वाले 35.2 फ़ीसदी लोगों ने बेरोज़गारी को अपना मुद्दा माना है। वहीं बिजली, पानी, और सड़क जैसी मूलभूत आवश्यकताएँ भी 19.7 फ़ीसदी लोगों का मुद्दा है। कोरोनावायरस संक्रमण के कारण उपजी परिस्थितियों को 15.4 फ़ीसदी लोगों ने अपना मुद्दा बताया। सरकारी कामकाज में भ्रष्टाचार को लेकर बी लोग सजग दिखे और सर्वे में हिस्सा लेने वालों में से 12.7 फ़ीसदी लोगों ने इसे अपना मुद्दा बताया।

जहाँ तक बेरोज़गारी का सवाल है, यह पूरे देश की बहुत बड़ी समस्या है। SSC GD-2018 के तहत नौकरी की मांग कर रहे सफल अभ्यर्थियों में शामिल बंगाल के युवाओं ने कहा, “चुनाव लड़ रहीं पार्टियाँ कहती हैं खेला होबे! कौन सा खेला होबे! ये तो बताएँ।” वहीं उन्होंने बीजेपी को लेकर कहा “बीजेपी अब बंगाल में रोज़गार देने की बात करेगी। लेकिन क्या उन्होंने बिहार और उत्तर प्रदेश में रोज़गार दे दिया, जहाँ उनकी सरकार है? अगर हमें ज्वाइनिंग नहीं मिलती है तो हम बीजेपी के खिलाफ अभियान छेड़ेंगे।”

क्या कारक चुनावों को सर्वाधिक प्रभावित करेंगे?


1 दिसंबर से लेकर 30 जनवरी तक शिविरों के माध्यम से दुआरे सरकार के ज़रिए 11 जनकल्याण योजनाओं को लाभ पहुँचाने की TMC की नीति, इसके हक में जाती दिख रही है। सर्वे में हिस्सा लेने वाले 29.3 फीसदी लोगों ने माना कि दुआरे सरकार योजना आगामी चुनावों को प्रभावित करेगी। इसके अलावा 18.9 फीसदी लोगों ने TMC के विद्रोहियों को भी चुनावों को प्रबावित करने वाला महत्वपूर्ण कारक माना है। बता दें कि मुकुल रॉय से लेकर शुभेंदु अधिकारी तक – TMC के स्तंभ पार्टी से विद्रोह करके BJP में शामिल हुए हैं। ये आगामी चुनावों को प्रभावित कर सकते हैं।

सर्वे में इस मोर्चे पर भी बीजेपी पिछड़ती दिखी। दरअसल, जिस एक बात की खूब चर्चा लॉकडाउन से भी पहले से हो रही थी, वो ये कि सौरव गांगुली बीजेपी में शामिल होंगे। एक तो सौरव अब तक बीजेपी में शामिल हुए नहीं हैं और दूसरा केवल 5 फ़ीसदी लोगों का मानना है कि ये चर्चा आगामी चुनावों को प्रभावित करेगी।

सरकार कौन बनाएगी?

ये सबसे बड़ा सवाल है। हार और जीत का निर्धारण इसी से होगा। मुख्य प्रतिद्ंद्वी दलों के नेता आश्वस्त हैं अपनी-अपनी जीत को लेकर। लेकिन जीत किसी एक को ही मिलेगी। और सर्वे के मुताबिक़ ये जीत मिल रही है टीएमसी को। सर्वे के मुताबिक़ आगामी चुनावों में टीएमसी का वोटशेयर होगा 43 फ़ीसदी जबकि भाजपा का वोटशेयर 38.4 फ़ीसदी रहेगा। अगर संख्या की बात की जाए, तो टीएमसी 150-166, बीजेपी 98-114 और कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन 23-31 विधानसभा सीटें जीतने की क्षमता में हैं।

पिछले विधानसभा चुनावों के परिणामों से अगर तुलना की जाए तो ये बीजेपी के लिए बहुत लंबी छलांग है। 3 से 98-114 सीटों का सफ़र कम नहीं होता लेकिन बीजेपी जीत से कम किसी भी परिणाम को अपने लिए बढ़िया नहीं मानेगी।

मुख्यमंत्री कौन बनेगा?


शुरुआती प्रचार के बाद से ही “बंगाल की बेटी” वाले नैरेटिव को स्थापित करने की कोशिश की जाती रही। ममता ख़ुद को बंगाल की बेटी कह रहीं थीं। यद्यपि बीजेपी ने मुख्यमंत्री पद के लिए कोई चेयर आगे नहीं किया लेकिन आजतक से बात करते हुए अमित शाह ने कहा था कि बंगाल का मुख्यमंत्री बंगाल का ही आदमी होगा। लेकिन ममता बनर्जी का क़द बहुत ऊँचा दिख रहा है।

सर्वे में शामिल 52.2 फ़ीसदी लोगों ने ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री पद का विकल्प माना। 26.9 फ़ीसदी लोगों के समर्थन के साथ दूसरे नंबर पर बीजेपी के दिलीप घोष रहे। इनके अलावा कोई भी दहाई के आँकड़े को भी पार नहीं कर पाया।

कुल मिलाकर अब तक के आसार ये बताते हैं कि ममता और टीएमसी भारी बढ़त लेकर बंगाल चुनावों के ट्रैक पर दौड़ रहीं हैं। अंतिम मार्क तक पहुँचते-पहुँचते तस्वीर बदल सकती है, लेकिन बीजेपी चुनावों का वो थीम सेट नहीं कर पाई, जो करना चाहती थी। इसलिए तस्वीर बदलेने के आसार कम ही नज़र आते हैं।

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