“After farmers and youths, now bankers are on roads” – Why?

The bankers, holding posters and shouting slogans have created an uproar on the Indian streets after the United Forum of Bank Union (UFBU), an umbrella body of nine bank unions, called for a two-day nationwide strike on March 15th and 16th. The minds were filled with furor until the strike. All this started on February 24th after Finance Minister Nirmala Sitharaman’s tweet. She tweeted, “Embargo lifted on a grant of Govt business to private banks.  All banks can now participate. Private banks can now be equal partners in the development of the Indian economy, furthering Govt’s social sector initiatives, and enhancing customer convenience.” Soon after that, the Bank of Maharashtra, Bank of India, Indian Overseas Bank, and the Central Bank of India were shortlisted for privatization. Earlier, only two banks were said to be privatized but when announced, there were four which was a shocker, leading to objections.

Due to the bank strike, major services like cash withdrawals, deposits, cheque clearing, and business transactions remained impacted across India. Lakhs of bank employees from over 80,000 branches across India participated in the strike. As all the bank services were shut, C.H. Venkatachalam, the General Secretary of All India Bank Employees Association (AIBEA) claimed that about 2 crore cheques/installments worth about Rs 16,500 crore are held for clearance. He said that the normal banking transactions have also been affected with managers to clerks taking part in the strike. The agitators said that the strike had affected banking transactions at least by Rs 500 crore.

Several ATMs in and around the railway stations had drained due to no replenishment amid the strike. The protesters were sitting outside the branches of the banks. ATMs were locked. According to the Punjab National Bank Employees Association, AP Singh, the transaction of Rs 400 crore was affected in Bihar.  Even private banks like HDFC, IDBI, and ICICI were not allowed to open.

Not only on the streets, but the protest against the privatization of banks is also going on social media. Following the bank strike, the social media giant, Twitter is flooded with millions of tweets in support of the bankers. Twitter users have been targeting the govt. Over 40,000 people tweeted under the hashtag #BankSrgicalStrike, making it the top trend on Twitter. Jagjit Singh Kurangawali, a Twitter user expressed his pain against the privatization by tweeting, “In 1969, Iron Lady of India, “Smt Indira Gandhi” nationalized all anti-national banks & rest is history ! 5 decades down, hyper-nationalism wholesale govt anti-nationalizing all banks again! Can you find the Hypocrisy here at least, please? Wake up!” Many have asked questions from the government too. “Who will give education loans to the aspiring youths of India. On one hand, you are privatizing PSBs, and on the other, you are also privatizing top institutions of India.” – a tweet read. The questions are millions but the answer is yet not clear. The main reason behind opposing privatization is the argument that it will widen the gap between rich and poor.

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जिन्होंने बैंक से फ्रॉड किया अब उन्हीं को बैंक क्यों सौंपना चाहती है मोदी सरकार?

जिन्होंने बैंक से फ्रॉड किया अब उन्हीं को बैंक क्यों सौंपना चाहती है मोदी सरकार?

साल 1969, केंद्र की सत्ता में थी इंदिरा गांधी. उन्होंने एक झटके में 14 बैंको का राष्ट्रीयकरण यानी सरकारी कर दिया। इंदिरा गांधी ने कहा- बैंक अपनी सामाजिक जिम्मेदारी नहीं निभा रहे हैं वह अपने मालिकों के हाथ की कठपुतली बनकर रह गए हैं। वक्त बीता और साल आया 2021, केंद्र की सत्ता में हैं नरेंद्र मोदी। उन्होंने कहा- सरकार का काम व्यापार करना नहीं है। और उन्होंने बैंको को निजी हाथों में सौंप दिया। दो सरकार। दो फैसले। किसके सही और किसके गलत ये आप तय करें।

पिछले चार सालों में मोदी सरकार ने 14 बैंको को दूसरे बैंको में समाहित यानी विलय कर दिया। अब उनके निशाने पर आईडीबीआई समेत 2 अन्य सरकारी बैंक हैं जिसे वह निजी हाथों में सौंपने जा रही है। देश के सबसे बड़े बैंक कर्मचारी संगठन यूनाइटेड फोरम ऑफ यूनियंस ने इसके विरोध में 15 और 16 मार्च को हड़ताल का ऐलान किया है। बैंक कर्मियों का कहना है कि ऐसे वक्त में जब सरकारी बैंको को मजबूत करके अर्थव्यवस्था को गति देने की जरूरत है उस वक्त उन्हें बेचा जा रहा है।

सवाल है कि इन आईडीबीआई बैंक के साथ बैंक ऑफ महाराष्ट्र, बैंक आफ इंडिया, इंडियन ओवरसीज बैंक और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया को खरीदेगा कौन? अडानी-अंबानी के प्रति मोदी जी का जो प्रेम है वह यहां भी छलकेगा। उन्हें ही मिलने की पूरी संभावना है। #BankStrike हैशटैग के साथ तमाम ट्वीट दिखे उसी में महाराष्ट्र के ऊर्जा मंत्री का एक ट्वीट दिखा, उन्होंने लिखा- पहले उद्योगपति बैंक से लोन लेकर फ्रॉड करता था ये मोदी जी को पसंद नहीं आता तो उन्होंने पूरा बैंक ही उन्हें सौंप दिया।

ये ट्वीट भले ही आपको मजाक लगे लेकिन इसके पीछे की कहानी डरावनी है। मोदी सरकार ने पिछले 3 साल 9 महीने के भीतर उद्योगपतियों का लगभग साढ़े सात लाख करोड़ रुपए राइट ऑफ कर दिया। राइट ऑफ मतलब तमाम बड़े उद्योगपतियों ने कर्ज लिया और सक्षम होने के बावजूद जानबूझकर कर्ज नहीं चुकाया। किसानों के घर से टूटी साइकिल उठा लाने वाली बैंक उद्योगपतियों के कर्ज को राइट ऑफ कर देती है मतलब बट्टे खाते में डाल देती है। बैंक ऐसे कर्ज को डूबा हुआ मान लेता है।

मैं जिन उद्योपतियों की बात कर रहा हूं इन्हें ही बैंक दिए जाने की तैयारी है। कांग्रेस ने 2004 से 2014 के बीच 2 लाख 20 हजार करोड़ रुपए राइट ऑफ किया। तमाम भाजपा नेताओं ने कांग्रेस पर उद्योगपतियों से मिलीभगत का आरोप लगाया लेकिन अब स्वयं मोदी जी ने महज पौने चार सालों में साढ़े सात लाख करोड़ रुपए उद्योगपतियों का माफ कर दिया। मतलब एकदम कम समय में कांग्रेस से भी चार गुना अधिक। इसमें विजय माल्या व मेहुल चौकसी जैसे भगोड़ो का भी कर्ज बट्टे खाते में डाला गया है।

एक सब्जी वाले की आधी सब्जी खराब निकल जाए तो वह बची आधी सब्जी को महंगा करके अपना लाभ निकालने की कोशिश करता है ठीक ऐसे ही जब बैंक उद्योगपतियों का कर्ज राइट ऑफ करता है तो उसकी भरपाई आम जनता पर अलग और फालतू के टैक्स लगाकर ही करता है। अब अगला सवाल है कि रेलवे स्टेशन, रेलगाड़ी, एयरपोर्ट और हवाई जहाज बेचने के बाद आखिर बैंक बेचने की नौबत क्यों आई। क्या सरकार सिर्फ टैक्स वसूलने के ही लिए हैं, रोजगार के लिए अंबानी-अडानी हैं तो फिर उन्हें ही सत्ता सौंप दी जाए।

बैंको के निजी हाथों में देने के पीछे जो सबसे मजबूत तर्क नजर आता है वह है चुुनाव के वक्त कर्जमाफी का ऐलान। तमाम सरकारों ने जनता को लुभाने के लिए कर्जमाफी का ऐलान कर दिया जिसका असर बैंको पर पड़ा, बैंक की हालत खराब हुई तो सरकार ने उसमें पूंजी डालकर उसे खड़ा किया। जब निजी हाथों में चली जाएगी तो उसे पूंजी डालकर खड़ा करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। कर्जमाफी का ऐलान करने वाली कंपनियों को निजी बैंको पर निर्भर होना पड़ेगा, जहां भ्रष्टाचार की संभावना अधिक होती है.

कुछ लोगों को लगता है कि सरकारी बैंको में बेईमानी अधिक है इसलिए निजी हाथों में चली जाएं तो बेहतर होगा. असल में बेईमानी तो प्राइवेट में भी है, पिछले कुछ सालों में आईसीआईसीआई बैंक, यस बैंक, एक्सिस बैंक और लक्ष्मी विलास बैंको में बड़ी गड़बड़ियां सामने आई। एक सच ये भी है कि जब कोई बैंक डूबने की स्थिति में आ जाता है तो उसे सरकार ही बचाती है। हड़ताल कर रहे कर्मियों का कहना है कि डूबे कर्जों की वसूली के लिए कठोर कानूनी कार्रवाई करने के बजाय आईबीसी जैसे कानून बनाना एक साजिश का हिस्सा है। इससे बैंक को अपने कर्ज के हेयरकट यानी मूल से भी कम रकम लेकर मामला खत्म होने के लिए राजी होना पड़ता है।

आखिरी बात, आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने मोदी सरकार को चेताया है कि औद्योगिक घरानों को बैंक बेचना भारी गलती होगी। उन्होंने नोटबंदी से अर्थव्यवस्था बैठ जाने की बात कही थी लेकिन मोदी सरकार नहीं मानी। नतीजा सामने है। अब उन्होंने बैंको को बेचना गलत बता रहे इसका भी नतीजा सामने आएगा। बाकी इस सरकार में आंदोलन अधिक हो रहे हैं काम कम। किसान-विद्यार्थी-बैंकर सब परेशान हैं।

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Entrance Exam में भी GST लगाकर गरीबों को उच्च शिक्षा से दूर कर रही मोदी सरकार?

क्या भारत बिना शिक्षा के विश्व गुरु बन सकता है? अगर ऐसा नहीं तो फिर उच्च शिक्षा को हर दिन महंगा क्यों किया जा रहा है? ये जानते हुए कि आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण बड़ी संख्या में छात्र उच्च शिक्षा हासिल करने से पहले ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। क्या इससे ये मान लिया जाए कि सरकार मान चुकी है कि हम वाट्सऐप यूनिवर्सिटी के जरिए ही लोगों को शिक्षित कर देंगे। ताजा उदाहरण नीट-पीजी की परीक्षा का है। 

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नीट का एंट्रेंस टेस्ट नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन यानी एनबीई करवाता है। पिछले साल जिन छात्रों ने इसका टेस्ट दिया उन्हें फार्म के लिए 3750 रुपए देने पड़े थे। इस बार जो छात्र इस टेस्ट में बैठना चाहते हैं उन्हें उसी परीक्षा के लिए 4250 रुपए देने पड़ेंगे। सिर्फ यही नहीं बल्कि इसबार जीएसटी लगा दिया गया है। इस टेस्ट में शामिल होने वाले छात्रों को जीएसटी भी चुकाना होगा। यानी समान्य और पिछड़े वर्ग के छात्र 5,015 रुपए एससी-एसटी के छात्र 3,835 रुपए जमा करने के बाद इस परीक्षा में बैठ पाएंगे। 

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ये पहला मौका है जब किसी एंट्रेंस टेस्ट पर जीएसटी लगाया गया है। इसलिए ऐतिहासिक कहें तो कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। एम्स के पीजी एंट्रेंस टेस्ट की फीस 2000 है। इसी तरह से कैट की फीस 2000 व गेट की फीस 1500 रुपए है। अब सवाल उठता है कि एक जैसी परीक्षा के लिए एक संस्थान जीएसटी नहीं ले रहा है तो दूसरा ऐसा क्यों कर रहा है? क्या जीएसटी लगाने का फैसला सरकार अपने स्तर पर नहीं बल्कि संस्थान अपने स्तर पर ले रहा है? अगर ऐसा ही रहा तो एनबीई की देखा देखी दूसरे संस्थान भी जीएसटी वसूलने लगे तो कोई अचरज नहीं होना चाहिए। 

ध्यान रहे जीएसटी कानूून के मुताबिक शिक्षण संस्थान की तरफ से छात्रों को दी जाने वाली सेवाएं जीएसटी से बाहर हैं। लेकिन शिक्षण संस्थान को दी जाने वाली सेवाओं पर जीएसटी लगती है। ऐसे में सवाल उठता है कि कानून का दुरुपयोग क्यों हो रहा है। एमडी और एमएस की डिग्री के बराबर ही पोस्ट ग्रैजुएट प्रोग्राम डिप्लोमेट ऑफ नेशनल बोर्ड यानी डीएनबी है। इसकी फीस भी एनबीई ही तय करता है।

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इसबार इसपर भी जीएसटी लगा दी गई। 2019 में डीएनबी छात्रों ने सलाना फीस के तौर पर 80 हजार रुपए भरा लेकिन इस बार यही फीस 1 लाख 25 हजार हो गई। एक साल के भीतर ही 45 हजार का इजाफा कर दिया गया। इस फीस में 20 हजार रुपए एकोमोडेशन के भी है। एनबीई के ने कहा जिन अस्पतालों में हॉस्टल नहीं है वहां एकोमोडेशन चार्ज लौटा दिया जाएगा। लेकिन सवाल ये है कि उसपर जो 3600 रुपए जीएसटी वसूला गया उसे नहीं वापस नहीं देने की बात कही गई। छात्र इसके खिलाफ मांग उठाते भी हैं तो उनकी कोई सुनवाई नहीं होती। 

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फीसों की अधाधुंध बढ़ोत्तरी के बीच हमें ठहरकर नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस जिसे शॉर्ट फॉर्म में एनएसओ कहते हैं उसके आंकड़ो को देखना चाहिए। इसके सर्वे के मुताबिक 2017-18 में 1 से लेकर 8वीं तक ग्रास एनरोलमेंट रेशियो 99.2 फीसदी थी। ग्रास एनरोलमेंट रेशियो का मतलब उस आयु वर्ग के सभी बच्चों में से कितने स्कूल में एनरोल है। जैसे जैसे ऊंची कक्षा में एनरोलमेंट रेशियो चेक किया गया ये संख्या कम होती चली गई। जिन छात्रों ने पढ़ाई छोड़ी उसमें 61 फीसदी ऐसे थे जिन्होंने कहा- आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने के कारण उन्होंने आगे की पढ़ाई न करने का फैसला किया है। 


ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन के अनुसार 2017 में हायर एजुकेशन में ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो 25.8 फीसदी था। 2018 में इसमें मामूली बढ़ोत्तरी हुई और ये आंकड़ा 26.3 पर पहुंचा। जुलाई 2020 में मोदी सरकार ने नेशनल एजुकेशन पॉलिसी को मंजूरी दी इसमें कहा गया कि 2035 तक ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो 50 फीसदी तक ले जाया जाएगा। इस वादे के बीच एक बड़ा सवाल घूमकर फिर से आ जाता है कि जब आर्थिक तंगी के कारण करोड़ों छात्र उच्च शिक्षा में दाखिला लेने से पहले ही पढ़ाई छोड़ रहे हैं तो फिर 50 फीसदी के आंकड़े तक कैसे पहुंच पाएंगे। तमाम टैक्स क्या कम थे जो एंट्रेंस टेस्ट पर भी जीएसटी वसूला जा रहा है।



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बंगाल चुनाव: राजनैतिक हत्याओं का बंगाल चुनाव से क्या लिंक है!

अस्पताल के बेड पर प्लास्टर से बंधे पैर के साथ ममता बनर्जी की तस्वीर बंगाल चुनावों को लेकर चल रही तमाम चिंताओं को सही साबित कर रही है। नफ़रत और हिंसा से भरे चुनाव प्रचार और अभूतपूर्व ध्रुवीकरण की आशंका इन चुनावों के साथ जुड़ी हुई है।

यह कहना ग़लत नहीं होगा कि मौजूदा वक्त में ममता बनर्जी, बीजेपी के खिलाफ खड़ी सबसे मजबूत ताकतों में से एक है और पश्चिम बंगाल बीजेपी का सबसे बड़ा सपना। पिछले विधानसभा चुनावों में बीजेपी को केवल 3 सीटें हासिल हो पाईं थीं। लेकिन लोकसभा चुनावों में बीजेपी का प्रदर्शन बेहतरीन रहा। 42 सीटों में से 18 सीटें हासिल की बीजेपी ने और वोट शेयर के मामले में तृणमूल काग्रेस से केवल 3.05% कम वोट हासिल किए। बीजेपी की कोशिश यही रहेगी कि आगामी विधानसभा चुनावों में पिछले विधानसभा चुनावों के परिणामों की झलक न दिखे जबकि ममता हर कीमत पर लोकसभा चुनावों के परिणामों की झलक को ख़त्म कर देना चाहेंगी।

बंगाल- राजनैतिक समीकरण

पश्चिम बंगाल के 294 सीटों में से 165 सीटें ऐसी हैं जहाँ पर किसी एक तबके का अधिक प्रभाव है। लगभग 55 सीटों पर अल्पसंख्यकों का वर्चस्व है, वहीं 55 सीटें ऐसी हैं जहाँ शरणार्थी हिंदुओं की संख्या अधिक है। इनमें से अधिकतर सीट उत्तरी बंगाल में पड़ते हैं। शरणार्थी हिंदुओं की अधिक संख्या वाली 55 सीटों पर बीजेपी को वृहत समर्थन प्राप्त है। लोकसभा चुनाव 2019 में बीजेपी ने उत्तरी बंगाल के 8 में से 7 सीटें हासिल की थी। जंगल महल क्षेत्र जिसके तहत अनु. जनजातियों के प्रभुत्व वाली 25 सीटें आतीं हैं, में भी बीजेपी ने अच्छा जनाधार तैयार कर लिया है।

जबकि दक्षिणी बंगाल में टीएमसी का प्रभुत्व कायम रहा। टीएमसी के जीते हुए 22 विधानसभा सीटों में से अधिकतर दक्षिणी बंगाल से ही आए थे। बीजेपी बंगाल के इसी हिस्से में एंट्री करना चाहती है, जबकि टीएमसी इस हिस्से को अनछुआ रखना चाहती है बीजेपी से। शक्ति की इसी चाहत ने पश्चिम बंगाल में राजनैतिक हत्याओं को बढ़ावा दिया है। दक्षिणी बंगाल में इस तरह की हत्याओं की संख्या अधिक रही है।

हिंसा सबसे बड़ी चिंता

आगामी बंगाल चुनावों को लेकर राजनैतिक विश्लेषकों की सबसे बड़ी चिंता हिंसा को लेकर है। एक निजी न्यूज़ संस्था के द्वारा एकत्रित किए गए आंकड़ों के मुताबिक पश्चिम बंगाल में 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद से अब तक 47 राजनैतिक हत्याएँ हुईं हैं। इनमें से 38 हत्याएँ दक्षिणी बंगाल में हुईँ। बीजेपी के 28 और टीएमसी के 18 कार्यकर्ताओं की हत्या हुई।

मुद्दे रहेंगे गौण

हालात को देखते हुए कहना ग़लत नहीं होगा कि पश्चिम बंगाल चुनाव में ज़रूरी मुद्दे हाशिए पर पड़े रहेंगे और चुनाव व्यक्तित्वों के बीच लड़ा जाएगा। ममता साबित करने में जुटी हैं कि बंगाल की असली बेटी वो हैं तो वहीं बीजेपी, पीएम मोदी के जानिब से यह स्थापित करने में लगी है कि वो रवींद्रनाथ टैगोर और सुभाष चंद्र बोस के सिद्धांतों के साथ चलकर सोनार बांग्ला बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। दुर्भाग्यपूर्ण ये है कि इस लड़ाई ने बंगाल के आम लोगों की ज़रूरतों को मुंह चिढ़ा दिया है।

होगा धार्मिक ध्रुवीकरण 

बीजेपी सालों से ममता बनर्जी पर बांग्लादेशी घुसपैठियों को शरण देने का आरोप लगाती रही है। साल 2019 में नागरिकता संशोधन कानून के पास होने के बाद और नेश्नल रजिस्टर फॉर सिटिजंस के क्रियान्वयन के चर्चे के बाद से कई बार यह दिखाने की कोशिश की गई कि एनआरसी के ज़रिए घुसपैठियों को बाहर कर दिया जाएगा और इसका नुकसान ममता बनर्जी को पहुँचेगा। इसके साथ ही ममता की ऐसी छवि का निर्माण करने की कोशिश की जा रही है जिससे ये साबित हो सके कि ममता मुसलमानों को अपना वोटबैंक बनाए रखने के लिए देश की सुरक्षा को नज़रअंदाज़ कर रही हैं। इस तरह से पूरे विमर्श को हिंदू बनाम मुस्लिम बना देने की कोशिश की जा रही है, जो बीते सालों में बीजेपी के लिए चुनावी सफलता का पैमाना बन गया है।

पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम काफी हद तक देश की राजनैतिक दिशा तय करेंगे। सबसे बड़ी जिम्मेदारी मतदाताओं की है, कि वो अपने आप को हिंदु-मुसलमान संझने की बजाय नागरिक समझें।

source: https://www.molitics.in/article/796/political-killings-and-bengal-elections-what-history-says

Chhattisgarh agrees to adopt Alternative Development Model!

Chattisgarh govt has signed a strategic partnership with India Center Foundation (ICF). The partnership focuses on the inclusive, sustainable, and progressive development of the state, which is aligned with the principles of the Alternative Development Model (ADM). ADM is a socio-economic development framework that works on the principles of Energy-efficiency, Environmental Responsibility, and Sustainability (EES).

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This ground-breaking model will upgrade the development operating system that supports the non-exploitation of people, resources, and environment at its core to create equitable opportunities through new types of economic entities.


Principal Secretary- Industry Shri Manoj Pingua and the Managing Trustee of ICF Shri. Sankalp Shukla signed the MoSA in the presence of state CM Bhupesh Bhagel and Founding Chairman of ICF Shri. Vibhav Kant Upadhyay. By signing the MoSA, Chattisgarh has now agreed to be the model state for AD compliant initiatives that will focus on education, skill development, innovative digital solutions, industrial development, development of agriculture corridor, urban & rural development, Buddhist Tourism infrastructure, and ensuring the global presence of Chhattisgarh.

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Japan, a key partner of ADM, is committed to India’s development through the India-Japan Global Partnership (IJGP). ICF will work with the State of Chhattisgarh to integrate the state into the IJGP framework to build larger participation of Japan and other global partners in the development process of the state. The immediate outcomes expected from this partnership are Japanese language skill centers in the state, opportunities for skilled individuals to work in Japan and acquire crucial experiences, enhanced digital education ecosystem for schools and students, development of Buddhist sites, and beginning of agriculture corridor.

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ICF chairman and proponent of ADM, Shri Vibhav Kant Upadhyay addressed the occasion and said that this alliance will pave the way for Chhattisgarh to adopt a new development model leading to empowerment and a vibrant economy. He said that the ADM is the future and Chhattisgarh will be the model state to adopt and implement this progressive way of development. The ICF delegation of 17 global leaders was welcomed by Hon. Cabinet Minister Amarjeet Bhagat. The minister remarked that this partnership will set an example of an empowerment-based governance model in the world.

source: https://www.molitics.in/article/795/chhattisgarh-alternative-development-model-ICF-IJGP

व्यंग्य : मिथुन सच में कोबरा हैं लेकिन किसी को डसेंगे तो वह इंसान कागज का नहीं बनेगा

इस समय दो तरह के चुनाव चल रहे हैं। पहली तरह वाले में पांच राज्यों के भीतर विधानसभा चुनाव, दूसरी तरह वाले में यूपी में पंचायत चुनाव। दोनो चुनाव में समानता ये है कि बड़ी संख्या में जानवर चुनाव मैदान में उतर आए हैं। जानवर कहने से बुरा मत मानिएगा। असल में जब कोई किसी को शेर कहता है तो उसका सीना फूलकर 56 इंची हो जाता है लेकिन जैसे ही कोई जानवर कह दे तो बुरा मान जाता है। ऐसे थोड़े होता है भइया जी। 

जानवरों के राजनीति में प्रवेश करने के बाद पश्चिम बंगाल में मिथुन चक्रवर्ती कोबरा के रूप में भाजपा में शामिल हुए हैं। मिथुन ने पीएम के सामने ही मंच पर कहा था कि उन्हें नकली सांप न समझें, वह कोबरा हैं, जिसे डस लेंगे वह इंसान फोटो में बदल जाएगा। हमें मिथुन की बात पर शक हुआ तो उनकी तमाम फिल्में देखी। एक फिल्म सीन मिला। मिथुन के भीतर सच में एक कोबरा है। पैरों के नीचे हाथ ले जाकर हाथों से फन बनाना और फिर उल्टा होकर उड़ना इस बात का प्रूफ है कि मिथुन पहले से ही कोबरा थे। जिस तरह से उन्होंने गुंडे की आंख में अपने फन रूपी हाथ से डसा वह इस बात का संकेत है कि विपक्ष को उनसे थोड़ा दूरी बनाकर रखनी चाहिए। 

भाजपा में शामिल होने के बाद मिथुुन ने कहा- वह जनसेवा करने के लिए पार्टी में शामिल हुए हैं। मिथुन जी लंबे समय से जनसेवा करना चाहते थे। किया भी। उनके राजनीतिक सफर की शुरुआत वामपंथी पार्टियों के जरिए हुई। हालांकि इस दौरान वह किसी पद पर नहीं रहे लेकिन सरकार से बेहद करीबी रहे। बंगाल की जनता का मूड बदला और टीएमसी सत्ता में आई तो मिथुन जी का भी ह्रदय परिवर्तन हुआ और वह टीएमसी में आ गए। ध्यान रहे टीएमसी भी उन्होंने जनसेवा के लिए ही ज्वाइन किया। 

ममता बनर्जी ने दरियादिली दिखाते हुए उन्हें 2014 में उन्हें राज्यसभा भेजा। जनसेवा का ख्वाब लेकर सांसद बने मिथुन उर्फ कोबरा जी ढाई साल में सिर्फ तीन बार राज्यसभा गए। इस दौरान एक भी सवाल नहीं उठाया। जनसेवा के इस तरीके को देखने के बाद मुझे इनकी ‘ओह माय गॉड फिल्म’ याद आ गयी। इसमें भी मिथुन जी को सबकुछ पता था। उनका ये रोल उनकी राजनीति से ही प्रेरित प्रतीत होता है। 2016 में उनका नाम शारदा चिटफंड स्कीम घोटाले में नाम आया। ईडी ने कई घंटो तक पूछताछ की। उन्हे लगा टीएमसी में रहूंगा तो फंस जाऊंगा सो उन्होंने पार्टी और सांसदी से इस्तीफा देकर राजनीति से सन्यास की घोषणा कर दी। इस तरह से उनका जनसेवा से मन भर गया। 

2018 में कोबरा जी के लड़के महाअक्षय उर्फ मिमोह पर रेप का आरोप लगा। उनकी पत्नी योगिता बाली पर पीड़िता का जबरन अबॉर्शन करवाने और धमकाने के आरोप में दिल्ली के बेगमपुर में शिकायत दर्ज हुई। इससे मिथुन की छवि पर असर पड़ा। और दाग धुुलने की जरूरत आन पड़ी। किसी भी तरह का कितना भी मजबूत दाग हो वह भाजपा में जाते ही धुल जाता है। ऐसे में मिथुन जी के भीतर एकबार फिर से जनसेवा की खुमारी चढ़ी और उन्होंने भाजपा ज्वाइन कर ली। 

इस तरह से मिथुन जी ने राजनीति का एक पूरा चक्कर लगा लिया। कट्टर वामपंथी होने से लेकर कांग्रेस से लगाव व टीएमसी में झुकाव के बाद वह अब कट्टर राष्ट्रवादी बन चुके हैं। सियासी जानकार कहते हैं कि पश्चिम बंगाल में मिथुन चक्रवर्ती के रूप में मनोज तिवारी मिला है। दिल्ली चुनाव में भाजपा का जो हाल हुआ था वही बंगाल में भी होगा। हालांकि मैं इन सबसे इत्तेफाक नहीं रखता। मैं बस उस जनसेवक की चालाकियां देख रहा जिसे राजनीति में रुचि तो खूब है लेकिन उनकी राजनीति में जनता का हिस्सा गायब है। मतलब जनता के मुद्दे नहीं है। वह सच में कोबरा है। जनता के मुद्दों को खत्म कर देना वाला कोबरा। आज के लिए बस इतना ही। 

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‘स्त्री शरीर उपभोग की वस्तु नहीं है’, महिलाओं को देवी समझने वाला समाज इसे कब समझेगा?

हर वर्ष की भांति इसबार भी दुनियाभर में अंतरराष्ट्रीय श्रमिक महिला दिवस मनाया जा रहा है। एकदूसरे को बधाई देते वक्त लोग श्रमिक शब्द का प्रयोग नहीं करते। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि उन्हें इसकी जानकारी नहीं है। आपको पता है क्यों मनाया जाता है ये दिन। नहीं पता। तो पता क्या है। अच्छा आपको पता होगा कि इसदिन महिलाओं के लिए रेस्टोरेंट और मॉल में छूट मिलती है। महिलाएं इसदिन अपने सौदर्य यानी सुंदरता का प्रदर्शन करती हैं। नहीं भाई। ये सब नहीं है। महिला दिवस तो स्त्रियों के अधिकारों की लड़ाई का उत्सव मनाने का दिन है। आज हम आपको कुछ ऐसी जरूरी बातें बताएंगे जो आपतक वाट्सऐप के जरिए पहुंची बातों की का काट है।

जो काम आप करते हैं वहीं काम महिलाएं करती हैं ऐसे में उन्हें समान वेतन मिलना चाहिए लेकिन नहीं मिलता। क्यों। क्योंकि वह महिला हैं. ये हम नहीं बल्कि एनएसएसओ की रिपोर्ट बताती है। रिपोर्ट के अनुसार भारत मे महिलाओं को पुरुषों की तुलना में एक ही काम के लिए औसतन 40 फीसदी से कम वेतन मिलता है। आपको नहीं पता होगा कि दुनिया के कुल शारीरिक श्रम का 60 फीसदी करने के बावजूद महिलाओं के हाथ में दुनिया की मात्र 15 फीसदी संपत्ति है। मतलब 85 फीसदी संपत्ति पर आज भी पुरुषों का अधिकार है। ऐसा क्यों है इसपर आप खुद विचार करिए। अपना ही घर देख लीजिए। कितनी संपत्तियां मां-बहन और दादी के नाम है। जवाब मिल जाएगा।

एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले दस सालों में महिलाओं के प्रति अपराध दो गुना बढ़ गए। 2011 जनगणना के अनुसार भारत में एक हजार पुरुषों के मुकाबले 919 महिलाएं हैं। हरियाणा जैसे शिक्षित राज्यों में चाइल्ड सेक्स रेशियो तो डरावना है। आप रेलवे, बस या फिर मेट्रो स्टेशन, स्कूल-कॉलेज, पार्क, बाजार या फिर कहीं भी चले जाइए आपको 20-25 फीसदी ही महिलाएं दिखेंगी। ऐसा इसलिए क्योंकि भारत दुनिया के सबसे अनसेफ देशों में गिना जाता है।

महिलाओं के प्रति हिंसा करने वाले उसी समृ्द्ध समाज के हैं जो महिला दिवस पर स्त्रियों को देवी का दर्जा देते हुए वाट्सएप फार्वर्ड कर रहे हैं। वाट्सएप पर आई बधाईयों से भावविभोर हो चुकी लड़कियों व महिलाओं को बताना चाहिए कि उन्हें पुरुष कुछ नहीं समझते। उनके नौकरी करने या न करने के फैसलों पर भी पुरुषों का ही मत हावी रहता है। देश में तो जेंडर के हिसाब से नौकरी मिलती है। कॉल सेंटर में काम या फिर अटेंडेट का काम, इसके लिए उन महिलाओं को रखा जाता है जो सुंदर हो और उनकी आवाज मधुर हो। आपका टैलेंट प्राथमिकताओं में दूसरे नंबर पर आता है। एक सच्चाई ये भी है कि देश की करोड़ों लड़कियां इसलिए आगे नहीं पढ़ पाती क्योंकि उन्हें रास्ते में छेड़छाड़ या फिर फब्तिया कसे जाने का डर रहता है। ध्यान रहे ये सिर्फ डर नहीं बल्कि कड़वी सच्चाई है।

अब सवाल है कि महिला दिवस पर क्या नहीं करना है।
 

– भइया ये मदर्स डे या वेलेंटाइन दिवस तो है नहीं इसलिए गिफ्ट, फूल, फैंसी ड्रेस को अपने घर पर ऱखिए। स्त्री दिवस अब तक हासिल की गई जीतों का उत्सव मनाने का दिन है।

– जोर से हंसने, कपड़े पहनने, मोबाइल फोन रखने पर चरित्र पर सवाल उठाने वाली मानसिकता को त्याग देने का दिन है।

– ऐसे वाट्सऐप मैसेज फॉरवर्ड न करें जिसमें महिलाओं को वही सेक्सिस्ट और दकियानूसी तरीके से गौरवान्वित किया गया हो।

– स्त्रियों को बच्चा संभालते, नौकरी करते या फिर घर का संभालते हुए सुपरवुमन के रूप में ग्लोरीफाई न करें।

ध्यान रहे ये स्त्री बनाम पुरुष का मसला नहीं बल्कि महिलाओं को समान्य इंसान माने जाने की लड़ाई है।

आखिरी बात, महिलाओं की असमानता उनकी अत्याधिक भावुकता में छिपी है। गोपालगंज के पूर्व आईपीएस ध्रुव गुप्त करते हैं कि दुनिया की आधी आबादी को अपनी भावुकता से मुक्त होकर यथार्थ की जमीन परखनी होगी। उन्हें महिमामंडन की नहीं, स्त्री-सुलभ शालीनता के साथ स्वतंत्र सोच, स्वतंत्र व्यक्तित्व और जरा आक्रमकता की जरूरत है। स्त्री का जीवन कैसा हो इसे तय करना का अधिकार स्त्री के सिवा किसी और को नहीं है। आखिरी बात मैं फिर से दोहरा रहा हूं। स्त्री का जीवन कैसा हो, इसे तय करने का अधिकार स्त्री के सिवा किसी और को नहीं हो।

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बंगाल में तीसरे नंबर की पार्टी को एक नंबर बनाने की कोशिश में लगा है गोदी मीडिया

पश्चिम बंगाल में भाजपा को जितना बड़ा प्रतिद्वंदी बताया जा रहा है असल में उतना बड़ा है नहीं। अब चूंकि भाजपा अपने प्रचार तंत्र के जरिए ही सत्ता तक पहुंचती है इसलिए दिल्ली से लेकर कोलकाता तक की मीडिया को इस काम में लगा दिया गया है कि भाजपा और टीएमसी का सीधा मुकाबला है और उस मुकाबले में भाजपा आगे जा रही है। लेकिन ऐसा कुछ नहीं है। इसके कुछ वाजिब कारण हैं।

भाजपा के फायरब्रांड नेताओं के साथ भाषा की दिक्कत

भाजपा के आधे से अधिक नेता हिन्दी भाषी हैं। अंग्रेजी भी ठीक-ठाक है। लेकिन बांग्ला में सभी की जुबान तंग है। ऐसे में जब वह बंगाल में किसी रैली को संबोधित करते हैं तो वहां की जनता से सीधे तौर पर कनेक्ट नहीं कर पाते। उदाहरण के लिए योगी आदित्यनाथ को ले सकते हैं। उत्तर भारत के किसी भी राज्य में जब चुनाव होता है तो योगी आदित्यनाथ स्टार प्रचारक होते हैं। बंगाल और असम भी इन्हें भेजा जाता है लेकिन जो क्रेज इनका हिन्दी पट्टी के राज्यों में है वह गैर हिन्दी राज्यों में नहीं है। यही कारण है कि पिछले दिनों रोड शो के दौरान भीड़ नदारत रही। 

भाजपा का चुनावी नारा ‘आत्मघाती’

भाजपा ने नारा दिया ‘बंगाल को चाहिए अपनी बेटी‘ जैसे ही ये नारा सामने आया इसबात की चर्चा शुरु हो गई है कि भाजपा के पास अपनी बेटी के रूप में कौन है? पिछले दिनों सरकार समर्थक जी न्यूज ने शो किया था जिसमें पूछा था कि बंगाल की असली बेटी कौन? दीदी या मोदी? मोदी को बेटी के रूप में प्रजेंट करना कितना हास्यास्पद है। इससे न सिर्फ चैनल की किरकिरी हुई बल्कि बंगाल की बेटी जैसे मुद्दे पर टीएमसी और ममता बनर्जी और मजबूत हुई। 

टीएमसी ने नारा दिया है – ‘बंग्ला निजेर मेये के चाए’, (बंगाल अपनी बेटी को चाहता है)
जनता को बखूबी पसंद भी आ रहा है। बंगाल की बेटी नारे में भाजपा फेल रही तो ममता बनर्जी को बुआ बताने पर जुट गई। ऐसा वह सीएम के भतीजे अभिषेक बनर्जी को लेकर कह रहे हैं। असल में लगातार बदलते नारों के बीच भाजपा खुद कन्फ्यूज हो गई है और उसे समझ नहीं आ रहा कि टीएमसी को कैसे मैनेज किया जाए.

महिला मुद्दे पर आप टीएमसी को नहीं घेर सकते। ममता बनर्जी को लोग दीदी के नाम से जानते हैं। दीदी के रूप में वह बंगाल में इतनी पॉपुलर हैं कि यही उनका असली नाम बन गया है। जब भी किसी रैली में वह जाती हैं खुद को दीदी के रूप में ही जनता के सामने रखती हैं। दीदी को भाई-बहन में सबसे बड़ी ऐसे व्यक्ति के रूप में पहचाना जाता है जो सबकी फिक्र करती है। बंगाल में पिछली सरकारों को चुनौती देने के लिए ममता का ये नाम बेहद प्रभावी साबित हुआ था। 

भाजपा का मुख्य नेता कौन

बंगाल में जितनी भी पार्टियां चुनावी मैदान में है सबके पास सीएम पद का एक चेहरा है लेकिन भाजपा के पास नहीं है। बंगाल भाजपा के अध्यक्ष दिलीप घोष हैं। दिलीप की छवि प्रदेश में ऐसी नहीं है कि वह एक हुजूम को अपने पीछे खड़ा कर सकें। यही दिल्ली में हुआ था। पार्टी ने चुनाव के दौरान सीएम कैंडिडेट नहीं घोषित किया था। जनता में कन्फ्यूजन हो गया। नतीजतन पार्टी को एक बड़ी हार झेलनी पड़ी। बंगाल में भी सीएम प्रत्याशी नहीं घोषित किया गया है ऐसे में पार्टी बेहतर प्रदर्शन करे इसकी उम्मीद कम है। 

भाजपा के लिए हिंसा कितनी प्रभावी

भाजपा अपने कार्यकर्ताओं के साथ हुई हिंसा को चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा बना लिया है। लेकिन कई बार यही दांव उल्टा पड़ जाता है। क्योंकि तमाम ऐसे मामले भी सामने आए जहां आपसी विवाद को भी पार्टी का रंग देने की कोशिश की गई जिससे लोगों के बीच ये संदेश गया कि कार्यकर्ताओं के साथ अन्याय दूसरी वजहों से हो रहा है लेकिन सत्ता की लालच में भाजपा इसे राजनीतिक रंग दे रही है। पिछले दिनों एक दादी की पिटाई का मामला भी ऐसा ही था पहले आरोप टीएमसी पर लगाया गया, लेकिन बात में पता चला कि उसके ही बेटे ने उसे प्रताड़ित किया। बुरी तरह से पिटाई की। 

पिछले चुनाव के नतीजे

पश्चिम बंगाल में साल 2016 में हुए विधानसभा चुनाव भाजपा को सिर्फ 3 सीटे मिली थी। वह टीएमसी, माकपा, कांग्रेस से भी बहुत पीछे थी। ऐसा तब रहा जब लोकसभा चुनाव 2014 में भाजपा ने राज्य के भीतर बेहतर प्रदर्शन किया था। कुछ लोग अब लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजों को लेकर कयास लगा रहे हैं कि भाजपा बेहतर प्रदर्शन करेगी। लेकिन उन्हें ये नहीं भूलना चाहिए कि लोकसभा के वक्त लोगों के सामने नरेंद्र मोदी रहते हैं लेकिन विधानसभा में ऐसा नहीं है। नरेंद्र मोदी खुद को जनता से जोड़ने की कोशिश तो करते हैं लेकिन ऐसा होता नजर नहीं आता। राजस्थान व मध्य प्रदेश में लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव में कितना अंतर था इससे अंदाजा लगाया जा सकता है। 

मीडिया का रोल

मीडिया सरकार के समर्थन में आईटी सेल बन चुकी है। प्रदेश में किसी की बाइक भी पंचर हुई तो टीएमसी से जोड़ देती है। हत्या के मामलों में पहली जांच राजनीतिक द्वेष की होती है। मीडिया की एकतरफा रिपोर्टिंग अब मजाक बन गई है। ऐसे में एक बड़ी संख्या का इससे मोह भंग होता नजर आ रहा है। लेकिन इनकी एकतरफा रिपोर्टिंग को ऐसे ही खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि लोगों के बीच जो नफरत भरी गई है उसमें टीवी मीडिया का योगदान सबसे अहम है। 

बंगाल चुनाव में भाजपा बारात लेकर तो पहुंच गई है लेकिन उसके पास दूल्हा नहीं है। ऐसे में जनता तिलक लगाए तो लगाए किसे इसे लेकर कन्फ्यूजन है यही कन्फ्यूजन उसके लिए आफत बनेगा ऐसा तमाम सियासी विशेषज्ञ मानते हैं। 
 

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source: https://www.molitics.in/article/790/west-bengal-elections-bjp-has-no-ground-in-bengal-but-media-trying-to-number-one-party

RSS सरकारी संस्थानों में अपने लोगों को भर रहा, चुनाव जीत भी गए तो हम उनसे मुक्त नहीं हो पाएंगे- राहुल

कांग्रेस के दिग्गज नेता राहुल गांधी कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के एक प्रोग्राम में शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने तमाम ऐसी बातें कही जो देश की जनता को सोचने पर मजबूर कर दिया। सबसे पहले उन्होंने अपनी ही पार्टी की उस गलती को स्वीकार किया जिसे लेकर भाजपा हमेशा हमलावर रही है। राहुल ने अर्थशास्त्री प्रोफेसर कौशिक बासु के साथ बातचीत के दौरान कहा- आपातकाल लगाने का फैसला एक भूल थी। राहुल ने ये भी कहा- आपातकाल के दौरान नागरिकों की आजादी और संवैधानिक अधिकारों को दबा दिया गया। 

इसी बातचीत के दौरान उन्होंने कहा- मेरी दादी ने भी माना था कि आपातकाल गलत फैसला था लेकिन तब कांग्रेस ने भारत के संस्थानिक ढांचे पर कब्जा करने की कोशिश नहीं की। राहुल ने इसके लिए पार्टी की विचारधारा का जिक्र करते हुए कहा- कांग्रेस नहीं कर सकती थी लेकिन आज भाजपा ऐसा ही कर रही है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ यानी आरएसएस अपने लोगों को संस्थानों में भर रहा है। राहुल ने कहा- अगर हम चुनाव में भाजपा को हरा भी देते हैं तो हम संस्थानों में बैठे लोगों से मुक्त नहीं हो पाएंगे। 


कांग्रेस नेता ने कहा- देश के लोकतंत्र में बड़ा संतुलन संस्थानों के कारण ही है क्योंकि संस्थान स्वतंत्र रूप से चलते हैं। लेकिन वर्तमान समय में आरएसएस संस्थानों की स्वतंत्रता पर हमला कर रहा है। ये कोई एक दिन की बात नहीं है बल्कि सुनियोजित तरीके से हर दिन हमला किया जा रहा है। लोकतंत्र को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है जब ये कमजोर करने में सफल हो जाएंगे तो एक झटके में उसे नष्ट कर देंगे। 

राहुल ने इसी बातचीत के दौरान मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ की उस बात का जिक्र किया जिसमें कमलनाथ ने कहा था कि उनकी सरकार के वरिष्ठ नौकरशाह उन्हीं के आदेश को नहीं मानते क्योंकि वे सभी आरएसएस से जुड़े हैं। इसके पीछे बड़ी वजह भाजपा का राज्य के भीतर लगातार सत्ता में रहना भी है। 

राहुल यही नहीं रुके उन्होंने कहा- हमें संसद में बोलने की अनुमति नहीं है, न्यायपालिका से हम उम्मीद कर नहीं सकते। भाजपा-आरएसएस के पास अकूत पैसे हैं। व्यवसायियों को विपक्ष में खड़े होने की इजाजत नहीं है। मणिपुर में भाजपा विधायकों की सदस्यता चुनाव आयोग रद्द कर चुका था लेकिन राज्यपाल उन्हीं के दम पर सरकार चलने देते हैं। आरएसएस से जुड़े राज्यपाल वहां भाजपा सरकार की मदद कर रहे हैं। 

राहुल ने कहा- एक नेता के तौर पर मैं तभी काम कर पाऊंगा जब संस्थानों की मदद हमें मिलेगी। लेकिन निर्वाचन आयोग, न्यायपालिका, प्रेस, नौकरशाही हर जगह आरएसएस के लोग भरे हुए हैं। ऐसे में काम कर पाना संभव ही नहीं होगा। राहुल गांधी ने मिस्त्र के चुनाव का जिक्र किया जिसमें होस्नी मुबारक 97 फीसदी वोटों के साथ जीते थे। राहुल ने कहा- ये हैरान करने वाला है कि कोई नेता इतने भारी अंतर से कैसे जीत सकता है। क्या मतदान में धांधली नहीं हुई थी। राहुल ने कहा- जो मिस्त्र में हुआ अब वही भारत में हो रहा है। उन्होंने किरण बेदी को निशाने पर लेते हुए कहा- जब ये पुड्डुचेरी में राज्यपाल थी तब चुनी हुई कांग्रेस सरकार को काम करने नहीं दिया। 

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source: https://www.molitics.in/article/791/congress-leader-rahul-gandhi-attacks-bjp-and-rss

पेट्रोल-डीजल के सहारे छप्पर फाड़ कमाई कर रही मोदी सरकार, क्या देशहित में चुप है जनता ?

ये देखो मोदी का खेल, महंगा राशन-महंगा तेल

देश में बढ़ती महंगाई को देखते हुए लोगों में बीजेपी के खिलाफ रोष बढ़ता जा रहा है, बीते कुछ दिनों में लगातार जिस तरह से पेट्रोल-डीजल और गैस सिलेंडर के दामों में बढ़ोतरी हुई है उससे साफ दिख रहा है कि बीजेपी आम आदमी के साथ खिलवाड़ कर रही है।

जिस वक्त PM नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे उस वक्त उन्होंने तत्कालीइन PM मनमोहन सिंह से अपील की थी कि जो पेट्रोल के दाम बढ़ाए गए हैं उसको वापस करें, सरकार में आने से पहले बीजेपी ने बड़े जोर-शोर से नारा दिया था कि बहुत हुई पेट्रोल-डीजल की मार, अबकी बार मोदी सरकार!‘, आज सरकार बनने के बाद मोदी जी अपना ही वादा भूल गए हैं। आज नरेंद्र मोदी सरकार में पेट्रोल-डीजल के दाम अब तक के सबसे उच्चतम स्तर पर हैं।

कांग्रेस है कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी के लिए जिम्मेदार?

बढ़ती कीमतों पर बोलने से कुछ बीजेपी नेता जब बच रहे थे तो PM नरेंद्र मोदी ने कहा कि ‘पिछली सरकारों ने देश के ऊर्जा आयात पर निर्भरता में कमी पर ध्यान दिया होता तो मध्यम वर्ग पर इतना बोझ नहीं बढ़ता’, वहीं वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बढ़ती कीमतों पर सफाई देते हुए कहा कि ‘सरकार का कीमतों पर कोई नियंत्रण नहीं है, तेल कंपनियां कच्चे तेल का आयात करती हैं।’ क्या ये दोनों तर्क सही हैं? करीब 8-9 साल पहले अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से भी ऊपर चली गई थी तब भारत में पेट्रोल करीब 60 रु प्रति लीटर के हिसाब से मिलता था, पर यही कीमत पिछले वर्ष कोरोना महामारी की वजह से 20 डॉलर से भी नीचे आ गई तब ये कीमत काफी कम हो जानी चाहिए थी लेकिन यह 65-70 रु प्रति लीटर के भाव से ही बिक रहा था, हालात में अब जब सुधार हुआ और लॉकडाउन का ताला खुला तो यही कच्चा तेल करीब 52 डॉलर प्रति बैरल के भाव पर पहुंच गया तो तेल की कीमत 100रु के चक्कर काट रही।

यानी देखा जाए तो PM और वित्त मंत्री दोनों के बयान ही फर्जी हैं, वास्तव में पेट्रोल-डीजल की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भाव के हिसाब से तय नहीं होती है, गौर से देखा जाए तो इसमें केंद्र और राज्य सरकारों का हाथ होता है।

मुबारक: पेट्रोल-डीजल पर सबसे ज्यादा टैक्स लगाने वाला देश बना भारत

कच्चे तेल की कीमतें धड़ाम होने पर जनता को फायदा होना चाहिए पर ये फायदा केंद्र और राज्य सरकारों को होता है। जब कच्चे तेल की कीमतें गिरती हैं तो केंद्र तेल की कीमतों पर एक्साइज ड्यूटी में जबर्दस्त बढ़ोतरी करती है, कोरोना के वक्त बस यही हुआ था।

साल 2020 मार्च में इस टैक्स को 19.98 से बढ़ाकर 32.98 रु प्रति लीटर कर दिया गया था, इसी तरह डीजल पर 15.83 से बढ़ाकर 31.83 रु प्रति लीटर कर दिया गया था।

उदाहरण- डीजल के बेस प्राइस में अगर ढुलाई भाड़ा, एक्साइज ड्यूटी, वैट और डीलर कमीशन जोड़ा जाए तो यह समझ आएगा कि एक ग्राहक 60 फीसदी से ज्यादा टैक्स चुका रहा।

दाम बढ़ना ∝ चीजें महंगी होना

सरकार को भले ही छप्परफाड़ कमाई हो रही हो लेकिन डीजल-पेट्रोल का दाम बढ़ने का सीधा मतलब होता है कि चीजें महंगी हो जाना। विमानों का सफर महंगा होगा, ट्रक और ट्रैक्टर आज भी डीजल के भरोसे हैं, भारत में दो-तिहाई माल ढुलाई ट्रकों के जरिए होती है, कृषि संबंधी कई गतिविधियों के लिए डीजल जरूरी है। ग्रामीण क्षेत्रों की आर्थिक प्रगति में डीजल की अहम भूमिका है, ट्रांसपोर्ट चार्ज बढ़ने से चीजें महंगी होगी। सरकार की कमाई से आम इंसान को चोट पड़ती है।

मजबूरियों के चलते कम हुए दाम

जो काम जनता के विरोध-प्रदर्शन से नहीं हो पता वो काम कई बार नेताओं के राजनीतिक लाभ की संभावना से हो जाता है।भाजपा और सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर है, इस बीच CM ममता बनर्जी की सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर लगने वाले VAT में एक रुपये प्रति लीटर की कटौती करने का ऐलान किया है। असम सरकार ने भी 5 रुपये एडिश्नल टैक्स को हटा लिया, असम में भी चुनाव होने वाले हैं। राजस्थान और मेघालय में भी ग्राहकों को राहत मिली है।

चुनाव के पहले ये राज्य जनता को नाराज नहीं करना चाहते, यानी जब महंगाई बढ़े तो चुनाव का ऐलान कर दिया जाए।

अब महंगाई डायन नहीं विकास की अम्मा हो गई है

‘महंगाई डायन खाए जात है…’ गाने की इस लाइन का चुनावों में खूब इस्तेमाल होता है, 7 साल पहले प्रधानमंत्री मोदी से लेकर स्मृति ईरानी तक ने महंगाई के खिलाफ खूब नारे लगाए थे, गैस की क़ीमतें बढ़ने पर सिलेंडर लेकर प्रदर्शन की तसवीरें होती थीं, तब शोर मचाने वाली बीजेपी आज जनता का मुंह तक नहीं देख रही। कांग्रेस के समय ईंधन के दामों के खिलाफ सिने अभिनेताओं खासकर अमिताभ बच्चन व अक्षय कुमार ने ट्वीट किया था कि तेल 5-10 रुपये में बेचा जाए, लेकिन अब जब तेल 100 रु. के पार है तो ट्वीट नहीं कर रही। सबसे बड़ा सवाल तो योग गुरु बाबा रामदेव पर उठता है जो तब चिल्ला चिल्लाकर कहते थे कि बीजेपी के आने के बाद 35-40 रु. पेट्रोल डीजल मिलेगा लेकिन अब कह रहे कि थोड़ी साइकिल भी चलानी चाहिए।

“त्वाडा कुत्ता टॉमी, साडा कुत्ता कुत्ता” यूपीए सरकार में दाम 71 रुपये था तो शोर मचाती थी बीजेपी आज 100 पार पर पहुँच गया तो इसे देशहित और आत्मनिर्भरता का नाम दे दिया। अब अंधभक्त बिना कोई सवाल किए सीना चौड़ा कर के 100रु तेल खरीदेंगे।

2008 में BJP ने चलाई साइकिल, अब कांग्रेस मार रही पैडल, जनता कहां?

आसमान छूते दामों से पब्लिक को राहत भले ही न मिले, लेकिन सियासी विरोध हमेशा से तेज रहा है। जब केंद्र में कांग्रेस थी तब विपक्षी नेताओं ने साइकिल से मंत्रालय जाकर पेट्रोलियम पदार्थों के दामों की वृद्धि का विरोध किया था, लेकिन अब जब खुद सत्ता में बैठे हैं तो सायद साइकिल पंचर हो गई।  मध्य प्रदेश में पेट्रोल के दाम कई जिलों में 100 रुपए के पार है, 12 साल पहले CM शिवराज ने साइकिल चलाई थी अब पूर्व CM दिग्विजय साइकिल चला रहे, इन सब के बीच जनता कहां है, नहीं पता। सायद जनता ट्विटर पर ट्वीट कर रही, सोचने की बात ये है कि पक्ष हो या विपक्ष सब अपनी राजनीति खेल रहे, अगर हम परेशान हैं तो प्रदर्शन भी खुद करना होगा और सवाल भी खुद उठाने होंगे।

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source: https://www.molitics.in/article/789/modi-govt-is-increasing-petrol-diesel-price-in-india