मध्य प्रदेश के शिक्षकों और कितना करना होगा इंतजार, तीन साल से सरकार के सामने लगा रहे अर्जियां

बेरोजगारी का दंश झेल रहे युवाओं की लिस्ट इस देश में सबसे लंबी हो चुकी है। कोई भी ऐसा राज्य नहीं है जहां के युवा अपनी सरकार से खुश हों। कई राज्यों में सरकार ने भर्ती निकाली, अभ्यर्थियों ने परीक्षा दी। रिजल्ट जारी हुआ और तमाम युवा सफल हुए। लेकिन एक लंबा वक्त बीत जाने के बाद भी उन्हें नियुक्ति नहीं दी गई। ऐसे ही एक मामला भाजपाशासित मध्य प्रदेश का है.

साल 2018 में माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षकों की कुल 30 हजार 594 भर्ती निकाली गई। परीक्षा 2018 में ही होनी थी लेकिन विधानसभा चुनाव के कारण ये परीक्षा 2019 में हुई। परीक्षा का परिणाम जब आया तो राज्य में लोकसभा चुनाव को लेकर आचार संहिता लग गई जिसकी वजह से परिणाम थोड़ा लेट आया। परिणाम आने के बाद आम तौर पर अभ्यर्थियों को नियुक्ति दे दी जाती है लेकिन यहां ऐसा नहीं हुआ. 

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सफल छात्रों को लंबे वक्त तक लटकाए रखा गया। 2018 में शुरु हुई भर्ती 2021 आ जाने तक भी नहीं पूरी नहीं हो सकी है. नतीजा ये रहा की अभ्यर्थी हर दिन नेता मंत्री को ज्ञापन देने से लेकर ट्वीटर पर ट्रेंड करवाते रहते हैं लेकिन उनकी पुकार को अनसुना कर दिया जा रहा है। ध्यान रहे ये संघर्ष सिर्फ सोशल मीडिया तक ही सीमित नहीं है, अभ्यर्थी अब तक करीब 45 आंदोलन कर चुके हैं। इतने आंदोलन से तो आम तौर पर सरकारे गिर जाती हैं लेकिन बात जब विद्यार्थियों की आती है तो सरकार ही खेल करना शुरु कर देती है। 



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ये भर्ती निकली शिवराज सरकार में, परीक्षा हुई कमलनाथ की सरकार में, परिणाम आए शिवराज की सरकार में. नई, पुरानी और अलग सरकारों के बीच से गुजरने के बाद भी ये भर्ती अभी तक पूरी नहीं हो सकी हैं। सफल विद्यार्थी परेशान हैं, उनकी बातों को सरकार नहीं सुन रही है. 

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जून 2020 में दोबारा सत्यापन की प्रक्रिया शुरु हुई, अभ्यर्थियों की उपस्थिति शत-प्रतिशत थी लेकिन अचानक परिवहन साधन न होने का एक बचकाना सा बहाना बनाकर सत्यापन के काम को रोक दिया गया। इसके बाद तो सरकार ने इसकी चर्चा ही बंद कर दी। कुछ अधिकारी दबी जुबान से कहते हैं कि नियमों में बदलाव करके दोबारा से सत्यापन का काम शुरु करेंगे। अब सवाल है कि जो नया नियम लगाएंगे क्या वह अभ्यर्थियों के हित में होगा या नहीं. जब परीक्षा पुराने नियम पर हुई तो नए नियम से भर्ती करने का क्या औचित्य। 

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इस मामले को लेकर कांग्रेस भी लगातार मुखर रही है, पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने शिवराज सरकार से जल्द नियुक्ति देने की अपील की। कांग्रेस के ट्वीटर हैंडल पर भी इस भर्ती के पूरे करने की अपील लगातार की जाती रही है। प्रदेश भाजपा उपाध्यक्ष राघवेंद्र शर्मा ने तो शिवराज सिंह से भी इस मामले को लेकर बात की लेकिन सिवाय आश्वासन के कुछ नहीं मिला। चुनाव के वक्त बड़े बड़े वादे करके सत्ता हासिल करने वाली पार्टियां चुनाव के बाद कैसे पलट जाती हैं इसका जीता जागता उदाहरण शिवराज सरकार है। उम्मीद करते हैं कि जल्द से जल्द शिक्षक भर्ती पूरी हो।

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“Shadow Pandemic”: Predator and Prey

“Shadow Pandemic”: How Gender-based violence increased during Lockdown?

Not safe in the womb, not safe in the house, not safe in the streets, not safe in the dark, not safe in the light, not safe in suits, not safe in shorts, not safe in burquas, not safe anywhere, or let us say ‘NOT SAFE AMONG MEN’. If we talk about women, she may have realized that she is not safe in the public only until her husband, father, brother, uncle, son, or let us say “men”, made her realize that her own house wasn’t safe either.

Gender-based violence is a hidden consequence. It has appeared as a harsh reality when survival becomes the question. The lockdown which was imposed in March, to curb COVID 19 infections, lead to great challenges, mainly faced by women and children. Women individuals suffering violence at home feared unsafe to live because of selfish humans. On one hand, where people were suffering to struggle for their basic needs like food and shelter, on the other, the worst happened with the women. The organizations like UN Women, Ministry of Women and Child Development, and many more published various reports which proved that women were not safe at home. The difficulties arose when women and children didn’t have any means to contact these government and non-government organizations. So, suffering silently was the only option left for them. Maximum were the girl children who were abused by their family members at home and couldn’t approach any organization for protection.


According to the data released by National Commission for Women(NCW), the domestic violence cases during the lockdown increased from over 2.5 times. In some cases, women either locked themselves in the washrooms or hid somewhere to make an SOS call. Obviously, living in the same house as a victim with the perpetrator seemed to be hard. Fear of further getting abused restricted them to approach any organization for help. The National Bureau of Economic Research (NBER) considered the lockdown as a “shadow pandemic”. 

According to NBER’s data, the highest cases of violence and cybercrime against women/ children were observed in the areas that fell under the Red zones(strict lockdown measures). So, it was natural to falling of cases of rapes and sexual assault outside the home. Studies proved that the cases of domestic violence against women rose by 131 % and that of online abuse cases rose by 184 % in the red zones. The NCW’s data showed that Delhi and Uttar Pradesh recorded the highest number of cases of violence against women. There were thousands of cases left unreported as well.

Similarly, the cases of child sexual abuse, cyber-bullying, and other violence related to children saw a gradual rise during the lockdown. NGO named Protsahan India Foundation claimed that the lockdown was an eye-opener to the violence against child-rights.

According to the study, during the pandemic, over 55 % of adolescent girls have gone through gender-based discrimination and violence. 11 % were forced to get married even much before their legal age of marriage, 13 % faced incidents of sexual abuse. Not only this, 19 % of them were about to be get married and another 19 % were forced to work before the age of 15 years. So, this clarifies that there is no end to child rights violations in India. Globally also, this percentage is not as alarming as in India but the numbers can be substantial.

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काश कोई सुन पाए अच्छे दिन और रामराज से ज्यादा हमें सुरक्षा चाहिए!

दुष्कर्म, बलात्कार, रेप , चिरहरण और ना जाने कितने नाम. बलात्कार सिर्फ शरीर के साथ नहीं किया जाता है ये आत्मा को तार- तार कर देने के बराबर है. मरी हुई आत्मा के साथ एक जीते-जागते कंकाल को देखने का दुख पूछो उस परिवार से जो ना मरते मरे हैं, और ना जीते जी सकते हैं. अपने अंदर की हवस को मिटाने के लिए इंसान जानवर बन गया है और चंद घंटों की प्यास बुझाने का मूल्य वो किसी की आत्मा की हत्या कर वसूलता है.

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खैर अब ऐसी वारदातें आम है. हर गली, मोहल्ले और नुक्कड़ की यही कहानी है. हाल ही में एक मुद्दा बहुत सुर्खियों में बना रहा. हाथरस केस जहां 19 साल की दलित लड़की के साथ 4 लड़कों ने सामूहिक दुष्कर्म किया, जीभ काटी और कमर तोड़ दी. 14 दिन बाद पीड़िता ने दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में आखिरी सांस ली. जिसके बाद यूपी पुलिस का जो घिनौना चेहरा लोगों के सामने आया, उसकी किसी ने कल्पना भी न की होगी. लेकिन 14 दिन तक लोगों के रंगों में सजी ये दुनिया, अपनी रफ्तार में चलती रही, मामले के लाइमलाइट में आने के बाद हर कोई इंसाफ की मोमबत्ती लेकर मुहाने पर खड़ा हो गया. 
लेकिन क्या किसी ने सरकार से पूछा उस मोमबत्ती की लौ ने कितनों को इंसाफ दिलाया, क्या उसकी रोशनी से आने वाली नई पीढ़ी सुरक्षित रह सकेगी, क्या आने वाले समय में बच्चियां बिना डरे खुले में सांस ले सकेंगी? नहीं ये सब पूछना भूल गए तभी तो यूपी के उन्नाव जिले के असोहा इलाके के बबुरहा गांव में तीन दलित लड़कियां खेत में बंधी मिली जिसमें से दो की मौत हो गई और एक की हालत गंभीर बनी हुई है. इसके साथ यूपी के बागपत में 7 साल की दलित बच्ची की निर्मम हत्या कर दी गई दरिंदो ने बच्ची के शरीर पर चाकुओं से इतने वार किए कि बच्ची की लाश को नजर भरकर देख पाना भी मुश्किल है.

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शायद हाथरस के बाद सरकार से सवाल होते तो इन बच्चियों की बली न चढ़ती, अब यहां सवाल यह उठता है कि सिर्फ हाथरस की बेटी को इंसाफ क्यों? क्या आप जानते हैं कि भारत की एक तस्वीर ऐसी भी है, जहां हर दिन औसतन 87 बलात्कार के मामले दर्ज किए जाते हैं. देश में हर 15 मिन्ट में एक बलात्कार का मामला दर्ज होता है.
साल 2019 के दौरान महिलाओं के खिलाफ अपराधों के 4,05,861 मामले दर्ज किए गए हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी नवीनतम आंकड़ों से पता चलता है कि आंकड़ों में 2018 के मुकाबले सात प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है. वहीं देश में 2018 में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के 3,78,236 मामले दर्ज किए गए थे, जिसमें 33,356 मामले बलात्कार के दर्ज किए गए.
लेकिन इन आंकड़ों से क्या फर्क पड़ता है. शायद ये महिला न निर्भया होंगी और ना हाथरस की बेटी. आज हर कोई चिल्ला-चिल्लाकर इंसाफ की गुहार लगा रहा है. क्या कभी किसी ने सोचा कि एक बेटी को इंसाफ मिल जाने के बाद बलात्कार के मामलों में कमी आएगी? 
काश कोई ये सुन और समझ पाए अच्छे दिन और रामराज से ज्यादा हमें सुरक्षा चाहिए.


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अधिकतर रेप दलित बच्चियों के साथ, फिर क्यों न देखा जाए आरोपियों का जाति और धर्म?

रेप की सबसे अधिक घटनाएं सामाजिक व आर्थिक रूप से पिछड़े परिवारों के साथ होती हैं। दलित बच्चियांं सबसे सॉफ्ट शिकार होती हैं। इनके खिलाफ अपराध करने वाले व्यक्ति को पता होता है कि उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। अगर बात बढ़ी भी तो अपनी पहुंच व पैसे के दम पर मामला रफा दफा करवा देगा। दलित बच्चियों के साथ होने वाले अपराध में दलित आरोपियों के अलावा उच्च जाति के लोगों की भी संख्या अधिक रही है। दूसरी तरफ सामाजिक व आर्थिक रूप से मजबूत लोगों के घरों की बेटियों के साथ यौन उत्पीड़न की घटनाएं दलितों के अपेक्षा कम रही हैं। 

आप एक लड़की हैं, दलित हैं, गरीब हैं, समाज में कोई राजनीतिक हैसियत नहीं है तो आप कई स्तर पर रेप के लिए आरोपियों के निशाने पर हैं। ये कोई बड़ी बात नहीं है जिसे समझने के लिए अलग से दिमाग लगाना पड़े। जो कहते हैं कि बलात्कार में जाति मत देखो, धर्म मत देखो वो सिर्फ बकवास करते हैं। हां कई बार रेप केस में जाति फैक्टर नहीं होती। आर्थिक हैसियत या फिर राजनीतिक पहुंच भी कोई फैक्टर नहीं होती, कई बात तो सिर्फ एक स्त्री होना ही काफी होता है। 

अमेरिका समेत पश्चिमी देशों में ब्लैक एंड वाइट का भेद जबरदस्त है। वहां भी रेप के तमाम मामलों में ये फैक्टर बनता है। भारत में जाति की खाई लगातार गहरी होती गई जिससे रेप के तमाम मामलों जाति के साथ धर्म भी एक मैटर बन जाता है। परिवार में ही होने वाले रेप में जाति या धर्म मैटर नहीं होता। लैंगिग और जेंडर रोल्स वाले भेद ही अधिक प्रभावी होती है।

उन्नाव में दो बच्चियों की मौत के मामले पर जांच जारी है इसपर कुछ कहना जल्दबाजी होगी लेकिन इसके पहले हाथरस, गोरखपुर, मिर्जापुर व लखीमपुर खीरी में जो हुआ वहां जाति एक बड़ा मैटर बना। आरोपी के समर्थन में खड़ा होना, रैलियां निकालना ये एक नया ट्रेंड है। जातीय श्रेष्ठताबोध से भरे युवाओं के भीतर निचली जाति को लेकर नफरत भर गई। सबक सिखाने के लिए कई बार बलात्कार जैसी घटनाएं भी सामने आई हैं। 

सरकार के पास पावर व प्रचार माध्यम दोनो ही मौजूद है। वह स्थिति को संभाल सकती है लेकिन अधिकतर मामलों में तो दोषी सरकार की गोद में बैठे नेताओं के करीबी होते हैं फिर उन्हें बचाने के लिए तमाम तरकीबे निकाली जाने लगती है। यूपी में ये सबसे अधिक है। सरकार पीड़ित के परिवार को ही नजरबंद करने की कोशिश करती है। ऐसा इसलिए भी करते हैं क्योंकि इन्हें पता है कि वह सरकार के रूप में फेल साबित हो चुके हैं।

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सरकारी कंपनियों केे निजी हाथों में जाने से नौकरियों के साथ OBC-SC का आरक्षण भी खत्म हो जाएगा?

2013-14 में देश के भीतर यूपीए की सरकार थी। हर दिन सुबह अखबार खोलिए किसी नए भ्रष्टाचार का खुलासा हुआ रहता था। जनता के भीतर इन भ्रष्टाचारों को लेकर आक्रोश भर गया। उस आक्रोश का फायदा सीधे तौर पर उस वक्त की विपक्षी पार्टी भाजपा को मिला। भाजपा चुनावी तैयारियों में जुटी, तमाम नारे गढ़े गए। एक सबसे मशहूर नारा था ‘देश नहीं बिकने दूंगा’। नरेंद्र मोदी ने देश के हर हिस्सों में रैली की और ये नारा दिया।

जनता को भरोसा हो गया कि नरेंद्र मोदी इस देश के नए कर्णधार हैं और उनके हाथ में देश की कमान देने से देश सुरक्षित रहेगा। तरक्की के पथ पर तेजी से अग्रसर होगा। लेकिन आज सात साल बीत जाने के बाद पीछे मुड़कर देखते हैं तो पाते हैं कि उस वक्त जो भी बोला गया वह सिवाय चुनावी नारे के कुछ नहीं था। क्योंकि सत्ता में आते ही सरकार ने सरकारी कंपनियों को तेजी से निजी हाथों में देना शुरु कर दिया। 

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सरकारी कंपनियों के निजी हाथों में जाते ही सबसे अधिक असर SC-ST व OBC आरक्षण पर होगा। क्योंकि इसमें किसी तरह का कोई संदेह नहीं कि प्राइवेट कंपनियां आरक्षण के आधार पर भर्ती नहीं करेंगी। इस समय अन्य पिछड़ा वर्ग, अनूसूचित जाति व अनूसूचित जनजाति के युवाओं को सरकारी नौकरियों में 49.5 फीसदी आरक्षण मिलता है। उदाहरण के लिए आप देश की सबसे बड़ी सरकारी तेल कंपनी BPCL को ले लीजिए। जिसमें सरकार की करीब 53 फीसदी हिस्सेदारी है। भारी मुनाफे के बावजूद सरकार इसे बेचने की तैयारी में है। 1 जनवरी 2019 तक इस कंपनी में 11894 कर्मचारी कार्यरत थे। इसमें 2042 ओबीसी, 1921 एससी व 743 एसटी कर्मचारी थे। बीपीसीएल में जो भर्तियां हुई थी उसमें 95 फीसदी भर्तियां आरक्षण के तय मानकों पर ही हुई थी। लेकिन निजीकरण होते ही इन आरक्षित पदो को भी खुली भर्तियों के जरिए ही भरा जाएगा। यानी आरक्षण जैसी चीज बीपीसीएल में ख्वाब हो जाएगी। 

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पब्लिक इंटरप्राइजेज ने 2019 में एक सर्वे किया। इस सर्वे के मुताबिक सरकारी कंपनियों में इस समय कर्मचारियों की संख्या 15 लाख है। इसमें 10 लाख 40 हजार स्थायी कर्मचारी हैं। इन नौकरियों को आरक्षण के जरिए ही भरा गया है। प्राइवेट हाथों में जाते ही नौकरियों में आरक्षण की कोई गारंटी नहीं रह जाएगी। कई सारे लोग निजीकरण की खबरों को सुनकर इसलिए भी खुश हो रहे हैं कि इससे आरक्षण समाप्त हो जाएगा। लेकिन उन्हें ये पता ही नहीं कि यहां सिर्फ आरक्षण नहीं बल्कि नौकरियां की समाप्त हो रही हैं। ऐसे में नुकसान तो आपका भी हुआ। आखिर दूसरों के नुकसान पर कब तक खुश होते रहेंगे। 

तमाम सियासी विशेषज्ञ बताते हैं कि कंपनियों का निजीकरण आरक्षण को खत्म करने के लिए ही किया जा रहा है। उनकी बातों को हम खारिज नहीं कर सकते हैं। क्योंकि भाजपा के दिमाग में भारत सरकार का फायदा करवाने का उद्देश्य होता तो वह बीपीसीएल को क्यों बेचते। ये तो सोने का अंडा देने वाली मुर्गी जैसा है। अगस्त से दिसंबर की तिमाही में बीपीसीएल ने 27 सौ करोड़ रुपए से अधिक मुनाफा कमाया। हमें केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर का वह बयान भी नहीं भूलना चाहिए जिसमें वह कहते हैं कि सरकार फायदा या नुकसान देखकर कंपनियों को निजी हाथों में नहीं सौपती बल्कि जो प्राथमिकता के क्षेत्र में नहीं आते उन्हें ही निजी हाथों में सौंपा जाता है। अजब है क्या सरकार की प्राथमिकता में पेट्रोलियम पदार्थ नहीं आते हैं। 

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आरक्षण के मसले को लेकर मुखर रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल भाजपा की आरक्षण विरोधी नितियों का लगातार विरोध करते रहे हैं। उनका कहना है कि निजीकरण के जरिए पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग यानी पीएसयू में आरक्षण खत्म करने की तैयारी चल रही है। आरक्षण से बचने के लिए ही सरकार इसमें भर्ती नहीं निकाल रही बल्कि कॉन्ट्रैक्ट कर्मियों से काम करवा रही है। मोदी सरकार द्वारा प्रशासनिक सुधार के लिए लैटरल एंट्री का प्रावधान किया गया है। अलग अलग विभागों में बड़े पदों पर बाबुओं की पैराशूट एंट्री में आरक्षण जैसी जरूरी चीज को बाहर रखा गया है। इसमें भी अपने चहेतो को सीधे नियुक्ति दी जाएगी, नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी संभव है। एक तरह से लैटरल एंट्री ब्यूरोक्रेसी में निजीकरण की एक कोशिश नजर आती है। 

आरक्षण पर प्रहार और सरकारी कंपनियों को बेचने पर भाजपा को हमेशा से जोर रहा है। 2001 से 2004 के बीच अटल बिहारी वाजपेई की सरकार ने 14 बड़ी सरकारी कंपनियों को पूरी तरहह से प्राइवेट करने की कोशिश की। इंडियन एक्सप्रेस में क्रिस्टोफर जैफरलॉट ने एक लेख लिया, जिसमें उन्होंने बताया कि 2003 में केंद्र सरकार के एससी कर्मचारी 5.40 लाख थे 2012 में ये संख्या 16 फीसदी घटकर 4.55 लाख हो गई। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि किस तरह से सरकारी कंपनियों को निजी हाथों में सौपकर आरक्षण पर हमला किया गया। 

देश में अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी की कुल जनसंख्या 41 फीसदी है। 1992 में आरक्षण लागू होने से पहले सरकारी नौकरियों में इनकी संख्या काफी कम थी। लेकिन आरक्षण इनके लिए एक वरदान बनकर आया। 2004 तक केंद्र की सरकारी नौकरियों में १६ फीसदी कर्मचारी ओबीसी वर्ग के हो गए, 2014 आते आते इनकी संख्या बढ़कर 28.5 फीसदी हो गई। नौकरी लगने व पैसा मिलने के बाद इनके इनके जीवन में बदलाव आया। लेकिन प्राइवेटाइजेशन के बाद इनकी स्थिति खराब होना तय है। ये बात मैं हवा में नहीं बल्कि सबूत के साथ बोल रहा हूं। 

सन 2000 से 2003 के बीच भाजपा सरकार ने मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड, हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड, बाल्को, पारादीप फॉस्फेट्स लिमिटेड, एचटीएल लिमिटेड, इंडियन टूरिज्म डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड को भी पूरी तरह से बेचा जा चुका है। आपको जानकर हैरानी होगी किक 2003 में 32.69 लाख सरकारी नौकरी थी जो 2019 आते-आते 15.14 लाख हो गई। मतलब 16 साल के भीतर साढ़े 17 लाख नौकरियां कम हो गई। ऐसे वक्त में जब नौकरियां अधिक बढ़ाने की जरूरत थी तब कम की जा रही है। 

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2014 में मोदी सरकार सत्ता में आई, तब से अब तक सरकार ने 121 कंपनियों को आंशिक तौर पर या फिर पूरी तरह से निजी हाथों में सौंप दिया है। यही कारण रहा कि देश में बेरोजगारी 45 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई। मोदी सरकार ने इससे निपटने के लिए कुछ नहीं किया बल्कि आत्मनिर्भर भारत नाम का नया सिगूफा लोगों के बीच फेंक दिया। जब नौकरियां ही नहीं रहेंगी तो आत्मनिर्भर बनना लोगों की मजबूरी ही हो जाएगी। 

लगातार प्राइवेट होती कंपनियों के बीच इसमें भी आरक्षण की बात होती रही है, आरक्षण समर्थक कहते रहे हैं कि कंपनियों के सिलेक्शन बोर्ड में दलित, आदिवासी, ओबीसी, अल्पसंख्यक व महिला की बराबरी सुनिश्चित की जाना चाहिए लेकिन अभी तक इस मांग को अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका है। क्योंकि प्राइवेट कंपनियों को अपने फायदों से प्यार है। उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की समाजिक भागीदारी सुनिश्चित की जाए। 

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मंहगाई से जनता त्रस्त, मोदी सरकार मस्त, सरकार की प्राथमिकताओं में सिर्फ पूंजीपतियों का भला

सपा सांसद विशंभर प्रसाद निषाद ने पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से राज्यसभा में पूछा कि नेपाल और श्रीलंका में भारत से सस्ता पेट्रोल है, फिर यहां मंहगा क्यों। पेट्रोलियम मंत्री खड़े हुए उन्होंने कहा- बांग्लादेश व नेपाल में ₹57 से ₹59 रुपए प्रति लीटर केरोसीन मिलती है। भारत में केरोसीन की कीमत  ₹32 प्रति लीटर है। 

पिछले सात सालों से देश में यही हो रहा है, आप सवाल कुछ करेंगे जवाब कुछ मिलेगा। विरोध करेंगे तो देशविरोधी और विकासविरोधी बन जाएगें। आज कच्चा तेल ब्रेंट क्रूड 63.57 डॉलर प्रति बैरल के आसपास है। एक बैरल में 159 लीटर तेल आता है, एक डॉलर की कीमत आज 72.60 रुपए है। ऐसे में एक लीटर कच्चे तेल की कीमत 29 रुपए पड़ी। लेकिन आज देश के कई हिस्सों में पेट्रोल के दाम 90 से 100 के बीच में पहुंच गए हैं। 

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आप कांग्रेस गवर्नमेंट पर नजर डालेंगे तो पता चलेगा कि साल 2009 से 2014 के बीच कच्चे तेल के दाम 70 से 110 डॉलर के बीच रहे। लेकिन पेट्रोल के दाम 55 से 80 के बीच ही रहे। मतलब आज के मुकाबले कच्चे तेल के दाम दोगुना मंहगा था लेकिन दाम आज से करीब 20 रुपए प्रति लीटर सस्ता था। अब सवाल है कि ऐसा क्या हो गया जो बीच में इतनी मंहगाई आ गई। 

पहले पेट्रोल के भाव हर 15 दिन पर तय होते थे, भाजपा के सत्ता में आने पर इस व्यवस्था को बदल दिया गया। इसके पीछे एक कारण ये भी है कि पेट्रोल अगर ५ रुपए मंहगा होता था तो हंगामा हो जाता था, सरकार ने होशियारी दिखाई और हर दिन सुबह रेट तय करने लगे। इससे होता ये है कि हर दिन 40-50 पैसे भाव बढ़ जाते हैं और लोगों को पता भी नहीं चलता। यही होशियारी करके मोदी सरकार ने पिछले एक साल में करीब 19 रुपए पेट्रोल व 17 रुपए प्रति लीटर डीजल मंहगा कर दिया। 

राज्यसभा में कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने पूछा, देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें ऑल-टाइम हाई हैं, जबकि क्रूड के दाम ऑल-टाइम हाई नहीं है, सरकार बताए कि एक्साइज ड्यूटी को कितनी बार बढ़ाया गया है। जवाब में धर्मेंद्र प्रधान ने बताया कि क्रूड ऑयल का प्राइस 61 डॉलर चल रहा है, हमें टैक्स के मसले पर बहुत ध्यान देने होते हैं। अजीब है, टैक्स के मसलों पर ध्यान देना है तो क्या सरकार के लोगों की निगाह उन चंद पूंजीपतियों पर नहीं गई जिनकी पूंजी में लॉकडाउन के दौरान 13 से 14 लाख करोड़ रुपए बढ़ गई। लेकिन उनपर क्यों ही ध्यान दिया जाएगा, वह तो सत्ता पर बैठे नरेंद्र मोदी जी के मित्र जो हैं। 

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2014 में पेट्रोल पर जो टैक्स 11 रुपए प्रति लीटर था वह आज बढ़कर 30 रुपए से अधिक हो गया है। सरकारी कंपनियां बड़े स्तर पर निजी हाथों में सौंपी जा रही है, इससे सरकारी नौकरियों में भी कटौती हो रही है। सरकार ने अपने खजाने को भर लिया। और जनता के हितों सो सोचना बंद कर दिया। महंगाई कम करने का दावा करके सत्ता तक पहुंची भाजपा के शासनकाल में कोई भी चीज सस्ती नहीं हुई है। आम आदमी की इनकम भले न बढ़ी हो लेकिन उसके जेब पर भार जरूर बढ़ गया है। सरकार ने अंधभक्तों की इतनी बड़ी फौज खड़ी कर दी है कि आप कुछ बोलेंगे भी तो वह तपाक से बोल देंगे कि देशहित में तेल के दाम बढ़ाए जा रहे हैं। उनके कुतर्कों के आगे आपके तर्क पानी भरते नजर आएंगे। ये वक्त दर्शक बनकर देखते रहने का है। 

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किसान आंदोलन – हिंसा तो पहले दिन से हो रही है, एक्शन क्यों नहीं लेती सरकार?

हिंसा केवल लाठी भांजना, गोली चलाना नहीं होती। अपने अधिकारों का ग़लत प्रयोग करके दूसरों के अधिकारों का हनन भी हिंसा है। संस्थाओं के ज़रिए संविधान सम्मत संघर्ष की ग़लत छवि पेश करना भी हिंसा है। अपने ही देश के नागरिकों को कभी खालिस्तानी, कभी पाकिस्तानी, कभी गद्दार बता देना और आम लोगों के बीच इस राय को फैलाने की कोशिश भी हिंसा है।

लगभग 5 महीनों (2 महीनों से दिल्ली की सीमाओं में) से चल रहे आंदोलन की मांगों को लेकर अहंकारपूर्ण मौन भी हिंसा है। इन हिंसाओं पर तो कोई बात कर है नहीं रहा। चलिए उस हिंसा की बात करते हैं, जिसकी सब कर रहे हैं। पुलिस को धकियाया गया। बैरिकेड्स तोड़े गए। तलवारें लहराईं गईं। लाल क़िले पर जबरन कोई झंडा फहराया गया। ये सब हिंसा है और जो इसे हिंसा नहीं मानता वो ग़लत है। अब ये समझिए कि जब इतनी सारी हिंसा हुई, तो अगला कदम क्या होना चाहिए। पहचान करना कि हिंसा किसने की और क्यों की? जिनकी बात कोई नहीं कर रहा, वो हिंसा सरकार ने की और इसलिए की ताकि चन्द पूंजीपतियों को फ़ायदा पहुंचे। कानून पास करने का समय, तरीक़ा और बाद में आंदोलन के प्रति भाव ये मानने पर मजबूर करते हैं।


जिनकी सब बात कर रहे हैं, उसमें हिंसा किसने की बिल्कुल स्पष्ट नहीं है। फिर भी दो संभावनाएं हैं। या आंदोलनकारी किसानों ने की या फिर उन लोगों/संस्थाओं ने जो आंदोलन के नेतृत्व के हिसाब से आंदोलन का हिस्सा नहीं थे।

पहली संभावना पर बात करते हैं। मान लेते हैं कि आंदोलनकारी किसानों ने हिंसा की। एक बात याद रखिए कि सभी रास्तों पर हिंसा नहीं हुई। मोटे तौर पर ITO और पीरागढ़ी पर ये देखने को मिला। कारण क्या था? पुलिस ने तय रास्तों पर भी प्रवेश नहीं करने दिया। उनको भी रोके रखा। जिस कारण लाखों की संख्या में मौजूद आंदोलनकारी या तो बैरिकेड तोड़ने पर मजबूर हुए या तय रास्ते से इतर रास्ता चुनने पर। किसान नेता राकेश टिकैत ने भी ये बात कही और मौके पर मौजूद पत्रकारों ने भी देखा।


अब बात करते हैं दूसरी संभावना पर। किसान संयुक्त मोर्चा के योगेंद्र यादव के अनुसार पहचान करने के बाद वही लोग हिंसा में शामिल पाए जाएंगे जिनके बारे में पहले से जानकारी थी। ये लोग या तो कभी आंदोलन में शामिल थे है नहीं या बाहर कर दिए गए थे। पुलिस प्रशासन के पास इसकी सूचना थी। इनमें से एक थी किसान मजदूर संघर्ष समिति जिसने हमेशा आंदोलन में शामिल अन्य संगठनों से अलग रहे। दूसरे थे दीप सिद्धू, जो भाजपा नेता सनी देओल के छोटे भाई की तरह हैं। लाल क़िले पर जो निशान साहिब का झंडा फहराया गया उसके हीरो ये दीप सिद्धू ही थे। प्रधानमंत्री मोदी के साथ भी इनकी तस्वीर है


जिम्मेदारी किसकी बनती है?
नैतिक जिम्मेदारी आंदोलन का आह्वान करने वालों की बनती है। उन्होंने ये जिम्मेदारी ली भी और हिंसा के लिए माफी भी मांगी। व्यावहारिक जिम्मेदारी तो लॉ एंड ऑर्डर देखने वालों की है। कैसे कोई लाल किले पर तिरंगा फहरा गया? क्यों पूर्व सूचना के बावजूद किसान मजदूर संघर्ष समिति पर नज़र नहीं रखी गई? क्यों तय रास्ते भी अवरुद्ध किए गए?


ये वो सवाल हैं जिनका जवाब गृह मंत्री से अपेक्षित है। ये सवाल पूछे जाने चाहिएं। लेकिन नहीं पूछे जा रहे। क्योंकि लोगों को हिंसा से कोई दुख नहीं है। हिंसा से दुख होता तो गौरक्षा के नाम पर हुई बर्बरताओं के ख़िलाफ़ खड़े होते। रोज़ाना होती बलात्कार की घटनाओं और उसके बाद प्रशासनिक गुंडई के खिलाफ आवाज बुलंद करते। कड़कड़ाती ठंड में किसानों पर हुए वाटर कैनन के हमले के विरोध में इनका ज़मीर जागता।
लेकिन राहत साब के शब्दों में-
“ये लोग पांव नहीं, ज़ेहन से अपाहिज हैं
उधर चलेंगे जिधर रहनुमा चलाता है”

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लाल किले पर खालसा का झंडा फहराने वाला दीप सिद्धू भाजपाई? 24 घंटे बाद भी गिरफ्तारी क्यों नहीं?

पूरा देश 26 जनवरी को जब 72वां गणतंत्र दिवस मना रहा था तब करीब 10 लाख किसान 3 लाख ट्रैक्टरों के साथ दिल्ली के विभिन्न हिस्सों में परेड कर रहे थे। दोपहर तक सबकुछ बढ़िया चला लेकिन अचानक स्थिति बदली और आंदोलन में किसानों व पुलिसकर्मियों के बीच झड़प शुरु हो गयी। ये सब हो ही रहा था तभी एक कुछ ऐसा हुआ जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया। प्रदर्शन में शामिल दीप सिद्धू ने लाल किले की प्रचीर पर खालसा का झंडा फहरा दिया। ये एक ऐसी घटना थी जिसने गोदी मीडिया को मौका दे दिया और उसने पूरे आंदोलन को हिंसक बताने में लग गई, अपने घिनौने मंसूबों में वह कामयाब भी हो रही है। खैर बड़ा सवाल ये है कि ये दीप सिद्धू है कौन


एक लाइन में कहूं तो ये भाजपा कार्यकर्ता है। जो 2019 के लोकसभा चुनाव में बॉलीवुड अभिनेता सन्नी देओल के लिए प्रचार किया करता था। सन्नी देओल के लिए रैलियों में जनता को संबोधित करता और उनसे भाजपा को वोट देने की अपील करता। जैसे ही लाल किले पर खालसा का झंडा लगाने की खबर आई सन्नी देओल ने ट्वीट करके सफाई दी कि उनका और उनके परिवार का दीप सिद्धू से कोई संबंध नहीं है। ये अजब बात है। सन्नी देओल खुद उसे अपने बगल बिठाकर उसकी तारीफों के पुल बांध रहे हैं, चुनावी गाड़ियों में अपने बगल खड़ा कर रहे हैं लेकिन जैसे ही उसका दूसरा रूप सामने आया उससे पल्ला झाड़ने में लग गए। 

पंजाब के मुक्तसर जिले के दीप सिद्धू ने कानून की पढ़ाई की लेकिन वकालत में कैरियर बनाने के बजाय पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री में आ गया। शुरुआत में मॉडलिंग की लेकिन सफलता नहीं मिली। 2015 में ‘रमता जोगी’ फिल्म बनाई फिर भी नाम स्थापित नहीं कर सका। 2018 में ‘जोरा दास नम्बरिया’ फिल्म ने दीप सिद्धू की पहचान को इंडस्ट्री में स्थापित किया, उस फिल्म में ये भाई साहब गैंगेस्टर बने थे। शायद उसी का असर रहा कि ये वास्तविक जीवन में भी गैंगस्टर बनने निकल पड़े। 

सवाल ये है कि दीप सिद्धू क्या सच में किसानों का हितैषी है। पीछे जाएंगे तो कहानी साफ होगी। 25 सितंबर के दिन पंजाब के तमाम अभिनेताओं ने किसान आंदोलन का समर्थन किया और मोदी सरकार से नए कृषि कानून वापस लेने की बात कही। समर्थन देने वाले अभिनेताओं में दीप सिद्धू भी शामिल था, उसके समर्थन देने पर किसान नेता राजेवाल जी ने कहा था अरे वो क्या किसानों को समर्थन देगा वो तो मोदी मोदी ही करता है। 

25 जनवरी को दीप सिद्धू आधी रात सिंघु बॉर्डर पहुंचा उसने किसानों से कहा- हमारे नेता दबाव में हैं, अगर वह निर्णय नहीं ले सकते तो हमें निर्णय लेना होगा। इसके बाद गैंगस्टर से नेता बना लखबीर सिंह सिधाना ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा- हम रिंग रोड पर जाएंगे, अगर कोई विरोध करता है तो वह करता रहे। अगर कोई हमारे समर्थन में है तो वह मजदूर संघर्ष समिति को फॉलो करे। सुबह हुई वह तय मार्ग को तोड़ते हुए लाल किला पहुंच गए। प्रशासन मूक बनकर देखता रहा। और दीप सिद्धू निशान साहिब का झंडा लेकर ऊपर पहुंच गया। 

जब वह ऊपर चढ़ रहा था तब बड़ी संख्या में किसानों ने उसे नीचे उतर आने को बोल रहे थे लेकिन वह किसी की नहीं सुना। वायरल वीडियो में ये देखा जा सकता है। दीप सिद्धू ने अपनी सफाई में एक वीडियो जारी करते हुए कहा- हमने राष्ट्र ध्वज को नहीं हटाया बल्कि प्रतीकात्मक विरोध के तौर पर निशान साहिब का झंडा लगाया। ये सिख धर्म का प्रतीक है और इस झंडे को सभी गुरुद्वारा परिसर में लगाया जाता है। बात तो सही है, निशान साहिब तो हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपने सिर पर बांधते हैं। लेकिन सवाल ये है दीप सिद्धू, जब तुम्हें तिरंगा दिया जा रहा था तब तुमने उसे क्यों फेक दिया। देश की ध्वजा का सम्मान कैसे किया जाता है ये क्या तुम्हें नहीं पता?

किसान नेता एवं स्वराज इंडिया पार्टी के प्रमुख योगेंद्र यादव ने कहा, दीप सिद्धू और लखा सिधाना ने किसानों को भड़काने की कोशिश की। उन्होंने मांग की है कि इस बात की जांच होनी चाहिए कि एक माइक्रोफोन के साथ दीप सिद्धू लाल किले तक कैसे पहुंच गया। यही आरोप किसान यूनियन के हरियाणा प्रदेश अध्यक्ष गुरनाम सिंह ने भी लगाया, उन्होंने कहा, दीप सिद्धू ने किसानों को भड़काया और उन्हें मिसगाइड करके लाल किला ले गया। 

ध्यान रहे दीप सिद्धू को किसानों ने इसके पहले भी गाली देकर अपने आंदोलन से भगाया है, सिद्धू की जितनी फोटो भाजपा नेताओं के साथ है उससे कहीं कम किसानों के साथ है। मांग बस इतनी है कि सच्चाई सामने लाई जाए, दीप सिद्धू की पिछले एक महीने की कॉल डिटेल बाहर निकाली जाए, उसे लोगों के सामने रखा जाए कि आखिर किससे उसने बात की। किसके इशारे पर वह किसानों को लेकर लाल किला पहुंच गया। कहीं सच में इसके पीछे भाजपा तो नहीं। ये सवाल जल्द साफ होगा। 

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सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर उनकी मौत का किस्सा, क्यों भरोसा नहीं होता कि नेताजी की मौत हो चुकी है?

प्रस्तावना-

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जितनी चर्चा उनकी जयंती की नहीं होती उससे कहीं अधिक चर्चा उनकी पुण्यतिथि की होती है। नेताजी के ड्राइवर कर्नल निजामुद्दीन दावा करते हैं कि सुभाष चंद्र बोस की मौत विमान दुर्घटना में नहीं हुई। न सिर्फ वह बल्कि तमाम और लोग भी सुभाष चंद्र बोस को लेकर अलग-अलग दावा करते हैं, आज उनकी जयंती पर हम उन्हीं कुछ दावों पर बात करेंगे। 

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पराक्रम दिवस बना नेताजी की पहचान-

आजाद हिन्द फौज के संस्थापक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती से पहले केंद्र की मोदी सरकार का उनके प्रति प्रेम उमड़ आया और नेताजी की जयंती को पराक्रम दिवस के रूप में मनाने का फैसला कर दिया। इससे असर ये होगा कि आने वाले वक्त में न सिर्फ राजनीतिक पार्टियों के दफ्तर में बल्कि सांस्कृतिक मंत्रालय में इस दिवस को मनाना अनिवार्य हो जाएगा। हालांकि नेताजी के परपोते सीके बोस के मुताबिक जनता के भीतर नेताजी को लेकर प्रेम कभी कम नहीं था वह तो हमेशा से प्रेम दिवस के रूप में मनाती रही है। अगर सरकार ने ऐसा किया है तो इससे खुशी ही होती है। 

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जापान की मदद से बनाई फौज

सुभाष चंद्र बोस की देशभक्ति पर किसी तरह का कोई सवालिया निशान नहीं लगाया जा सकता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान उन्होंने अंग्रेजो के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और उनसे लड़ने के लिए जापान की मदद लेकर आजाद हिन्द फौज का गठन कर दिया। उसी वक्त उन्होंने नारा दिया ‘तुम मुझे खून दो हम तुम्हें आजादी देंगे’। इस नारे ने देश के युवाओं की मुर्दाशांति को झकझोर देने वाला था। उन्हें एहसास दिलाने वाला था कि तुम्हारा खून इस देश को आजाद करवा सकता है यही कारण रहा कि बहुत कम समय में सुभाष चंद्र बोस ने एक बड़ी फौज खड़ी कर ली। ये सब जब वह कर रहे थे उसी वक्त ब्रिटिश सरकार ने अपने गुप्तचरों के जरिए 1941 में उन्हें मौत के घाट उतारने का आदेश दे चुकी थी। ये बात नेताजी को भी मालूम थी इसलिए वह सतर्क रहे। 

पूर्वोत्तर राज्यों में ब्रिटिश के खिलाफ खड़े

नेताजी 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर के टाउन हाल के सामने सुप्रीम कमाण्डर के रूप में अपनी फौज को संबोधित करते हुए उसमें साहस भर रहे थे, तभी उन्होंने नारा दिया ‘दिल्ली चलो।’ जवान उत्तेजित थे और वह निकल पड़े, नेताजी ने जापानी सेना के साथ मिलकर कोहिमा व इम्फाल में ब्रिटिश सैनिको से लड़ाई लड़ी। नेताजी की ताकत इतनी बढ़ गई थी कि 21 अक्टूबर 1943 को उन्होंने स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार बनाई जिसे जापान, कोरिया, चीन, इटली व जर्मनी जैसे देशों ने मान्यता भी दे दी। अंग्रेजो को ये बात हजम नहीं हुई 1944 में दोनो सेनाओं के बीच फिर से भयंकर युद्ध हुआ, यहां भी नेताजी ने बाजी मारी और कई भारतीय राज्यों को अंग्रेजो से मुक्त करवा लिया। 

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कोहिमा का युद्ध सबसे ज्यादा व्यापक था, क्योंकि 4 अप्रैल से शुरु हुआ ये युद्ध 22 जून तक चलता रहा। इस युद्ध में जापानी सेना को पीछे हटना पड़ा, ये एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। 6 जुलाई 1944 को नेताजी ने रंगून के रेडियो स्टेशन से महात्मा गांधी के नाम एक प्रसारण जारी किया और उनसे निर्णायक युद्ध में विजय के लिए आशीर्वाद मांगा।  यही संदेश उनके जीवन का आखिरी संदेश रहा। कहा जाता है कि 18 अगस्त 1945 में नेताजी की मौत एक विमान दुर्घटना में हो गई लेकिन परिवार के लोग इसे खारिज करते हैं, 18 अगस्त को उनकी मौत का दावा हबीबउर रहमान करते हैं। वह कहते हैं कि विमान पर नेताजी सवार हुए और वह उड़ान भरते ही विस्फोट कर गया। जिससे नेताजी गंभीर रूप से जल गए, अस्पताल में भर्ती करवाया गया लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। 

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हालांकि उनके इस दावे को घर वाले खारिज करते हैं, वह कहते हैं कि नेताजी रूस में नजरबंद थे, यदि ऐसा नहीं है तो भारत की सरकार ने उनकी मृत्यु से संबंधित दस्तावेज अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं किए। उनका ये सवाल भी वाजिब ही है। विमानों के क्रैश होने और उससे होने वाली मौतों का आंकड़ा सरकार के पास होता ही है फिर सरकार उसे पब्लिक क्यों नहीं करती। 

नेताजी की मौत

नेताजी के ड्राइवर रहे कर्नल निजामुद्दीन बताते हैं कि नेताजी की मौत विमान दुर्घटना में हुई ही नहीं, उन्होंने दावा किया कि वह खुद नेताजी के साथ यूरोप और एशिया के देशों में गए, निजामुद्दीन ने बताया 1947 में उन्होंने बर्मा के सितांग नदी के किनारे उन्हें छोड़ा था, वहां से वह जापानी अफसरों के साथ चले गए थे, उसके बाद किसी भी तरह से कोई मुलाकात नहीं हुई। 

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कुछ साल पहले गुमनाबी बाबा का नाम बड़ा मशहूर हुआ था। गुमनामी बाबा फैजाबाद में लंबे वक्त तक रहे। वह फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते, बांग्ला और जर्मन भी बिना रुके बोलते। उनके पास महंगी सिगरेट, विदेशी शराब मिलती थी। 1985 में जब उनकी मौत हुई तब उनके पास से नेताजी की कुछ पुरानी फोटो भी प्राप्त हुई. जिससे कयास लगाया जाने लगा कि गुमनाबी बाबा ही सुभाष चंद्र बोस थे। क्योंकि बाबा के पास आजाद हिन्द की यूनिफार्म मिली, रोलेक्स की घड़ी मिली। शाहनवाज और खोसला आयोग की रिपोर्ट मिली। यही कारण है कि जब उनके अंतिम संस्कार की बात आई तो जहां भगवान श्री राम  ने जलसमाधि ली थी वहीं उनका अंतिम संस्कार किया गया। 

कुछ साल पहले देवनाथ दास की कहानी सामने आई थी, दरअसल पश्चिम बंगाल की सरकार ने नेताजी से जुड़ी कुछ फाइले सार्वजनिक की। इन फाइलों में नेताजी के दोस्त देवनाथ जी की चर्चा थी, देवनाथ ने 1945 में दावा किया था कि नेताजी चीन के मंचूरिया में है। दास ने दावा किया कि नेताजी को आाशंका थी की तीसरा विश्वयुद्ध होगा। वह देखना चाहते थे कि कौन भारत के साथ है और कौन दुश्मन देशों के साथ खड़ा है? हालांकि तीसरा विश्वयुद्ध हुआ नहीं। 

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नेताजी ने जिस ब्रिटिश सरकार की नाक में दम कर रखा था वहां की वेबसाइट का दावा है कि नेताजी की मौत 18 अगस्त 1945 को ही हो गई थी। एक अन्य वेबसाइड का तर्क है कि अगर सुभाष चंद्र बोस जिंदा होते तो वह ब्रिटिश सरकार से मुकाबला करते। हालांकि इन बातों का कोई इत्तेफाक नहीं रह जाता। नेताजी की मौत आज भी राज है। राज से कब पर्दा उठेगा ये आज भविष्य के गर्भ में छिपा है। 

 

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यूपी में चोर-चोर मौसेरे भाई की प्रथा टूटी! चोर नहीं बल्कि अब पुलिस ही लूट करने लगी

लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान सीएम योगी आदित्यनाथ ने एक रैली में कहा था कि गुंडे-बदमाश और लुटेरे यूपी छोड़कर कहीं और चले जाएं वरना उन्हें वहां पहुंचा दिया जाएगा जहां वह जाना नहीं चाहते। उनके कहने का आशय एनकाउंटर से था। शायद उनकी इस बात से गुंडे डर गए और यूपी छोड़कर चले गए। ऐसे में पुलिस को लगा कि ऐसा ही रहा तो योगी जी पुलिस की जरूरत को खत्म बताकर विभागों में छंटनी कर देंगे। इसलिए वह स्वयं ही लूट करने लगे। लूट भी कोई मामूली नहीं बल्कि पूरे 30 लाख की। वो भी कहीं और नहीं बल्कि सीएम योगी के गृह जिले गोरखपुर में ये अनोखी घटना घटी है। मामला जानने की बड़ी बेचैनी हो रही है तो चलिए बता देते हैं। 

20 जनवरी को महराजगंज जिले के स्वर्ण व्यापारी दीपक वर्मा और रामू वर्मा गहनों की खरीद के लिए बस के जरिए लखनऊ जा रहे थे। रास्ते में पड़ा गोरखपुर और वहां मिल गई योगी की ठांय ठांय पुलिस। कस्टम अधिकारी बनकर दरोगा जी दो सिपाहियों के साथ बस में चढ़े और स्वर्ण व्यापारियों को पकड़ लिया। पूछताछ के नाम पर नौसढ़ ले गए। वहां दरोगा व दोनो सिपाहियों ने मिलकर दोनो व्यापारियों को पीटा और गहनों व रुपए से भरा बैग छीनकर चल दिए। दोनो व्यापारी किसी तरह नजदीकी थाने पहुंचे और मामला दर्ज करवाया। 

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पुलिस को पहले लगा कि कोई गिरोह नकली पुलिस बनकर व्यापारियों के साथ खेल कर दिया। अब चूंकी मामला वर्दी में लूट का, 30 लाख की भारी रकम का व योगी जी के गृह जिले का था इसलिए पुलिस हरकत में आ गई। जहां घटना हुई थी वहां लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज निकाली गई तो एक बोलेरो नजर आई। उस बोलेरो के नंबर की जांच हुई तो वह बस्ती की निकली। पुलिस ने बोलेरो को कब्जे में लिया। इसके बाद तो पूरी कहानी ही खुल गई। चालक ने बताया उसे तो पुरानी बस्ती थाने में तैनात दरोगा धर्मेंद्र यादव ले गए थे। ड्राइवर के इस कबूलनामे के बाद पुलिस ने छापेमारी करके दरोगा धर्मेद्र, दो सिपाही महेंद्र व संतोष को गिरफ्तार कर लिया गया। 

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पुलिस ने पूछताछ शुरु की तो पता चला कि सारा माल एक गेस्टहाउस में रखा है। इतनी बड़ी घटना को अंजाम देने से पहले अपराधी छोटी मोटी घटनाओं को अंजाम देता है, पुलिस पूछताछ में उससे पुरानी घटनाओं के बारे में भी पूछताछ करती है, ऐसा यहां भी हुआ। कड़ाई से पूछताछ हुई तो पता चला कि 31 दिसंबर को शाहपुर के खजांची चौक के पास यही दरोगा कस्टम अधिकारी बनकर सुशील वर्मा से चार किलो चांदी लूट लिया था। सुशील मामला दर्ज करवाने पुलिस के पास गए लेकिन जब लुटेरे ही वर्दीवाले हो तो चोर किसे साबित करके पकड़ें। वह मामला भी दबा रह गया। पुलिस पर भरोसा न होने का एक कारण ये भी है। 

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डीआईजी जोगेंद्र कुमार ने 21 जनवरी को पुलिस लाइन में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने बताया की बस्ती थाने में तैनात इंस्पेक्टर अवधेश राज सिंह समेत 12 पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया है। इसकी जांच एसपी को सौंपी गई है। पुलिस आरोपियों के खिलाफ रासुका व गैंगस्टर के तहत कार्रवाई करने की बात कही है। जोगेंद्र कुमार ने बताया कि जांच के बाद आरोपियों की संपत्ति भी जब्त की जाएगी। पुलिस जितनी कार्रवाई की बात कर रही है अगर इतना होता है तो समाज में एक बेहतर संदेश जाएगा। लेकिन सवाल अभी भी बना है कि आखिर ये मुस्तैदी पहले क्यों नहीं दिखाई देती। 

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नकली पुलिस बनकर लूट की घटनाएं तमाम सामने आ रही हैं। ऐसे में लोगों को ये भरोसा करना मुश्किल हो रहा कि असली कौन और नकली कौन। कई बार तो उनका वीडियो बनाने लगो तो ऐसे चढ़ बैठते हैं जैसे खा जाएंगे। ये सभी बातें पुलिस वालों को भी पता है, लेकिन इसकी पड़ताल करना मुनासिब नहीं समझते हैं। योगी जी जिन पुलिसवालो को दूसरे राज्यों में जाकर मसीहा बताते हैं वह कभी लूट कर रहे तो कभी थाने से ही सेक्स रैकेट चला रहे हैं। पुलिस के ये सारे पाप एनकाउंटर के जरिए नहीं ढांके जा सकते हैं। 

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