अर्नब गोस्वामी पत्रकार के भेष में सरकारी दलाल बना और भारतीय शहीदों की शहादत पर भी जश्न मनाने से नहीं चूका

अर्नब गोस्वामी को लेकर लोगों के भीतर जो थोड़ी बहुत इज्जत बची थी वह भी वाट्सऐप चैट लीक मामले के बाद खत्म हो गई। ऐसा हम नहीं बल्कि सोशल मीडिया पर उन लोगों के कमेंट बता रहे हैं जो पिछले करीब एक साल से अर्नब बनाम कौन पूछ रहे थे। लेकिन कुछ सवाल आज भी पूछे जाने बाकी हैं, पहला ये कि इतने बड़े खुलासे के बाद भी मीडिया में चुप्पी क्यों है? आखिर अर्नब से मीडिया कितना डरता है? क्या यहां भी सरकार के साथ अर्नब का गठजोड़ बाकी के संस्थानों को बोलने से मना करता है? क्या उनके भीतर ऐसी क्षमता नहीं कि वह खुलकर अर्नब के खिलाफ बोल सकें?

पार्थो दास गुप्ता के साथ हुई बातचीत का जो वाट्सऐप चैट वायरल हुआ उसमें अर्नब एक जगह इंडिया टीवी के वरिष्ठ पत्रकार रजत शर्मा व टाइम्स नाऊ की प्रमुख पत्रकार नविका कुमार को कचरा बोलता है, फिर भी दोनो पत्रकारों ने किसी तरह से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। रजत शर्मा ने 16 जनवरी को ट्वीट करते हुए लिखा- ‘चुप हुँ यूँ नहीं कि अल्फ़ाज़ कम हैं, चुप हुँ यूँ  कि अभी लिहाज़ बाक़ी है’ इस ट्वीट को अर्नब के मामले से जोड़कर देखा जा रहा है, ऐसा कहा जा रहा कि रजत शर्मा इशारों इशारों में अर्णब से गुस्सा होने की बात कह रहे हैं। हालांकि नविका कुमार ने किसी तरह की कोई बात नहीं कही है।

असल में सवाल ये है कि स्टूडियो में बैठकर देशभक्ति और देशद्रोही का सर्टिफिकेट बांटने  वाले अर्नब को इस खुलासे के बाद आतंकी नहीं कहा जाना चाहिए? आखिर पुलवामा में शहीद हुए जवानों पर कौन खुश होकर कहता है – “This Attack We Won Like Crazy,” जब पूरा देश शहीदों की मौत से गम में था तब अर्नब उस हमले से टीआरपी कैश कर रहा था, चैट में दावा कर रहा था कि भाजपा इस हमले को कैश करने में कोई कसर नहनीं छोड़ेगी। ये सोचने वाली बात है कि क्या इस देश में जवानों की जान टीआरपी और वोट से भी सस्ती है?

अर्नब गोस्वामी चैट में सूचना प्रसारण मंत्री को हटवाने की बात करता है, वह पार्थोदास को लिखते हैं कि उन्हें सूचना प्रसारण मंत्रालय छोड़ देना चाहिए, मैने पीएमओ से मुलाकात की है। आप सोचिए एक कथित मजबूत सरकार जो खुद को ईमानदार भी बताती है उसके भीतर एक पत्रकार अपने निजी फायदे के लिए मंत्री तक बदलवा रहा था। अर्नब बार्क की गतिविधियों के बारे में पीएमओ को खबर पहुंचाता रहता था, वह इस चक्कर में भी था कि कैसे दूरदर्शन के जरिए रिपब्लिक भारत को लाभ पहुंचाया जाए। 

अर्नब मंत्रियों को बेकाम का बताता है, पत्रकारों को कचरा बोलता है, पुलवामा हमले पर जश्न मनाता है, टीआरपी कैश करने की बात करता है लेकिन अभी तक सरकार की तरफ से किसी भी तरह की प्रतिक्रिया नहीं आई है। नीरा राडिया टेप कांड के वक्त याद करिए कितना हंगामा मचा था जबकि वह इससे गंभीर मामला भी नहीं था लेकिन यहां सत्ता पक्ष के साथ साथ विपक्ष की भी चुप्पी सवाल खड़े करती है। भाजपा का तो समझ आता है कि उन्होंने अपनी इमेज चमकाने के लिए चैनलों का इस्तेमाल किया, विपक्ष का नहीं समझ आता, आखिर वह चुप क्यों है?


अर्नब के पास इतनी ताकत कहां से आई कि  वह देश के सम्मानित मंत्रियों व पत्रकारों को हटाने तक का दावा करने लगा, आखिर उसका भारत सरकार से क्या रिश्ता है जो वह मंत्री पदों के निर्धारण तक ममें भूमिका निभाने लगा। देश की जनता को ये बात पता होनी चाहिए कि जो रोज शाम सात बजे किसी को भी देशद्रोही बता देता था असल में वही सबसे बड़ा दगाबाज है। उसे बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक की भी जानकारी रहती है उसे पीएमओ के भीतर कामकाज की भी क्योंकि वह इस कथित ईमानदार सरकार में मजबूत पावर ब्रोकर है, पावर ब्रोकर समझते हैं? सत्ता का दलाल। जिसे एक पार्टी के समर्थक सबसे बड़ा देशभक्त पत्रकार समझते हैं। 
 

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आखिर दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल के डॉक्टरों ने कोरोना का टिका लगवाने से क्यों कर दिया मना?

कोरोना महामारी के बीच 16 जनवरी 2021 का दिन भारत के लिए ऐतिहासिक रहा। पूरे देश में एक साथ वैक्सीनेशन का काम शुरु हुआ। हर राज्यों के लगभग हर जिलों में बूथ बनाए गए जहां लोगों को महामारी से बचाव हेतु टिका लगाया गया। भारत ने दो वैक्सीन को आपतकालीन मंजूरी दी है। पहली ऑक्सफर्ड-एस्ट्राजेनका की बनी कोविशील्ड और दूसरी भारत बायोटेक की कोवैक्सीन। कोविशील्ड भी देश के भीतर पुणे स्थित सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया में बनी। कोविशील्ड को लेकर तो कोई दिक्कत नहीं है लेकिन कोवैक्सीन को लेकर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं। 

शनिवार को जब टिकाकरण की शुरुआत हुई तो दिल्ली के राम मनोहर लोहिया हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने कोवैक्सीन का टीका लगवाने से मना कर दिया। अस्पताल के रेजिडेंट डॉक्टरों ने मेडिकल सुपरिटेंडेंट को एक चिट्ठी लिखी है उसमें उन्होंने लिखा-

हमें पता चला है कि भारत बायोटेक की बनाई कोवैक्सीन को कोविशील्ड पर प्राथमिकता दी जा रही है, हम आपकी जानकारी में लाना चाहते हैं कि रेजिडेंट डॉक्टर्स भारत बायोटेक की कोवैक्सीन के अधूरे ट्रायल को लेकर सशंकित हैं, मुमकिन है कि वे वैक्सीनेशन ड्राइव में बढ़-चढ़कर हिस्सा न लें। इससे वैक्सीन का मकसद भी अधूरा रह जाएगा। इसलिए विनती है कि कोविशील्ड से वैक्सीनेट करें, जो की सभी ट्रायल पूरा करके तैयार की गई है।’

इस चिट्ठी के बाद तमाम हलचल शुरु हो गई। कांग्रेस के सांसद मनीष तिवारी ने भी वैक्सीन पर सवाल उठाते हुए कहा-

‘कोवैक्सीन के सुरक्षित और प्रभावी होने पर तमाम दुविधा है, सरकार ने किसी के सामने वैक्सीन चुनने की सुविधा नहीं दी है। ये जानकारी या रजामंदी के खिलाफ है, अगर वैक्सीन इतनी ही सुरक्षित और प्रभावी है तो फिर वैक्सीन लगवाने के लिए सरकार की तरफ से कोई वैक्सीन लगवाने के लिए आगे क्यों नहीं आ रहा है?’ 

मनीष तिवारी का सवाल जायज भी है क्योंकि दुनिया के तमाम देशों में राष्ट्रप्रमुखों ने ही सबसे पहले वैक्सीन का डोज लेकर देश के लोगों में भरोसा भरा। 


दिल्ली एम्स के प्रमुख रणदीप गुलेरिया ने आज कोरोना का टीका जरूर लगवाया लेकिन उन्होंने भी पिछले दिनों कौवैक्सीन को बैकअप वैक्सीन बता दिया था, गुलेरिया के बयान पर भारत बायोटेक ने आपत्ति जताई थी और कहा था कि वैक्सीन पूरी तरह से सुरक्षित है। शनिवार को गुलेरिया ने वैक्सीन लगवाने के बाद मीडिया से बात कही और कहा कि किसी को भी वैक्सीन से घबराने की जरूरत नहीं है। हालांकि उन्होंने ये नहीं बताया कि उन्होंने कोवैक्सीन लगवाई है या फिर कोविशील्ड। 

फिलहाल कोरोना से जूझ रहे देश में वैक्सीन किसी संजीवनी से कम नहीं है। जिंदगी और मौत के बीच वैक्सीन एक विकल्प बनकर सामने आई है। हालांकि इसके सुरक्षित होने पर अभी सवाल जारी है। उम्मीद है कि वैक्सीन सुरक्षित निकले। क्योंकि कोरोना ने हर स्तर पर देश को व देश की जनता को चोट कर चुका है। 

 

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जन्मदिन विशेष : 65 बरस की मायावती आखिर क्यों तैयार नहीं कर सकी अपना विकल्प?

Author :- RAJESH SAHU

उत्तर प्रदेश की राजनीति कभी भी एकतरफा नहीं चली। जब भी किसी पार्टी ने चुनाव जीता अगली बार वह सत्ता पाने के लिए संघर्ष करती नजर आई। लेकिन वर्तमान स्थिति पुराने इतिहास से अलग नजर आती है। भाजपा ने पिछला विधानसभा चुनाव प्रचंड बहुमत से जीता और आने वाले चुनाव में भी वह अभी तक सारी पार्टियों से आगे नजर आती है। इसकी सबसे बड़ी वजह कुछ और नहीं बल्कि विपक्ष की सुस्ती है। 15 जनवरी को मायावती 65 साल की हो गई। इसलिए ऐसा माना जा रहा कि 2022 यूपी विधानसभा उनके जीवन का आखिरी चुनाव होगा। सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर तीन दशक से राजनीति में सक्रिय 4 बार की मुख्यमंत्री मायावती ने अपना विकल्प क्यों तैयार नहीं किया?

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कांशीराम जी ने 1981 में एक संगठन बनाया, जिसका  नाम रखा DS4, इसका नारा उन्होंने दिया ‘ब्राह्मण, ठाकुर बनिया छोड़, बाकी सब हैं DS4’. यही DS4 अगले तीन साल बाद यानी 1984 में बहुजन समाज पार्टी में बदल गया। 1989 में बसपा ने यूपी विधानसभा चुनाव लड़ा और 13 सीट जीतने में सफल रही। दलितों के उत्थान के लिए बनी इस पार्टी ने किसी भी समान्य सीट पर किसी दलित को प्रत्याशी नहीं बनाया था, इसके बावजूद उन्हें दलितों के वोट खूब मिले। मायावती ने विधानसभा के बजाय लोकसभा चुनाव के जरिए राजनीति में प्रवेेश किया, 1989 में वह पहली बार सांसद बनी और 1995 में देश की पहली अनुसूचित जाति की मुख्यमंत्री बनी। 

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उस वक्त की सियासत अस्थिर थी, दो साल बाद ही सरकार गिर गई लेकिन 21  मार्च 1997 को मायावती दूसरी बार प्रदेश की सीएम बनी। 3 मार्च 2002 को मायावती तीसरी बार मुख्यमंत्री बनी लेकिन इसबार वह 5 महीने बाद ही सरकार से बाहर हो गई। हालांकि तब तक बसपा की कमान वह खुद सम्भाल चुकी थी। मुलायम सिंह यादव की सरकार के खिलाफ अकेले ही मोर्चा खोले रखा। हर मुद्दे पर बेबाकी से बात रखी, यही कारण रहा कि 2007 में वह चौथी और आखिरी बार पूर्ण बहुमत के साथ मुख्यमंत्री बनने में सफल रही। पांच साल राज किया। 2012 में वह उस जीत को बरकरार नहीं रख सकी और हार गई। इस तरह से बसपा का स्वर्णिम युग खत्म हो गया। 

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करीब एक दशक से सत्ता से दूर मायावती के अंदर अब सत्ता हासिल करने की ललक नहीं दिखाई देती। जो आक्रमकता उनके भीतर पहले दिखती थी वह धीरे धीरे गायब होती चली गई। यही कारण रहा कि उनके खेमे के सबसे भरोसेमंद साथी स्वामी प्रसाद मौर्या, नसुमुद्दीन सिद्दीकी पार्टी छोड़कर दूसरे खेमें में चले गए। कहा जाता है कि इन दोनो ही नेताओं ने मायावती को रिप्लेस करने की कोशिश की इसलिए इन्हें बाहर कर दिया गया। मायावती को अपने खिलाफ उठती आवाज पसंद नहीं है, वह ‘एकला चलो’ की नीति पर भरोसा करती हैं, यही कारण है कि इतने सालों बाद भी जब बसपा में नंबर दो खोजा जाता है तो कोई नजर नहीं आता। 

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2019 के लोकसभा चुनाव में मायावती के साथ मंच पर  उनका भतीजा आकाश दिखाई देता था, कहा जा रहा था कि मायावती का उत्तराधिकारी यही बनेगा लेकिन चुनाव के बाद आकाश एकदम गायब हो गए। ऐसे में ये विकल्प भी चर्चा शुरु होने से पहले खत्म हो गया। भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद रावण इस समय दलितों के बड़े नेता बनकर उभरे हैं। वह मायावती व बसपा से कई बार नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश की लेकिन मायावती ने उन्हें एकदम भाव नहीं दिया। एकबार तो बिना नाम लिए मंच से चंद्रशेखर पर निशाना साधा और उन्हें भाजपा का आदमी बना दिया। हालांकि चंद्रशेखर ने इसपर किसी तरह की आक्रमक प्रतिक्रिया नहीं दी। वह आज भी मायावती को बहन और सामाजिक न्याय की देवी मानते हैं।

मायावती के अंदर जो आक्रमकता थी वह धीरे धीरे खत्म होती गई। इस समय देश में बड़ा किसान आंदोलन चल रहा है, बसपा की राजनीति में किसान-मजदूर प्रमुख हैं लेकिन मायावती मुखरता से विरोध करती नजर नहीं आई। ऐसा भी कहा जाता है कि भ्रष्टाचार के तमाम मामलों ने उन्हें कड़े फैसले या फिर भाजपा का विरोध करने से रोक दिया है। पिछले दिनों हाथरस में दलित बच्ची के साथ जघन्य अपराध हुआ था, सभी पार्टियों के दिग्गज नेता पहुंचे लेकिन मायावती नहीं गई। यहां तक की बसपा की कोई टीम भी वहां नहीं पहुंची।

फिलहाल मायावती इस समय बसपा का आखिरी और एकमात्र स्तंभ हैं, कोई दूसरा तैयार होता नजर नहीं आता। भाजपा ने बसपा के परम्परागत वोटो में सेंधमारी की है। बसपा ने उसे रोकने की कोशिश भी नहीं की, एक दशक से सत्ता से दूर पार्टी ने वोट बैंक को मेनटेन रखने के लिए किसी भी तरह का नया प्रयोग नहीं किया। दूूसरे दल जहां सोशल मीडिया के जरिए खुद को जनता से जोड़े रखा वही बसपा इससे दूर रही। 65 साल की हो चुकी मायावती शुरु से लेकर आखिरी तक पार्टी की सर्वेसर्वा रही। 2022 चुनाव में वह अकेले दावेदारी करती हैं या फिर किसी नए दल के साथ सत्ता बनाती हैं ये देखना दिलचस्प होगा लेकिन इतना तो तय है कि इस चुनाव में हारने के बाद मायावती की राजनीति खत्म हो जाएगी। 

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जिन मुसलमानों ने देश की आजादी में सबसे आगे कुर्बानी दी उन्हें ‘दोयम दर्जे’ का नागरिक बनाने पर क्यों तुली है भाजपा?

दोस्ती व भाईचारा के बीच कोई दीवार ना लाएंगे
तुम राम नाम का जाप करों, हम दरगाह में चादर चढ़ाएंगे…

क्या ऊपर लिखी छोटी सी दो पंक्तियाँ गलत हैं? क्या ये दो पंक्तियाँ हमें धर्म परिवर्तन करने को कह रही? क्या ये दो पंक्तियाँ एक सही कदम नहीं?

नए भारत में मुसलमानों की स्थिति बदल रही है, देश में मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने के लिए हमेशा मौक़े की ताक पर रहने वाले कुछ तत्व उन्हें दबाने में लगे रहते हैं, बहुत ही सुनियोजित ढंग से RSS के अलावा सभी आवाज़ों को दबा दिया गया है।

इतिहास (भारत की आज़ादी से शुरुआत करते हैं)


युसूफ मेहरली ही वो शख्स थे जिन्होंने ‘Quit India’ यानी भारत छोड़ो का नारा दिया था, ये वही नारा था जिसे गांधीजी ने 1942 में भारत की आजादी के लिए छेड़े गए सबसे बड़े आंदोलन के लिए अपनाया था।
मुसलमानों ने भारत की आज़ादी में बहुत ही क्रांतिकारी भूमिका निभाई थी, असहयोग आंदोलन की भी शुरुआत उन्होंने ही की थी, बैरिस्टर आसिफ अली ने भगत सिंह का केस तब लड़ा था जब कोई भी भगत सिंह का साथ देने को तैयार नहीं था, हसरत मोहानी वो शख्स थे जिन्होंने ‘इंक़लाब जिंदाबाद’ का नारा दिया था। जय हिन्द का नारा जिसका बढ़ चढ़कर भारतीय सेना आज भी इस्तेमाल करती है उसे आबिद हसन सफ़रानी ने दिया था। सुरैया तैयबजी वो महिला थी जिन्होंने तिरंगा को डिजाईन किया था। अगर मुसलामानों ने भिवा रामजी आंबेडकर का साथ नहीं दिया होता तो उन्हे संविधान लिखने का मौका नहीं मिला होता, कल का लिखा सारे जहाँ से अच्छा आज भी लोगों के दिलों में जिन्दा है, ऐसे करोड़ों मुसलमान हैं जिन्होंने हिन्दुओं के साथ मिल कर भारत की आज़ादी के लिए अपना सब कुछ खो दिया लेकिन आज उन्हें पहचानता कोई नहीं।

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अगर आज के टीवी, अखबार और नफ़रत फैलाने वाले तत्वों को खंगाला जाए, तो आसानी से हिसाब लगाया जा सकता है कि कितनी नफरत आज फैलाई जा रही। टीवी डिबेट में बैठे कुछ हिन्दू-मुस्लिम प्रवक्ता की जो सोच होती है वो आम जनता अपनी सोच बना लेती है। यह समझना बहुत जरूरी है कि जनतंत्र के लिए धर्म को राजनीति से अलग करना जरूरी है।

तब्लीग़ी जमात


कोरोना महामारी के वक्त भारत के अंदर मुसलमानों का सड़क पर निकलना मुश्किल कर दिया गया, कोरोना काल में हुए तब्लीग़ी जमात के आयोजन का संक्रमण फैलने का कारण बता दिया, कभी कोरोना जिहाद तो कभी मानव बम कहा गया। गोदी मीडिया ने कुल मिला के मुसलमानों को आतंकबादी बता दिया था। सोशल मीडिया के ज़रिए जमकर दुष्प्रचार किया गया था कि जमात के लोगों की वजह से ही कोरोना फैल रहा, पूरे जोर-शोर से हल्ला किया गया कि मुसलिम समुदाय ही ज़िम्मेदार है। ये काम ना केवल गोदी मीडिया का था बल्कि केंद्र सरकार के मंत्री, अफ़सरों, BJP के तमाम बड़े नेता भी इसे हवा दे रहे थे। पुलिस लॉकडाउन के दौरान सड़कों पर निकल कर नाम पूछ कर पिटाई कर रही थी, जमात के लोगों को बदनाम करने के लिए डॉक्टरों पर थूकने वाले फर्जी वीडियो और ख़बरें भी खूब वायरल हुई। गोदी मीडिया ने इसे थूक वाला जिहाद कहा था।

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इतने परपंच के बाद कोर्ट ने भी सरकारों की खिंचाई की थी, मीडिया को भी खूब खरी-खरी सुनाई थी जिसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपील की थी कि इसे किसी समुदाय विशेष से ना जोड़े।
बॉम्बे और पटना हाई कोर्ट के अलावा हैदराबाद और दिल्ली की स्थानीय अदालतों ने भी तब्लीग़ी जमात के सदस्यों के ख़िलाफ़ तमाम मुक़दमों को खारिज कर गिरफ्तार लोगों की रिहाई के आदेश जारी किए।

योगी जी का लव-जिहाद कानून


जब से भगवाधारी योगी यूपी के मुख्यमंत्री बने तब से  मुसलमानों के ज़ख्म बढ़ गए हैं, आशंका जताई जा रही है कि ये कानून धर्म विशेष के लोगों को टारगेट करके प्रताड़ित कर रहा, ऐसे कई मामले सामने आ रहे जहां अदालत में पुलिस को फजीहत झेलनी पड़ रही है। बजरंग दल के कार्यकर्ता उन्हें भी जबरन पकड़ रहे जो अपनी जिंदगी में खुश हैं, कोर्ट ने साफ साफ कहा है कि सबको अपना पार्टनर चुनने का हक है। कहीं मुस्लिम युवकों को जबरन उस मामलों में फसाया जा रहा जो उन्होंने किया ही नहीं, बरेली पुलिस ने जांच के बाद बताया कि तीन आरोपी मुस्लिम युवकों को गलत तरीके से फंसाया गया था कि को महिला पर जबरन धर्म परिवर्तन करवा रहे।  फरीदपुर तहसील के रहने वाले अबरार के खिलाफ दर्ज हुआ लव जिहाद का मुकदमा भी जांच में झूठा निकला है। इसी तरह मुजफ्फरनगर का लव जिहाद का मामला भी झूठा पाया गया है।

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उत्तर प्रदेश महिला कांग्रेस की उपाध्यक्ष उरूशा राणा का कहना है कि ये कानून कभी साफ नीयत के साथ लागू ही नहीं किया गया, योगी जी गलतफहमी को बढ़ा रहे, मकसद ही समाज को बांटना और दिलो में भेद डालना है।

भगवा संगठन


सरकार का एकपक्षीय चेहरा और खतरनाक है, सरकार के नीचे काम कर रहे हिंदूवादी संगठन हिन्दू धर्म के प्रचार-प्रसार में संलग्न हैं, ये लोग भगवा संगठन की आड़ में गुंडागर्दी करते हैं, उदाहरण- उज्जैन में हिंदूवादी संगठनों की बाइक रैली के दौरान हुई हिंसा के बाद मध्य प्रदेश पुलिस का एकपक्षीय चेहरा सामने आया, जहां सब ने मिल कर पथराव करने वाले हिंदू का घर छोड़कर पड़ोस के मुसलमान का घर तोड़ दिया। महाकाल की नगरी में हुई इस एकपक्षीय कार्रवाई ने सब का ध्यान खींचा, कई सवाल भी उठाए गए।

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देखा जाए तो जो स्थिति मुसलामानों की अब बन गई है वो शायद कभी नहीं थी, सच्चर समिति जो भारत में मुस्लिम समुदाय के आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक स्तर की रिपोर्ट तैयार करती है उसके अनुसार भी मुसलमानों को आर्थिक असमानता, सामाजिक असुरक्षा और अलगाव झेलना पड़ रहा।

आज भारत में मुसलमानों को मज़हब के नाम पर भड़का पर मात्र वोट बैंक की तरह ही देखा जाता है, अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हिंसा रोज़मर्रा की बात बन गई है, समय आ चुका है कि जाति-धर्म की ये दरारें मिटाई जाएं, मुसलमानों को बराबरी और इंसाफ़ देने का काम किया जाए ताकि एकता की तस्वीर मिसाल बने। सरकार को समझना चाहिए ही हमेशा तानाशाही नहीं चलेगी नफ़रत से लोगों की खीझ बढ़ रही है एक दिन वो भी आवाज़ उठाएगा, हमें जरूरत है कि अपने ज़हन में बदलाव लाए। ये मुसलमानों के लिए जरूरी है कि वे विकास की मुख्य धारा से खुद को जोड़ सकें।
 

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SC ने किसानों की समस्या का हल निकालने के लिए बनाई 4 सदस्य कमेटी, जानें-कौन हैं शामिल और क्या होंगे काम

केंद्र सरकार के द्वारा किसानों के हक के लिए तीन कृषि कानून लाए गए, जिनके विरोध में किसान लगातार दिल्ली की तमाम सीमाओं पर प्रर्दशन कर रहे हैं. किसान लगातार सरकार से इन कानूनों को रद्द करने की मांग कर रहे हैं. लेकिन सरकार किसानों की मांग सुनने को तैयार नहीं है. सरकार कानूनों को किसान हितैषी बता रही है कह रही है कि आने वाले दिनों में किसानों को इस कानून से काफी फायदा होगा

जैसा कि आप जानते हैं किसान आंदोलन की ये आग विदेशों तक जा पहुंची और मोदी सरकार के इस कानून की  निंदा की गई, लेकिन अपने अंहकार में डूबी मोदी सरकार ने किसी की नहीं सुनी ख़ैर किसानों की समस्या का हल निकालने के लिए बैठकों का दौर शुरू हुआ, अब तक सरकार और किसानों के बीच 9 दौर की बैठक हो चुकी हैं, इन बैठकों में  सरकार किसानों की मांग मानने को तैयार नहीं है, वहीं किसान सरकार के इस अंहकार को तोड़ने की पूरी कोशिश कर रही हैं. इन बैठकों में किसानों की 4 समस्याओं में से 2 पर सरकार अपनी सहमति दे चुकी है.

जिसमें इलेक्ट्रिसिटी अमेंडमेंट बिल 2020, दूसरा पराली प्रदूषण के नाम पर किसानों से जो करोड़ों रुपये के जुर्माने का प्रावधान था, उसे वापस लेने के लिए तैयार हो गई. हालाकिं अब कृषि कानूनों को रद्द करना और एमएसपी को लीगल राइट बनाने के मामले पर पेंच फंसा हुआ है. जब समस्या का कोई हल नहीं निकला तो सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दखल दिया

आपको बता दें कि देश की सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार को जमकर फटकार लगाई थी और कहा कि किसानों की समस्या का हल निकालने के लिए सरकार जो रवैया अपना रही है वह निराशाजनक है. उसके बाद कोर्ट ने मंगलवार को अपना पूरा निर्णय सबके सामने रखा, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने 4 सदस्य समिति का गठन करने का फैसला लिया और कहा कि जमीनी हकीकत जानने के लिए इसका गठन जरूरी है. कोर्ट ने अगले आदेश तक तीनों कृषि कानून पर रोक भी लगा दी है.

कमेटी में कौन- कौन हैं शामिल

सुप्रीम कोर्ट की तरफ से कृषि कानूनों की समीक्षा करने के लिए बनाई गई कमेटी में 4 लोगों को शामिल किया गया है. जिसमें भारतीय किसान यूनियन के भूपिंदर सिंह मान हैं, यह यूनियन लगातार कृषि कानून का विरोध करता हुआ आया है. इसके साथ ही  कमेटी में शेतकारी संगठन के अनिल घनवंत को भी शामिल किया गया है, इस संगठन की शुरूआत शरद जोशी ने की थी, अनिल घनवंत ने बीते दिनों कहा था सरकार को किसानों से बात करके समस्या का हल निकालना चाहिए, लेकिन कानून को वापस लेने की जरूरत नहीं है. इन्हीं में से एक कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी भी है जिन्होंने कृषि कानूनों का समर्थन किया है, आपको बता दें कि अशोक गुलाटी 1991 से 2001 तक प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार काउंसिल के सदस्य भी रह चूंके हैं वहीं अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान के प्रमोद के. जोशी भी इस कमेटी में शामिल हैं. इन्होंने हाल ही में कहा था कि हमें MSP से परे नई मूल्य नीति पर विचार करने की जरूरत है.

कमेटी का काम क्या होगा?

आपको बता दें की सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि कमेटी कोई मध्यस्थता कराने का काम नहीं करेगी, बल्कि निर्णायक भूमिका निभाएगी. आगे सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कमेटी दोनों पक्षों के से बात करेगी जो इसका समर्थन कर रहे हैं या जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं. किसान पहले ही कोर्ट में कमेटी बनाने के विरूध अपनी इच्छा जता चुके हैं.


ये तो आने वाला समय ही बता पाएगा कि किसानों के इस आंदोलन का क्या नतीजा निकलेगा और यह कमेटी किसके हक में फैसला सुनाएगी.

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पहले बिना मांगे कानून बनाया अब बिना मांगे कमेटी बना दी, क्या सरकार व सुप्रीम कोर्ट किसानों का भला चाहते हैं?

11 जनवरी को केंद्र की मोदी सरकार द्वारा लाए गए तीनों नए कृषि कानूनों के अमल पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी। सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाने के साथ साथ एक कमेटी का गठन कर दिया है, ये कमेटी सरकार और किसानों के बीच जारी विवाद को समझेगी और अगले कुछ दिनों में सुप्रीम कोर्ट में अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। इस कमेटी में कौन लोग है इसके बारे में हम आपको बाद में बताएंगे, पहले कुछ सवाल जो इस फैसले की मंशा पर सवाल खड़े करते हैं। 

11 जनवरी को जब पहली बार सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई तो चीफ जस्टिस अरविंद बोबड़े ने सरकार से कहा था कि आंदोलन को लेकर आपका रवैया गलत है, अगर आप कुछ नहीं कर सकते तो हमें कुछ करना होगा। असल में यही सबसे बड़ा पेच फंस गया, 11 जनवरी की शाम को किसानों ने प्रेस रिलीज जारी करके अपना मत स्पष्ट कर दिया। किसानों ने कहा- हम सुप्रीम कोर्ट का सम्मान करते हैं कि उन्होंने किसानों की समस्या को संज्ञान लिया। लेकिन किसानों ने ये भी कहा, कि हमारी लड़ाई सरकार से है, हम किसी तरह की मध्यस्थता नहीं चाहते, मतलब किसान सुप्रीम कोर्ट से किसी तरह की राहत मिले इसका भी पक्षधर नहीं है, उनका कहना है साफ है कि हमने कोर्ट में पीआईएल नहीं डाली है, जिन्होंने डाली है वह असल में धरना हटवाना चाहते हैं। 

12 जनवरी को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने चार लोगों की कमेटी गठित कर दी, इसमें भूपिंदर सिंह मान, डॉ. प्रमोद कुमार जोशी, कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी व अनिल धनबत को शामिल किया गया है, सवाल है कि क्या किसानों ने अपनी समस्या के हल के लिए किसी तरह की कमेटी के गठन की मांग की थी, इसका जवाब न है। मतलब किसानों ने किसी भी तरह की कमेटी बनाने की मांग नहीं की थी। लेकिन फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने एक कमेटी बनाई, इसके पीछे उनकी क्या मंशा है ये बड़ा सवाल पैदा करती है। 

कोर्ट जो कमेटी बनाता है आमतौर पर उसमें मंत्रियों को शामिल करता है लेकिन यहां उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कृषि सलाहकार अशोक गुलाटी को शामिल किया है, ये वही अशोक गुलाटी हैं जिन्होंने कृषि कानूनों को किसान हितैषी बताया था, इसलिए सुप्रीम कोर्ट के जिस फैसले से सब खुश हो रहे हैं असल में उसपर विचार करने की जरूरत है, क्या अशोक गुलाटी आने वाले वक्त में इस बिल के खिलाफ हो जाएंगे, क्या वह कह देंगे कि मोदी सरकार इस कानून को वापस लो, ये किसानों के विपरीत है, ऐसा तो नहीं लगता, अगर आपको लगता है तो अच्छी बात है, यहां बहुत लोगों को बहुत कुछ लगता है। 

11 जनवरी को केंद्र की मोदी सरकार द्वारा लाए गए तीनों नए कृषि कानूनों के अमल पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी। सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाने के साथ साथ एक कमेटी का गठन कर दिया है, ये कमेटी सरकार और किसानों के बीच जारी विवाद को समझेगी और अगले कुछ दिनों में सुप्रीम कोर्ट में अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। इस कमेटी में कौन लोग है इसके बारे में हम आपको बाद में बताएंगे, पहले कुछ सवाल जो इस फैसले की मंशा पर सवाल खड़े करते हैं। 

11 जनवरी को जब पहली बार सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई तो चीफ जस्टिस अरविंद बोबड़े ने सरकार से कहा था कि आंदोलन को लेकर आपका रवैया गलत है, अगर आप कुछ नहीं कर सकते तो हमें कुछ करना होगा। असल में यही सबसे बड़ा पेच फंस गया, 11 जनवरी की शाम को किसानों ने प्रेस रिलीज जारी करके अपना मत स्पष्ट कर दिया। किसानों ने कहा- हम सुप्रीम कोर्ट का सम्मान करते हैं कि उन्होंने किसानों की समस्या को संज्ञान लिया। लेकिन किसानों ने ये भी कहा, कि हमारी लड़ाई सरकार से है, हम किसी तरह की मध्यस्थता नहीं चाहते, मतलब किसान सुप्रीम कोर्ट से किसी तरह की राहत मिले इसका भी पक्षधर नहीं है, उनका कहना है साफ है कि हमने कोर्ट में पीआईएल नहीं डाली है, जिन्होंने डाली है वह असल में धरना हटवाना चाहते हैं। 

12 जनवरी को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने चार लोगों की कमेटी गठित कर दी, इसमें भूपिंदर सिंह मान, डॉ. प्रमोद कुमार जोशी, कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी व अनिल धनबत को शामिल किया गया है, सवाल है कि क्या किसानों ने अपनी समस्या के हल के लिए किसी तरह की कमेटी के गठन की मांग की थी, इसका जवाब न है। मतलब किसानों ने किसी भी तरह की कमेटी बनाने की मांग नहीं की थी। लेकिन फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने एक कमेटी बनाई, इसके पीछे उनकी क्या मंशा है ये बड़ा सवाल पैदा करती है। 

कोर्ट जो कमेटी बनाता है आमतौर पर उसमें मंत्रियों को शामिल करता है लेकिन यहां उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कृषि सलाहकार अशोक गुलाटी को शामिल किया है, ये वही अशोक गुलाटी हैं जिन्होंने कृषि कानूनों को किसान हितैषी बताया था, इसलिए सुप्रीम कोर्ट के जिस फैसले से सब खुश हो रहे हैं असल में उसपर विचार करने की जरूरत है, क्या अशोक गुलाटी आने वाले वक्त में इस बिल के खिलाफ हो जाएंगे, क्या वह कह देंगे कि मोदी सरकार इस कानून को वापस लो, ये किसानों के विपरीत है, ऐसा तो नहीं लगता, अगर आपको लगता है तो अच्छी बात है, यहां बहुत लोगों को बहुत कुछ लगता है। 

 
ये वक्त ध्यान से सोचने और समझने का है, कोर्ट ने जो फैसला दिया है, वह सरकार के ही पक्ष में है, सरकार किसी को मध्यस्थता के लिए ढूंढ रही थी, उसे सुप्रीम कोर्ट मिल गया। सरकार चाहती थी कि बिंदुवार बात की जाए सो ये मध्यस्थता वाली टीम ऐसा करेगी। आंदोलन स्थल पर किसानों ही लगातार हो रही मौत चिंता का विषय थी, जहां मोदी सरकार घिरती नजर आ रही थी, सो सुप्रीम कोर्ट ने उसे एकबार फिर से कागज पर मजबूत कर दिया। यहां चट भी मेरी और पट भी मेरी वाली स्थिति है। आखिरी बात ये कि, किसान भी बड़े अड़ियल हैं इसबार, पिछले पचास दिनों से जिस दमदारी से लड़े हैं उम्मीद है कि वह आगे भी लड़ते रहेंगे। फिलहाल आखिरी फैसला भविष्य के गर्भ में छिपा है। 

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पाकिस्तान द्वारा Balakot Airstrike में 300 लोगों के मरने की बात कबूलने की न्यूज निकली फेक, अब माफी मांगने में जुटी गोदी मीडिया

मेरा नाम राजेश है। इसलिए मुझे रमेश या रितेश न कहा जाए। मेरे ऐसा कहने से लोग मान जाएंगे लेकिन भारतीय मीडिया नहीं मानेगा। इसने अगर रितेश कह दिया तो अपना नाम रितेश ही मान लो। 10 जनवरी एक हवा उड़ी, हवा ये कि पाकिस्तान ने कबूल कर लिया कि सर्जिकल स्ट्राइक में उसके 300 लोग मारे गए। ये खबर जैसे ही सीमा पार करके भारत में पहुंची, देश की धीर-वीर गंभीर मीडिया ने लपक लिया। जितनी तेजी से लपका उतनी ही तेजी से उसे अबोध जनता की तरफ फेंक दिया गया। 

सर्जिकल स्ट्राइक कबूलने की बात जैसे ही सामने आई भाजपा समर्थकों की तो निकल पड़ी। मोदी मोदी मोदी। मेरा मोदी मेरा अभिमान। ये सब चल ही रहा था कि कुछ फैक्ट चेकर्स ने जश्न मना रहे लोगों को जैसे पीछे से धप्पा मार दिया हो। एक झटके मेें सारी हवा फुस्स हो गई। दरअसल हुआ ये था कि समाचार एजेंसी एएनआई ने एक आर्टिकल लिखा, जिसमें उन्होंने दावा किया कि पूर्व पाकिस्तानी राजनयिक जफर हिलाली ने 2019 बालाकोट एयरस्ट्राइक में 300 मौतों को स्वीकार किया है। 

एएनआई ने इस खबर के साथ एक वीडियो क्लिप लगाई थी, जिसमें फुटेज के साथ छेड़छाड़ की गई। छेड़छाड़ की पुष्टि जफर हिलाली ने अपने ट्वीटर हैंडल पर वीडियो पोस्ट करके कर दी। अब चूंकि एएनआई भारतीय मीडिया इंडस्ट्री का अभिभावक है सो बाकी के चैनलों ने उसकी बात को सच मानकर दिखाना शुरु कर दिया। टीआरपी फ्रॉड करके नंबर बना रिपब्लिक भारत और बलात्कार की खबरों का स्वयं ही पोस्टमार्टम कर देने वाला दैनिक जागरण तो नाम में ही कन्फ्यूज हो गए। पाकिस्तानी मीडिया में जफर हिलाली नाम चल रहा था, लेकिन इन दोनो चैनलों ने आगा हिलाली बता दिया। अजब ये कि आगा हिलाली की आज से  19 साल पहले यानी 2001 में ही मौत हो चुकी है। 

सवाल ये है कि जफर हिलाली ने कहा क्या था- दरअसल भारत द्वारा इजात किए गए सर्जिकल स्ट्राइक व एयर स्ट्राइक को लेकर उन्होंने कहा, ऐसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। भारत का मकसद था कि एक मदरसा, जहां आपके अनुसार 300 बच्चे पढ़ रहे थे, उधर आकर स्ट्राइक करना था, इसका मतलब आपने 300 लोगों को मारने का इरादा रखा था, वो थे नहीं, वो गलत था, वो हुआ नहीं, तो इसलिए आपने एक फुटबाल फील्ड में जाकर बम फेंक दिया। ये बयान आने के बाद कुछ चैनलों का जमीर जागा, उन्होंने भूल सुधार लिखकर अपनी सफाई दे दी। लेकिन जिन्हें माफी की आदत हो उनसे कौन सा भारत पूछ रहा है भला। 


ये तो है भारत की मीडिया। ऐसे ही थोड़े दुनिया में 142वें नंबर पर पहुंची है। भारत में आदमी भूखा मर जाए इन्हें खबर नहीं होगी, लेकिन पाकिस्तान में अंडा एक रुपया भी बढ़ जाए इनको लगता है कि अब तो पाकिस्तानी भूखा मरेगा। बड़ा सवाल तो ये भी है कि आखिर किसान आंदोलन के बीच ये मुद्दा उठा कैसे। मीडिया इस वक्त ये दिखाकर क्या हासिल करना चाहता है, क्या वह लोगों का ध्यान भंग करना चाहता है। इसका उत्तर जो आपका है वही मेरा है। विश्वनेता ने आदेश दिया है कि उनकी इमेज में कोई असर नहीं पड़ना चाहिए सो ये लगे हैं। 

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अखिलेश यादव: जिसे मील का पत्थर समझा गया वह राजनीति के ‘ब्रेकर’ पर आकर बिखर गए

आज से करीब 10 साल पहले तक सपा समर्थकों में ओबीसी वर्ग का एक बड़ा हिस्सा होता था लेकिन धीरे धीरे ये वर्ग छिटकर भाजपा के पाले में चला गया। भाजपा जितनी मजबूत हुई सपा उतना कमजोर होती चली गई। आज यादव लॉबी को छोड़ दे तो सपा के साथ खड़ा होने वाला वर्ग बड़ी संख्या में नजर नहीं आता। सपा के संस्थापक सदस्यों में शामिल आजम खान को योगी सरकार ने तमाम झूठे आरोपो में जेल भिजवा दिया, ऐसे में अखिलेश यादव को सड़क पर उतरना था लेकिन वह मुखरता से नहीं उतरे। 

अखिलेश के भीतर ये डर था कि कहीं जनता में ये मैसेज न चला जाए कि सपा मुस्लिमों से सहानुभूति रखती है। सीएए प्रोटेस्ट के दौरान भी अखिलेश के दिमाग में यही चल रहा था, उस वक्त आजमगढ़ में बड़ी संख्या में मुसलमानों को सीएए प्रोटेस्ट में तोड़फोड़ करने के आरोप में कुर्की हुई, जेल भेजा गया लेकिन अखिलेश चुप्पी साधे रहे। ध्यान रहे यहां की जनता ने अखिलेश को अपना वोट देकर सांसद चुना है। यही कारण है कि मुस्लिम भी आज सपा पर अंधा भरोसा करने से बचते नजर आ रहे हैं। 

अब वर्तमान देखिए। किसान आंदोलन हो रहा है, ये बात सपा के हर कार्यकर्ता को पता है कि कानून किसानों के खिलाफ है। लेकिन क्या अखिलेश अपने एसी रूम से बाहर आए, सपा का सामाजिक आधार ही किसान व किसानी पर आश्रित मजदूर है लेकिन वैचारिक मतिभ्रम के कारण अखिलेश खुलकर फैसला लेने में फेल रहे। जब नेतृत्व कमजोर होता है तो कार्यकर्ताओं पर इसका सीधा असर पड़ता है। आज सिवाय मोदी को गाली देने के अलावा सपा कार्यकर्ता के पास कुछ नहीं बचा है। 

1909 में यूएन मुखर्जी ने ‘हिन्दू; डाईंग रेस’ नाम की कितााब लिखी, किताब की हकीकत कुछ और ही थी लेकिन आरएसएस व भाजपा ने उसके तमाम एडिशन छपवाकर उसी झूठ का प्रचार किया। लेकिन सपा अपने ही सामाजिक आधार का प्रचार करने में पूरी तरह से फेल रही। ट्वीटर पर खानापूर्ति स्वरूप एक ट्वीट कर देने से कुछ नहीं होने वाला है। वैक्सीन भाजपा की नहीं है ये बात हर कोई जानता है लेकिन अखिलेश यादव इसे भाजपा की वैक्सीन बताकर खुद ही वाकओवर दे रहे हैं। हमेशा मंदिर की खिलाफत की और अब मंदिर में जा रहे हैं। 

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मेरे ही गांव में हर जाति का व्यक्ति मुलायम सिंह का प्रशंसक हुआ करता था, वोट देकर सरकार बनाता था। अखिलेश की छवि मुलायम सिंह से बेहतर है। मुलायम सिंह का अयोध्या में गोलीकांड लोग नहीं भूले हैं। वहीं अखिलेश विकास को तवज्जो देते नजर आते हैं, सीएम रहते हुए अखिलेश यादव ने डायल 100 सेवा शुरु की, जो यूपी पुलिस खटारा जीप से चलती थी उसे इनोवा दिया। प्रयागराज में ही इलाहाबाद स्टेट यूनिवर्सिटी बनाई। यूपीएसएसएससी बनाया, हर साल लेखपाल, जूनियर असिस्टेंट समेत तमाम पदो पर धुंधाधार भर्ती की। 

योगी आदित्यनाथ ने क्या किया, इन्होंने डायल 100 का नाम बदलकर डायल 112 कर दिया. यूपीएसएसएससी को जिंदा मार दिया, इलाहाबाद में जो स्टेट यूनिवर्सिटी बनाई उसका नाम बदलकर रज्जू भैया विश्वविद्यालय कर दिया. प्रदेश घूम घूमकर जिलो का नाम बदला। जितनी भी वैकेंसी निकाली सभी जाकर कोर्ट में फंस गई। होमगार्डों को घर बैठा दिया। जो अखिलेश यादव ने किया उसको पेंट करके वहां अपना बोर्ड टांग दिया। कुछ भी ऐसा नहीं किया जिस पर भाजपा को गर्व हो। 

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सपा अगर आज जमीन पर उतरे तो 2021 में सरकार बनाने की सबसे प्रबल दावेदार होगी। लेकिन इसके लिए अखिलेश को जमीन पर आना होगा। मैंने शुरु में कहा है कि यादव इस पार्टी के अभी सबसे बड़े समर्थक हैं लेकिन उसमें भी तमाम लोग अखिलेश की सुसुप्ता अवस्था देखकर खुद को पार्टी का कार्यकर्ता बोलने से भी कतराने लगे हैं। प्रदेश में बसपा खत्म हो चुकी है, कांग्रेस अपनी आखिरी सांसे गिन रही है, छोटी पार्टियां हमेशा से 2-4 सीटों के लिए मरती रही हैं, ऐसे में सपा के पास बढ़िया मौका है। लेकिन….लेकिन सपा का वर्तमान जहां है वहां से उसका भविष्य सिर्फ अंधकारमय दिखाई देता है। 

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जमीन बेचकर जिस बेटे को मां ने बनाया था काबिल, वही सौरभ शर्मा चंद पैसो की लालच में पाकिस्तानियों से जा मिला

चंद पैसो की लालच में सेना संबंधी खुफिया सूचनाओं को पाकिस्तान भेजने वाले यूपी के हापुड़ जिले के पूर्व सैनिक सौरभ शर्मा को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। उसके खिलाफ लखनऊ में संबंधित धाराओं में मामला दर्ज किया गया है। मामले का खुलासा होने के बाद मां बदहवास है उसे भरोसा ही नहीं हो रहा कि जिसे उसने अपनी जमीन बेचकर काबिल बनाया वही चंद पैसों की लालच में देश से गद्दारी करके पाकिस्तानियों से जा मिला। 

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मिली जानकारी के अनुसार सौरभ शर्मा के पिता का देहांत बीस साल पहले हो गया था।  तीन बच्चो को पालने, पढ़ाने के लिए मां मधु शर्मा ने गांव के पास की ही नौ बीघा जमीन बेच दी। २०१३ में सौरभ शर्मा भारतीय सेना में शामिल हुआ तो परिवार की स्थिति सही हो गई। नौकरी लगने के करीब डेढ़ साल बाद ही सौरभ वीआरएस लेकर घर चला आया, उसने बताया कि उसकी किडनी सही नहीं है, उस समय किसी को भी ये नहीं पता था कि सौरभ इस तरह की किसी घटना में संलिप्त है। हालांकि मां को अभी भी लगता है कि उनका बेटा निर्दोष है वह देश के साथ गद्दारी नहीं कर सकता है।

देश सेवा की भावना को लेकर सेना मे शामिल हुआ जवान जब देशविरोधी गतिविधियों में शामिल हो जाता है तो उसके गांव वालों पर क्या बीतती है वही समझते हैं, आज बिहूनी गांव का हर इंसान शर्मिंदा है, उन्हें भरोसा ही नहीं हो रहा कि उनके गांव का एक इंसान अपने जमीर को जिंदा मारकर पाकिस्तान को चंद पैसो की लालच में सेना की जानकारियां देगा। यूपी एटीएस ने जब सौरभ से सख्ती से पूछा तो उसने कबूल किया कि नौकरी छोड़ने के बाद उसने सेना की गोपनीय जानकारी दूसरे देश की खुफिया एजेंसी को वाट्सऐप के जरिए भेजा जिसके एवज में उसे पैसा मिला। 

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पिछले दिनों आरएसएस चीफ मोहन भागवत ने कहा था कि हिन्दू आतंकवादी नहीं हो सकता, अब सवाल है कि क्या सौरभ शर्मा दूसरे धर्म का है, पिछले साल कश्मीर में डीएसपी देविंदर सिंह को हिजबुल के कमांडर नवीद बाबू, रफी अहमद, इरफान अहमद के साथ गिरफ्तार किया गया था, देविंदर सिंह उन लोगो को हथियार मुहैया करवाता थ। हिजबुल के आतंकी उस हथियार का क्या इस्तेमाल करते थे इसको बताने की जरूरत शायद नहीं है। देविंदर को पुलिस ने गिरफ्तार करके एनआईए को सौपा, एनआईए ने पता लगाकर बताया कि देविंदर जिनकी मदद करता था उनका संपर्क पाकिस्तानी दूतावास से भी था। 


सवाल घूमकर वहीं आता है कि देशभक्त कौन है? इसका जवाब भी बस इतना है देशभक्त सब हो सकता है देशद्रोही भी सभी वर्ग में हो सकते हैं। किसी एक जाति या सांप्रदाय की बात करना गलत होगा। किसी एक धर्म को टारगेट करके सिवाय नफरत फैलाई जा सकती है, कई बार तो ऐसा होता है कि मुस्लिम निकलने पर गोदी मीडिया के बीच जोरशोर से चर्चा होती है लेकिन जैसे ही देशविरोधी गतिविधियों में किसी हिन्दू सैनिक के संलिप्त होने की जानकारी मिलती है चारो तरफ सन्नाटा छा जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि सत्ता में जो हुक्मरान बैठे हैं उनके भी दिमाग में हिन्दू मुसलमान का गणित चलता रहता है। 

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फिलहाल सौरभ शर्मा जैसे तमाम लोग सेना के बीच हो सकते हैं, उन्हें पहचानने की जरूरत है। जरूरत है उस मानसिकता की गुलामी से मुक्त होने का जिसमें कहा जाता है कि हिन्दू आतंकवादी नहीं हो सकता है। जरूरत है खुला दिमाग रखने की जिससे हम धर्म के आधार पर आतंकियों की गणना न करें। देशद्रोही सौरभ भी हो सकता है अफजल भी। इसलिए सख्ती सभी के खिलाफ जरूरी है। 

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श्मशान की छत गिरने में योगी सरकार नहीं तो दोषी कौन? राम मंदिर वालों का ध्यान श्मशान पर क्यों नहीं?

यूपी के मुरादनगर में एक श्मशान घाट में कुछ लोग एक व्यक्ति के अंतिम संस्कार में पहुंचे थे जहां छत गिरने से करीब 24 लोगों की जान चली जाती है कई लोग घायल भी हो गए। बारिश से बचने के लिए जिस इमारत के नीचे लोग खड़े थे उसे हाल ही में बनाया गया था। हल्की गुणवत्ता के उपकरणों के इस्तेमाल से भवन इतना कमजोर था कि उसकी छत गिर गई।

इस बीच एक्शन में यूपी पुलिस, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लिया कड़ा एक्शन, इलाके में मचा हड़कंप, यूपी के मंत्री ने व्यक्त किया दुख जैसी तमाम हैडिंग आज कल परसो तक न्यूज़ चैनलों में दौड़ती रहेंगी। पर सोचने वाली बात ये है कि आखिर ऐसा हुआ कैसे? गलती किसकी है? क्या पीड़ित परिवार को दो-दो लाख की आर्थिक सहायता प्रदान करना काफी है? या योगी जी का दुख व्यक्त करना काफी है? अगर यह घटना किसी और राज्य में हुई होती तो?

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यूपी की कानून व्यवस्था पर सवाल लगातार उठते रहते है, विपक्ष सख्त कार्रवाई की मांग कर रहा। देखा जाए तो मुरादनगर में ‘करप्शन’ की ही छत गिरी है, ये हादसा यूपी में चल रहे भ्रष्टाचार का ही नतीजा है, इस घटना में ठेकेदार को जिम्मेदार ठहराया गया है, हादसे में जूनियर इंजिनियर समेत तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया है। आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 304, 337, 338, 427, 409 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।

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महाराष्ट्र के भिवंडी मामले को अगर याद करें तो वो भी कुछ ऐसी ही घटना थी मलवे में दबने की वजह से करीब 25 लोगों की जान चली गई थी, उस मामले बृहन्मुंबई नगर निगम ने दो वरिष्ठ अधिकारियों को निलंबित कर दिया था लेकिन श्मशान मामले में योगी सरकार ठेकेदार से आगे बढ़ी ही नहीं।


एक ठेकेदार को पकड़ लेने से यूपी की यह समस्या खत्म नहीं होने वाली  इससे पहले यूपी के एटा जिले में एक निर्माणाधीन पुल का पिलर और गार्डर गिर गया था, इस हादसे में 2 श्रमिकों की मौत हुई थी और कई श्रमिक घायल हो गए थे, बाइपास के लिए बनने वाला पुल अगर टूटता है तो दो शहर अलग हो जाते हैं और इस एक पिलर को बनने में सालों लग जाते हैं।
 

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मुरादनगर की घटना को 4 दिन में सब वैसे ही भूल जाएंगे जैसे हाथरस की घटना को लोग भूल गए, सरकार क्या कर रही दोषियों का क्या हुआ ये किसी को नहीं पता। लेकिन मुरादनगर जैसी घटना शहर की सोसाइटियों में भी हो सकती है, वजह ये है कि बहुमंजिला सोसायटियों में बिल्डर के बनाए गए फ्लैट्स की गुणवत्ता खराब होने से निवासियों को अनहोनी का डर सता रहा, मुरादनगर की घटना के बाद लोग इमारतों की खामियों पर सवाल उठाने लगे हैं, बाहर से चमचमाती इमारतों के अंदर का हाल कुछ और है सोते हुए सिर पर प्लास्टर गिरते है, ईंट दिखने लगी, लोगों में बिल्डर के खिलाफ आक्रोश है। सोमवार को नोएडा के सेक्टर-74 स्थित सुपरटेक केपटाउन सोसायटी के सीजी-2 टावर के कारिडोर में अचानक प्लास्टर भरभरा कर गिरने की घटना सामने आई है।

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बता दें कि 18 मीटर या इससे अधिक ऊंचाई की जितनी भी इमारतें बनाई जाती हैं, उनका नक्शा पास कराने से पहले स्ट्रक्चर के भूकंपरोधी होने के लिए स्ट्रक्चरल स्टेबिलिटी सर्टिफिकेट जमा करना होता है, लोगों की सुरक्षा के लिए यह व्यवस्था की गई है पर कई बार इस पर ध्यान नहीं दिया जाता, गुणवत्ता की जांच किए बिना आक्यूपेंसी सर्टिफिकेट या कंप्लीशन सर्टिफिकेट जारी कर दिया जाता है। लेकिन सोचने वाली बात ये है कि गुणवत्ता की जांच के लिए कोई नियम नहीं है, यही कारण है कि बिल्डर धन कमाने के लिए खराब गुणवत्ता की सामग्री का प्रयोग करते है और एक-दो साल बाद नतीजा दिखने लगता है।

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अब सवाल यह है कि अगर इन्हीं ढीले नियम कानून के नीचे दबकर लोगों की जान चली जाती है तो इसका जिम्मेदार प्राधिकरण, बिल्डर, इमारत को बनाने वाला ठेकेदार या योगी जी है जो राम मंदिर के अलावा किसी और बिल्डिंग में फोकस ही नहीं करते।

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