…तो क्या मोदी अब कोरोना वैक्सीन को ‘भाजपा की वैक्सीन’ बनाकर देश में प्रचारित करेंगे?

कोरोना वैक्सीन आ गई है। अब लगेगी। किसे लगेगी इसी को लेकर मारामारी है। वैक्सीन महामारी पर काबू पा भी लेगी या नहीं इसपर कुछ कहना मुश्किल है लेकिन मोदी हैं तो मुमकिन है वाली चरस जब तक है कोरोना भारतीयों का घंटा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। ये बात मोदी जी डंके की चोट पर बोलते हैं। मोदीजी विश्व नेता हैं, वो कल को बोल दें कि वैक्सीन लगवाने के बजाय पी लो तो भक्त मीडिया उसे भी जस्टिफाई कर देगी। ये उनका ट्वीट देख लो। भावी राज्यसभा सांसद रजत जी कोवैक्सीन की आलोचना करने वालों को बता रहे हैं कि 190 देशों ने इस वैक्सीन की 2 अरब डोज बुकिंग करवाई है। इसलिए गलतफहमियों का शिकार न हों.

इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च यानी ICMR ने कोरोना की दो वैक्सीन को आपातकालीन उपयोग के लिए मंजूरी दे दी है। काहे का आपतकाल ये समझ से परे हैं। क्योंकि केस तो हर दिन तेजी से कम हो जा रहे हैं। फिलहाल छोड़िए। जिस वैक्सीन को सरकार ने मंजूरी दी है उसमें एक भारत बायोटेक द्वारा निर्मित कोवैक्सीन है। हां वही कोवैक्सीन जिसका ट्रायल हरियाणा के गृह मंत्री अनिज विज पर किया गया और उसके अगले हफ्ते ही वह कोरोना की चपेट में आ गए। कोरोना भी ऐसा कि उन्हें एक के बाद एक तीन अस्पतालों में भर्ती करवाया गया। ICMR के महानिदेशक डॉ. बलराम भार्गव ने इस वैक्सीन को उच्च प्रभावकारिता वाली बताया लेकिन इसपर किसी भी विशिष्ट विवरण को देने से मना कर दिया। 

वैक्सीन कब आएगी, किसे लगेगी, मैं लगवाऊंगा, मैं पहले नहीं लगवाऊंगा की राजनीति बड़ी रोचक हो चुकी है।इसका पूरा श्रेय यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जी जाता है। उन्होंने कह दिया कि ये भाजपा की वैक्सीन है। हम नहीं लगवाएंगे

कहा- जब हमारी सरकार आएगी तब समाजवादी वैक्सीन बनेगी फिर लगाया जाएगा। भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी खराबी ये है कि प्रमुख नेता थोड़ा मजा देता है तो पार्टी के छोटे नेता पूरी महफिल ही लूट लेते हैं। सपा के एमएलसी आशुतोष सिन्हा ने कहा ये वैक्सीन नपुशंक बना सकती है। मतलब यार क्या ही कहूं। 

किसी भी परिस्थिति में मीडिया का कैमरा अपनी तरफ मोड़ने में सक्षम बाबा रामदेव ने कहा- हम तो कोरोना की वैक्सीन लगवाएंगे ही नहीं। क्योंकि हमें कोरोना नहीं होगा। सही भी है, बाबा को कोरोना वैक्सीन की नहीं बल्कि मल्टीविटमिन के टीके की जरूरत है। बताइए भला कभी साइकिल से गिर जा रहे तो कभी हाथी से गिर रहे हैं। देखकर हमें बुरा लगता है भाई। यही तो एक उम्मीद हैं तो जनता को 35-40 रुपए लीटर पेट्रोल दिलवाएंगे। हिन्दू महासभा, अरे वही जो कोरोना के वक्त गौमूत्र पार्टी कर रहे थे। अब कह रहे हैं कि इसमें गाय का खून है इसलिए इसको देश में ही इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं देनी चाहिए। अरे चक्रमाणि महराज। आप तो गौमूत्र पीकर या गोबर लपेटकर ठीक हो जाओगे, लेकिन सब नहीं न हो पाएंगे न, इसलिए खुदा के वास्ते, ओह सॉरी, भगवान के वास्ते वैक्सीन का विरोध न करो। 

अच्छा अब सवाल है कि वैक्सीन लगेगी किसे। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन जी ने कहा- कोरोना की वैक्सीन सभी देशवासियों को मुफ्त लगेगी। लेकिन उन्हें लगा ये तो विश्वनेता से भी ज्यादा बड़ा फेक दिया इसलिए तुरंत सुधार करते हुए कहा- पहले कोरोना वारियर्स को लगेगी। बसपा प्रमुख मायावती जी भी वैक्सीन लेने की लाइन में खड़ी हैं, उनका कहना है कि स्वास्थ्यकर्मियों के साथ सर्वसमाज के अति-गरीबों को ये टीका पहले लगवाया जाए। इसीबीच शिवराज मामा का त्याग सामने आया है, उन्होंने कहा- पहले सबको लग जाए फिर मैं लगवाऊंगा। कुछ लोग कह रहे इन्हें ही वैक्सीन पर भरोसा नहीं है इसलिए बहानेबाजी कर रहे हैं। बिहार की उस जनता की कहीं कोई चर्चा नहीं है जिससे फ्री वैक्सीन के नाम पर वोट लेकर सरकार बना ली गई। उम्मीद है अब पश्चिम बंगाल वालों को फ्री वैक्सीन का लॉलीपॉप दिया जाए। 

वैक्सीन मुद्दे पर सरकार को आराम से घेरा जा सकता था, सरकार से पूछा जाता कि सीरम की उस वैक्सीन को स्वीकृति क्यों दी गई जिसने तीसरा ट्रायल भी नहीं पूरा किया। सरकार किस आपात स्थिति की बात कर रही है, अब तो हर दिन कोरोना केस कम होते जा रहे हैं। क्या सरकार को जनता के शक को क्लीयर नहीं करना चाहिए। विश्व के तमाम बड़े नेता जैसे ब्लादिमीर पुतिन, बराक ओबामा, बेंजामिन नेतान्याहू, बोरिस जानसन ने पब्लिकली वैक्सीन लगवाकर जनता का विश्वास बढ़ाया क्या मोदी जी सभी के सामने वैक्सीन नहीं लगवा सकते? अगर ऐसा होता है तो लोगों के भीतर शक खत्म होगा। लेकिन ऐसा कहां होने वाला। मोदी मोदी हैं की। 

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18 महीने तक विदेशी बताकर डिटेंशन सेंटर में रखा, अब कहा- तुम बांग्लादेशी नहीं बल्कि भारतीय हो

गुवाहाटी में रिक्शा चलाने वाले मोहम्मद नूर हुसैन ने कहा- सरकारी अधिकारियों ने हम पर बांग्लादेशी होने का आरोप लगाया, तर्क में कहा- तुम गैरकानूनी ढंग से बॉर्डर पार करके यहां आए हो, जबकि ऐसा नहीं है, हम यहीं पैदा हुए, हम असम के हैं, हम भारतीय हैं। ये बातें कहते हुए मोहम्मद नूर हुसैन के चेहरे पर संतोष के भाव थे, क्योंकि फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ने 34 साल के नूर हुसैन, उनकी पत्नी सहेरा बेगम और दो बच्चों को भारतीय बताया है, 18 महीने के बाद उन्हें डिटेंशन सेंटर से बाहर किया गया है। 

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मोहम्मद नूर हुसैन असम के उदालपुरी जिले के निवासी हैं, वह लॉडॉन्ग गांव में अपनी पत्नी व दो बच्चों के साथ रहते हैं, गुवाहाटी में रिक्शा चलाकर परिवार का पेट पालते हैं, कमाई का कोई और जरिया नहीं है, बच्चे छोटे हैं इसलिए पत्नी मजदूरी करने नहीं जाती। असम में भारतीय नागरिक पहचान यानी एनआरसी ने काफी उथल-पुथल मचाई, देशी-विदेशी की लिस्ट बनी और करीब 19 लाख लोग विदेशी ठहरा दिए गए, इसमें हुसैन का भी परिवार शामिल था। 

हुसैन के दादा-दादी का नाम 1965 की मतदाता सूची में था, पत्नी सहेरा बेगम के पिता का नाम 1951 की एनआरसी में भी शामिल था, परिवार के नाम जो जमीन थी उसके कागज के अनुसार 1958-59 में वह असम में ही रहते थे ऐसे में ये तय था कि उन्हें भारतीय घोषित किया जाए क्योंकि असम में नागरिक पहचान की कट-ऑफ तारीख 24 मार्च 1971 तक की गई थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, गुवाहाटी पुलिस को हुसैन के इन कागजों पर भरोसा नहीं हुआ और 2017 में उनकी फिर से जांच शुरु कर दी गई। हुसैन न तो इतना पढ़ा था कि उसे कानून या कागज की समझ होती और न ही उसके पास इतने पैसे थे कि वह एक वकील करके अपना पक्ष रख पाता। 

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लोगों से बात करने के बाद उसने किसी तरह से एक वकील से बात की और 4000 रुपए दिए, लेकिन ट्रिब्यूनल में बिना वकील ही पेशी हुई। वकील और हुसैन में पता नहीं क्या बात हुई वकील ने 28 अगस्त 2018 को केस छोड़ दिया। इसलिए कोर्ट में दोबारा पक्ष ही नहीं रखा गया, लोगों ने सलाह दी कि गुवाहाटी छोड़कर भाग जाओ हुसैन। लेकिन हुसैन ने ऐसा नहीं किया, उसे लगा कि उसके साथ न्याय होगा। नतीजा ये रहा कि ट्रिब्यूनल ने दोनो को विदेशी घोषित कर दिया, जून 2019 में उन्हें गिरफ्तार करके गोआलपाड़ा डिटेंशन सेंटर भेज दिया गया। 

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लोगों के बीच जब इसबात की चर्चा शुरु हुई तो गुजरात स्थित मानवाधिकार वकील अमन वदूद ने इस केस गुवाहाटी हाईकोर्ट की चौखट तक पहुंचाया, कोर्ट ने जांच में पाया कि मोहम्मद नूर व उसके परिवार को अवैध तरीके से डिटेंशन सेंटर में रखा गया है, वह बांग्लादेशी नहीं बल्कि भारतीय ही हैं। इस फैसले के बाद वदूद की पहली प्रतिक्रिया ये थी कि तमाम लोगों को विदेशी इसलिए भी ठहरा दिया जा रहा है क्योंकि उनके पास केस लड़ने या वकील को फीस देने का पैसा नहीं है। जिसके कारण उनका पक्ष कोर्ट में रखा ही नहीं जा पाता। ये प्रतिक्रिया वास्तव में हमें सोचने पर मजबूर करती है। अगर हुसैन का केस गुवाहाटी हाईकोर्ट में न जाता तो क्या वह भारतीय साबित हो पाते? 

 

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REET 2016 : एक ऐसी भर्ती जिसमें High Court के दो बार आदेश के बावजूद सरकार ने नहीं जारी की वेटिंग लिस्ट

चुनाव के वक्त बेरोजगारी सबसे बड़ा मुद्दा होता है, क्योंकि हर राजनीतिक पार्टी को पता होता है कि युवाओं के समर्थन को इस मुद्दे के साथ अपने पाले में किया जा सकता है। लेकिन चुनाव जीतते ही पार्टियां बेरोजगारी का मामला सबसे पहले भूल जाती हैं। राजस्थान प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालय अध्यापक सीधी भर्ती-2016 जिसे सरल शब्दों में रीट भर्ती 2016 कहा जा रहा है, वह भी कुछ ऐसी है, अभ्यर्थियों को तो दिन-रात याद रहती है लेकिन सरकार भूल गई है। अभर्थियों की दुख तकलीफ उसे अभी नजर नहीं आ रही है। 

ये अपने आप में एक अनोखी भर्ती है, क्यों है इसके लिए आप इसके बारे में पढ़िए। 6 जुलाई 2016 को 4940 शिक्षकों की भर्ती के लिए विज्ञापन निकाला गया। 11 अगस्त 2017 को विज्ञप्ति को संशोधित किया गया और 25 जनवरी 2018 को पहली बार परिणाम जारी किया गया। नियम के मुताबिक पात्र अभ्यर्थियों की सूची के साथ डेढ़ गुना अभर्थियों की सूची जारी होनी चाहिए, लेकिन नहीं हुआ। बीए और रीट के नंबरों को जोड़कर मेरिट जारी कर दी गई। तमाम फर्जी लोगों ने आवेदन 100 में 100 फीसदी नंबर डालकर अप्लाई कर दिया, जिससे वह मेरिट में टॉप कर गए। लेकिन जब डाक्यूमेंट वेरिफिकेशन के लिए बुलाया गया तो वह वहां पहुंचे ही नहीं, आखिर पहुंचते भी कैसे, वह तो फर्जी थे। 

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सरकार ने इस भर्ती में वेटिंग नियम का पालन नहीं किया, इसलिए 33 सौ के करीब ही सीटें भर पाई, रिवाइज रिजल्ट किया तो ये करीब 4 हजार पोस्ट भर गई। और इस तरह 826 पोस्ट खाली रह गई। पात्र अभ्यर्थी अपनी मांग को लेकर अक्टूबर 2018 में हाईकोर्ट गए, जनवरी 2019 में हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने राजस्थान सरकार को आदेश दिया कि वेटिंग सूची जारी करिए। लेकिन वह कहां मानने वाली। सरकार पहुंच गई डबल बेंच, 7 जनवरी 2019 को डबल बेंच में भी सरकार हार गई, सरकार ने बताया कि उसके पास इस भर्ती में 826 पद अभी भी खाली हैं, कोर्ट ने कहा- जब आपके पास पद रिक्त हैं तो इसे भरिए, वेटिंग सूची जारी करिए। लेकिन शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा व अधिकारियों के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था, उन्होंने वक्त बीतने के बाद भी वेटिंग सूची नहीं जारी की। 

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5 मार्च 2020 को रतनगढ़ विधायक अभिनेष महर्षि ने बजट सत्र के दौरान विधानसभा में अभर्थियों के की समस्याओं को रखा, उन्होंने बताया कि इस भर्ती के साथ हिन्दी, गणित, विज्ञान के अध्यापकों की भर्ती हो चुकी है लेकिन अग्रेजी के 826 पदों को अभी तक रिक्त रखा गया है। सरकार वेटिंग नियम की अनदेखी करके छात्रों के जीवन के साथ खिलवाड़ कर रही है।

अंग्रेजी विषय की एक बार भी वेटिंग लिस्ट नहीं जारी की गई। विभागीय अधिकारी अपनी कमियों को छिपाने के लिए सरकार के मंत्रियों के साथ मिलकर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए और एसएलपी दायर करके भर्ती को लटका दिया। अब सवाल है कि ऐसा क्यों किया। इसके लिए हमने बात की अधिवक्ता वेदपाल धनौठी जी से, उन्होंने बताया कि सरकार की मंशा है कि रिक्त पड़े पद अगली भर्ती में शामिल कर दिया जाए, हमने पूछा- ऐसा क्यों, नौकरी तो तब भी देनी ही है, वेदपाल जी ने बताया, हो सकता है कि उक्त अधिकारियों के रिश्तेदार इस भर्ती में शामिल हों। वेदपाल जी ने बताया कि अगर इस भर्ती को 2020 वाली भर्ती के साथ शामिल किया गया तो नए पात्र भी शामिल होंगे, नए अभर्थियों के शामिल होते ही मेरिट भी बदल जाएगी, इससे पुराने छात्र बाहर हो जाएंगे। फिर तीन साल से अधिक का वक्त बीत गया, इससे तमाम लोग ओवर एज हो जाएंगे। सारा नुकसान तो पुराने अभ्यर्थियों का ही हुआ। 

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27 दिसंबर को कांग्रेस महासचिव अजय माकन जयपुर पहुंचे, वेदपाल धानौठी जी की अगुवाई में अभर्थियों ने उन्हें अपनी समस्या से अवगत करवाया। माकन ने आश्वासन दिया कि जल्द ही अभ्यर्थियों की समस्या का समाधान किया जाएगा, 

ये तो था पूरा मामला, एक ही समय पर तमाम भर्तियां पूरी की गई लेकिन अंग्रेजी शिक्षकों की भर्ती को लटकाए रखा गया। शिक्षित समाज बनाने की दिशा में पहला कदम सरकार को बढ़ाना होता है, लेकिन जब स्कूलों में अध्यापक ही भर्ती नहीं किए जाएंगे तो एक उन्नत समाज का निर्माण कैसे होगा? सीएम अशोक गहलोत को अभर्थियों से किए गए वादों पर अमल करना चाहिए। 1000 से ज्यादा दिन बीत जाने के बाद भी काबिल अभ्यर्थी बेरोजगारी के ठप्पे के साथ जी रहा है। 



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source: https://www.molitics.in/article/759/reet-2016-english-waiting-list-not-released-despite-high-court-order-twice

Air Strike on Pakistan – किसके इशारे पर Godi Media ने बोला झूठ | Rubika Liyaqat | Anjana Om Kashyap

Air Strike on Pakistan – किसके इशारे पर Godi Media ने बोला झूठ | Rubika Liyaqat, Deepak Chaurasia, Anjana Om Kashyap “मैं तुमपे हर बार भरोसा करता हूँइतना सच्चा झूठ तुम्हारा होता है” अँधभक्तों, IT सेल कार्यकर्ताओं और गोदी मीडिया के बीच के संबंध को इश शेर से पारिभाषित किया जा सकता है। कुछ दिनों पहले हमने पाकिस्तान के संसद में मोदी-मोदी नारे के लगने की ख़बर सुनी। बाद में वो झूठी निकली। कल पाकिस्तान पर एयर स्ट्राइक की ख़बर आई। राष्ट्रवाद का हार्मोन IT सेल के योद्धाओं की शिराओं को फाड़ कर बाहर निकलने ही वाला था कि खबर झूठी निकल गई। Zee News ने इस खबर की सूचना कुछ इस अंदाज में दी ABP ने इसे घर में घुसकर मारना बताया IBC 24 ने तो ये बी बताया कि आतंकियों को भारी नुकसान पहुँचा इस कार्रवाई से। इसके अलावा फेक नूयज़वीरों दीपक चौरसिया, रुबिका लियाक़त, अंजना ओम कश्यप आदि ने इस एयरस्ट्राइक की ख़बर दी। रुबिका जी बारूदों से स्वागत करने को तैयार हो गईं थीं। Press Trust of India ने सरकारी सूत्रों से मिली सूचना के आधार पर उसने ये खबर ब्रेक की थी। हालांकि सरकारी सूत्रों ने ही बाद में इस खबर को खारिज कर दिया। बहरहाल पाकिस्तान पर एयरस्ट्राइक वाली ख़बर ब्रेक होने के आधे घंटे के भीतर ही खंडित हो गई। ANI ने लेफ्टिनेंट जनरल परमजीत सिंह को कोट करते हुए कहा कि LOC पर न तो कोई फायरिंग हुई औऱ न ही ीज़फायर उल्लंघन! आधे घंटे के अंदर ही अंजना ओम कश्यप, दीपक चौरसिया, रुबिका लियाक़त और औरों ने नई सूचना अपने ट्विटर वॉक पर चस्पाँ कर दी। लेकिन पुरानी गलती के लिए कोई माफ़ी नहीं। माफ़ी माँगने का भाव लिहाज़ से आती है, लेकिन वो तो कब की बेच जा चुकी है। लेकिन ज़्यादा दुखद इनका लिहाज़ बेचा जाना नहीं बल्कि लोगों के एक बड़े तबके का आँख बंद कर इनके ऊपर भरोसा कर लेना है। आँख खोलिए। अब वो ज़माना आ गया है जब न्यूज़ नहीं बल्कि न्यूज़ के फैक्ट चैट पर भरोसा किया जाए। #AirStrike #AirStrikeInPak #AirStrikeOnPakistan

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न्यायिक हिरासत में रोते बिलखते अर्नब गोस्वामी Flexible लोकतंत्र का एक उदाहरण हैं

आज हम आपको फ्लैक्सिबल लोकतंत्र बताएंगे। बताएंगे कि कैसे हैसियत देखते ही लोकतंत्र खतरे में आ जाता है। लोकतंत्र कमजोर कैसे होता है और मजबूत कैसे होते हैं इसे समझने के लिए रिपब्लिक टीवी के एडिटर इन चीफ अर्नब गोस्वामी का मामला समझना पड़ेगा। साथ ही उनके द्वारा पिछले तीन महीने से सुशांत सुसाइड केस में आरोपी बनाई गई रिया चक्रवर्ती का मामला समझना होगा। जो कभी स्टूडियो में दहाड़ मार रहे थे वह आज जैसे ही शिकंजे में आए तुरंत बेबस लाचार बन गए। 

फ्लैक्सिबल लोकतंत्र क्या है जानते हैं आप? यूपी के ललितपुर में ‘सत्ता सरकार’ अखबार के पत्रकार विनय तिवारी को भाजपा नेता के बेटो ने इसलिए पीटकर हाथ-पैर तोड़ दिए क्योंकि विनय ने उनके खिलाफ खबर लिख दी थी। इस घटना के बाद लोकतंत्र एकदम खतरे में नहीं आया। दूसरी खबर भाजपा शासित त्रिपुरा से है। यहां एक अखबार है ‘प्रतिवादी कलम’ इस अखबार ने कृषि विभाग में 150 करोड़ रुपए के घोटाले के संबंध में खबर छाप दी। सत्ताधारियों को ये बर्दाश्त नहीं हुआ। 7 नवंबर की सुबह इस अखबार को ले जा रही गाड़ी को रोका गया और 6000 प्रतियों में आग लगा दी गई। जो नहीं जले उसे फाड़कर फेंक दिया गया। इस घटना के बाद भी लोकतंत्र पर एकदम खतरा नहीं आया। 

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फ्लैक्सिबल लोकतंत्र लंबे वक्त से चल रहा है। पिछले दिनो हाथरस गैंगरेप मामले में आपने देखा। दो दिनों तक गांव में मीडिया को घुसने नहीं दिया गया। जिन्होंने मीडिया पावर का इस्तेमाल किया उसके खिलाफ योगी सरकार ने अपनी पावर का इस्तेमाल करते हुए एफआईआर दर्ज कर दिया। बलरामपुर में भी यही हुआ। जिन मीडिया वालों ने खबर छाप दी उन्हें नोटिस थमा दी गई। गुजरात में एक अखबार ने सूत्रों के हवाले से खबर छाप दी तो भाजपा सरकार इतनी नाराज हो गई कि उसके खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया। इन सारी घटनाओं में कहीं भी लोकतंत्र को हिचकी नहीं आई।

अच्छा अब आप पूछेंगे कि लोकतंत्र खतरे में आता कब है? आपका सवाल जायज भी है? दरअसल लोकतंत्र खतरे में तब आता है जब सत्ता पक्ष के किसी बड़े नेता पर कोई संकट आ जाए। उसकी पार्टी पर संकट आ जाए। उसके एजेंडे का खुलासा हो जाए। उसके किसी अघोषित प्रवक्ता पर संकट आ जाए। जैसे अर्नब गोस्वामी पर आया है। अर्नब पर संकट आया तो उनके समर्थकों का अलाप देखा जा सकता है। महाराष्ट्र में लोकतंत्र की हत्या की जा रही है, हिन्दुओं पर आत्याचार किया जा रहा है। मतलब ऐसी तमाम बाते लिखी बोली जा रही है जो किसी और पत्रकार के लिए नहीं निकलती। 

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जिस अर्नब को लेकर लोकतंत्र पर खतरा जैसी बात कही जा रही है, उसने तो कभी लोकतंत्र की मजबूती के लिए काम ही नहीं किया। मेरी बात पर यकीन न हो तो पुराना रिकॉर्ड खंगाल लीजिए, किसी भी पत्रकार पर हुए हमले पर रिपब्लिक टीवी व अर्नब ने चुप्पी ही साधी है। अगर मामला भाजपाशासित राज्य का रहा तो वहां दौड़कर सरकार के पक्ष में खड़े हो गए। सामाजिक कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज नाम याद होगा आपको? 4 जुलाई 2018 को अर्नब गोस्वामी ने एक कार्यक्रम प्रसारित किया और बताया कि सुधा ने किसी माओवादी को चिट्ठी लिखकर कहा कि देश में कश्मीर जैसी परिस्थिति पैदा करनी होगी। सुधा पर पैसे लेने का भी आरोप लगाया। सुधा ने इसको लेकर सफाई मांगी लेकिन अर्नब कोई सफाई न दे सके। बड़ी बात ये कि यहां भी लोकतंत्र खतरे में नहीं आया। 

आज अर्नब पुलिस की गाड़ी में रो रहे हैं। खुद को पीटे जाने की बात कह रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगा रहे हैं। ये देखकर बुरा लगता है। लेकिन इतना ही बुरा तब भी लग रहा था जब रिया चक्रवर्ती को दोषी साबित करने के लिए अर्नब स्टूडियो में बैठकर 20 लोगों से कह रहे थे ‘हमें चाहिए 302’ बुरा तब भी लग रहा था जब इनके रिपोर्टर रिया चक्रवर्ती के घर से निकलने पर टूट पड़ते थे। समय का पहिया है देखिए कितना जल्दी पलट गया। अर्नब जितने बेबस आज दिख रहे हैं रिया उतनी बेबस कभी नहीं दिखी थी। बाकी लोकतंत्र का क्या है, वह तो हर दिन खतरे में आता रहता है। लोगों ने अपने हिसाब से इसे सेट कर लिया है। इसका कब प्रयोग करना है उन्हें बखूबी पता है। 

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Impact Of Joe Biden’s Win On India

After defeating Donald Trump, it has been confirmed that Joe Biden will the next President and Kamala Harris will be the next Vice President of the United States. Beginning on a positive note, PM Narendra Modi congratulated the duo for their victory.

Now the question arises, How will Joe Biden’s win impact India? Biden may be good for India but can create problems for PM Narendra Modi. He has been disappointed by the measures that the Indian government has taken with the implementation of the NRC in Assam and the passage of the CAA into law. Biden wants India to take the necessary steps to restore the rights of Kashmiris. He stated that the restrictions on dissent, such as preventing peaceful protests or shutting or slowing down the internet, weakens democracy. 

But, the fact that Kamala Harris will be the first Indian American Vice President of the United States may change Indian engagement with American politics, as well as the United States’ response to issues in India. But, we cannot ignore another fact of Kamala Harris being a centrist like Joe Biden and Obama, which may create a problem. Though, it will not affect India-US relations.

So far, Biden may be considered better than Trump. Just look at how Trump recently insulted India by saying it has ‘filthy air’ and Biden tweeted saying that’s not how you talk about friends. Biden has also committed to strengthening the US-India ties. In an Indian-American newspaper, he wrote, “The US and India will stand together against terrorism in all its forms and work together to promote a region of peace and stability where neither China nor any other country threatens its neighbors.

We’ll open markets and grow the middle class in both the United States and India, and confront other international challenges together, like climate change, global health, transnational terrorism, and nuclear proliferation.” He believes the India-US partnership is the defining relationship of the 21st century, and he plans to strengthen ties between the two countries.

Biden believes that there is a lot of scope in bilateral trade. When he traveled to India, he set the goal of taking the bilateral trade to $500 billion, which as of now is a little over U$150 billion.

During his presidency, Donald Trump suspended H-1B visas. The Trump administration announced that it would scrap the lottery system and replace it with a process that gives priority to the highest paying jobs. But, Joe Biden has promised to lift Trump’s ban. He announced that he will definitely reform country quotas on green cards. So, Biden’s win will be really beneficial for Indians trying to become permanent U.S. residents. But, his support of a wage-based allocation process for H-1Bs, may become a problem. 

Trump pulled India from both the Iran nuclear deal and the Paris agreement. He forced India to not buy cheaper oil from Iran and Venezuela and buy more expensive oil and gas from the US. While Biden promised to reverse both these decisions. If the US takes a U-turn on Iran, it will give India access to cheaper oil. And if the US will rejoin the Paris Agreement, climate change negotiations would happen at a commonplace and India stands to gain a lot in terms of leading the efforts.

US and India signed three agreements under Trump for closer military cooperation due to an increasing threat from China. In 2020, India banned 59 Chinese apps which resulted in a clash between Indian and Chinese troops. Over 20 Indian troops and 35 Chinese troops were reported killed. Biden has committed to strengthening military cooperation between the U.S. and India. But if he eases pressure on China, it could leave India high and dry. 

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उच्च जाति का दबंग बंद कमरे में दलितों-आदिवासियों को प्रताड़ित करेगा तो नहीं लगेगा SC-ST एक्ट!

देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट से एक ऐसी खबर सामने आई है जिससे दलितों-आदिवासियों के खिलाफ होने वाले अत्याचार बढ़ सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि SC-ST जाति के लोगों के खिलाफ अगर कोई व्यक्ति घर के भीतर अपमानजनक बातें करता हो या उसे अपमानित करता हो और यह बात किसी बाहरी व्यक्ति ने न सुनी हो तो SC-ST एक्ट नहीं लगेगा.

यानि सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि दलितों और आदिवासियों के खिलाफ की गई अपमानजनक बातें तभी SC-ST एक्ट के तहत आएंगी, जब यह खुलेआम समाज में होगा और घर के लोगों के अलावा मुहल्ले के लोग भी इसे देखेंगे. सिर्फ घर के लोग और रिश्तेदार गवाह नहीं माने जाएंगे.

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लेकिन कई बार ऐसा होता है कि दलित-आदिवासी मजदूरों को बंद कमरे में प्रताड़ना दी जाती है. उन्हें कोई सवर्ण जाति का व्यक्ति घर पर बुलाकर जलील करता है. भद्दी-भद्दी गालियां देता है. ऐसे मामलों में दलित-आदिवासी जाति के लोगों को शिकायत करने के लिए गवाह भी पेश करना होगा. गवाह ऐसा जो समाज का हो. मुहल्ले का हो. रिश्तेदार या घर-परिवार का आदमी नहीं चलेगा.

अब हम आपको लाइव लॉ की रिपोर्ट पढ़कर सुनाते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के जजों ने क्या कहा….

“स्वर्ण सिंह और अन्य बनाम राज्य का जिक्र करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि टिप्पणी किसी भवन के अंदर की गई है, लेकिन घर के कुछ सदस्य या रिश्तेदार-दोस्त हैं तो यह अपराध नहीं होगा क्योंकि यह सार्वजनिक दृष्टिकोण में नहीं है.”

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बता दें कि उत्तराखंड में एक दलित महिला को किसी व्यक्ति ने घर में घुसकर कथित तौर पर गाली दी थी. सुप्रीम कोर्ट में इसी पर सुनवाई चल रही थी. लेकिन पीड़ित महिला के पास कोई बाहरी गवाह नहीं था, इसलिए कोर्ट ने यह मुकदमा खारिज कर दिया.

सुप्रीम कोर्ट के इस बयान पर कई दलित नेताओं ने सवाल भी खड़े किए. भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर आजाद ने कहा- फिर से SC-ST एक्ट को खत्म करने की साजिश की जा रही है. ये सब केंद्र सरकार के इशारे पर हो रहा है. सरकार न भूले की हम जिंदा कौम हैं. इसी तरह दलित एक्टिविस्ट हंसराज मीणा ने कहा कि अपमानित करने के इरादे को कैसे परिभाषित किया जा सकता है. जब कोई व्यक्ति उसकी जाति को लेकर ही अपमानित करता हो. तो ये था दलित नेताओं के बयान.

सच बात तो ये है कि सुप्रीम कोर्ट के इस बयान के बाद अब SC-ST एक्ट काफी कमजोर हो जाएगा. एक उदाहरण से समझिए. अगर आप अपने घर में बैठे हैं और कोई उच्च जाति का व्यक्ति किसी मामले में आपको धमकाने-गाली देने पहुंच जाए और किसी बाहरी व्यक्ति को इस बात की खबर न लगी हो तो आप कोर्ट के सामने झूठे साबित हो जाएंगे. आप लाख कहते रहें कि हमारे घरवालों के सामने उच्च जाति के लोगों ने गालियां दी, जातिसूचक शब्दों से अपमानित किये लेकिन कोर्ट आपकी बात नहीं सुनेगी. उसे तो अब गवाह चाहिए.

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जजों ने ऐसा बयान क्यों दिया? क्या सुप्रीम कोर्ट में कोई दलित-आदिवासी जज होता तो ऐसा ही बयान आता?

आपको हम एक रिपोर्ट दिखाते हैं. इस रिपोर्ट से आप जानेंगे कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में दलित और आदिवासी जजों की संख्या कितनी है. हमारे न्यायतंत्र में दलितों और आदिवासियों की क्या सहभागिता है?

देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट में केवल एक दलित जज हैं, ओबीसी के मात्र 2 जज हैं और आदिवासी जजों की तो नियुक्ति ही नहीं हुई है. वहीं 31 जजों में से 12 जज ब्राह्मण जाति से हैं. कायस्थ और नॉन ओबीसी यानि मराठा, रेड्डी जाति से 4-4 जज हैं.”

 ये व्यवस्था है हमारे सुप्रीम कोर्ट की. देश के हाईकोर्ट्स की बात करें तो यहां सिर्फ दो जज दलित समुदाय से हैं और आदिवासी जज यहां भी शून्य हैं. सबसे बड़ी बात कि उत्तर भारत की तीन सबसे बड़ी जातियों यानि यादव, कुर्मी और कुशवाहा जाति का एक भी व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट में जज नहीं बन सका है. लगभग आधे से ज्यादा जज ब्राह्मण जाति से बने हैं. अक्सर आपने देखा होगा कि हर सिस्टम में हितों का टकराव होता है. अपनी जाति के लोग अपनी ही जाति के लोगों से एक खास सहानुभूति रखते हैं. उन पर हुए अत्याचार को सुनते हैं. लेकिन सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में तो दलितों और आदिवासियों की सुनने वाला ऐसा एक भी जज नहीं है. जब जज नहीं है तो कौन सुनेगा?

सुप्रीम कोर्ट के इस बयान से पहले उच्च जाति के दबंग लोगों में एक डर था कि अगर किसी को गाली दी, या किसी दलित-आदिवासी को जातिगत रुप से अपमानित किया तो SC-ST एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज हो जाएगा. लेकिन कोर्ट के इस बयान के बाद ऐसे लोगों को एक बल मिला है. एक तरकीब मिली है. कि घर में घुसकर किसी दलित-आदिवासी पर अत्याचार करेंगे तो कोई सुनेगा नहीं. और कोई सुनेगा नहीं तो SC-ST एक्ट के तहत कार्रवाई नहीं हो पाएगी. और घर में मौजूद लोग सुन लेंगे तो होगा भी क्या! अदालत तो इनके बयान को मानेगी ही नहीं.

अब सवाल ये उठता है कि क्या घर के भीतर हो रहे अत्याचार को कोई बाहरी देखने जाएगा? या ज्यादती होने से पहले कोई दबंग किसी बाहरी को बुलाने का मौका देगा कि फलाने को बुला लो. उसके सामने ही गाली देंगे.

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मथुरा मंदिर में फैजल खान की नमाज से भड़कने वाले धार्मिक अंधे हो चुके हैं!

देश की पूरी राजनीति हिन्दू-मुसलमान के बीच बंट गई है। मीडिया का बड़ा हिस्सा भी स्कूल-कॉलेज के बजाय मंदिर-मस्जिद में ही जुटा रहता है। 29 अक्टूबर को मथुरा के नंद बाबा मंदिर में चार लोग आए, मंदिर के पुजारी से मौखिक इजाजत ली और नमाज अदा किया। 2 नवंबर को उनके नमाज पढ़ने की फोटो सोशल मीडिया पर आई तो हायतौबा मच गया। थोड़ी ही देर में घटना को सियासी रंग से रंग दिया गया। यूपी पुलिस हरकत में आई और उसने फैसल खान के खिलाफ धारा 153A, 295, 505 के तहत बरसाना थाने में FIR दर्ज कर ली। ये शिकायत मंदिर प्रशासन की ओर से दर्ज करवाई गई है। शिकायत में कहा गया कि फोटो डालने से हिन्दू समुदाय की भावनाएं आहत हुई है, आस्था को गहरी चोट पहुंची है।

अपराध पर पुलिस भले देर से जागती हो लेकिन इस मामले में वह तुरंत सक्रिय हुई और फैसल को दिल्ली से गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के बाद फैसल ने कहा, उन्होंने धोखे से नमाज नहीं पढ़ी बल्कि सबके सामने नमाज पढ़ी। साथ में दो हिन्दू साथी भी थे। किसी ने भी मना नहीं किया। फैसल ने कहा, अगर कोई रोकता तो हम वहां नमाज ही न पढ़ते। हमने तो सद्भावना के लिए नमाज पढ़ी थी। FIR को लेकर उन्होंने कहा, ये तो राजनीतिक कारणों से हुआ है। ये राजनीति किसके कहने पर हुई है ये बात यूपी में तो सभी जानते हैं। 

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भावनाओं के आहत होने, आस्थाओं को ठेस लगने और संवेदनाओं के मरते जाने का अभूतपूर्व दौर चल रहा है। बात बात पर मां-बहन की गालियां देने वालों की भावनाएं सबसे पहले और सबसे ज्यादा आहत हो रही है। असल में ये भावनाएं और आस्थाएं राजनीति की बहुत महीन टूल हैं जिसका इस्तेमाल करके ही तो सत्ता की रोटी तोड़ी जा रही है। जो फैसल खान अपने घर पर कृष्ण जन्माष्टमी का त्यौहार मनाते हैं, हिन्दू त्यौहारों को भी अपने साथियों के साथ मिलकर मनाते हैं उन्हें आज जिहादी कहा जा रहा है। समाज को बांटने वाला बताया जा रहा था। 

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फैसल खान को जानने वाले बताते हैं कि वह कट्टरता के खिलाफ लंबे वक्त से लड़ रहे हैं। उन्होंने गांधीवादी विचारधारा को ही सबकुछ समझा है। मुस्लिमों में अनपढ़ता और बेवकूफी मिटाने के लिए लंबे वक्त से काम कर रहे हैं। उनका एक नारा है कि अगर नफरत फैलाई जा सकती है तो मोहब्बत भी वायरल की जा सकती है। लेकिन उनकी बातों को कोई इतनी आसानी से कैसे पचा लेगा भला। जब पूरी राजनीति ही हिन्दू-मुसलमान के बीच फूट डालो और शासन करो पर आधारित हो, तो शांति की बात करने वालो को कौन हजम कर पाएगा। मीडिया का एक बड़ा हिस्सा तो प्रोपगेंडा फैलाने के लिए ही बैठा है। अब अगर उसके पेट पर कोई लात मारेगा तो वो चुप कैसे बैठेगा। निश्चित तौर पर जहर उगलेगा। मेरी बात पर न भरोसा हो तो टीवी देख लीजिए, सुबह से शाम तक सिर्फ नफरत ही तो फैलाई जा रही है। 

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अर्णब पर हमला पत्रकारिता पर हमला नहीं, वह अपने किए को भुगत रहे हैं

4 नवंबर को रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ अर्णब गोस्वामी गिरफ्तार क्या हुए भाजपा के नेताओं ने इसे पत्रकारिता पर हमला बताना शुरु कर दिया। सोशल मीडिया पर I stand with arnab जैसे तमाम हैसटैग ट्रेंड होने लगे। जबकि इस गिरफ्तारी का पत्रकारिता से कोई मतलब ही नहीं है। ये गिरफ्तारी तो अर्णब के फ्रॉड और इंटीरियर डिजाइनर अन्वय नाइक व उनकी मां कुमुद नाइक को आत्महत्या के लिए उकसाने को लेकर हुई है।

अर्णब की गिरफ्तारी पत्रकारिता पर हमला नहीं है। पत्रकारिता पर हमला क्या है वो हम आपको बताते हैं। पिछले साल यूपी के मिर्जापुर में एक प्राइमरी स्कूल में मिड डे मील में बच्चों को नमक रोटी दी गई। पत्रकार पवन जैसवाल ने इसपर रिपोर्ट की। योगी सरकार की किरकिरी हुई तो उन्होंने पवन के ही खिलाफ केस दर्ज कर दिया। पत्रकारिता पर हमले का दूसरा उदाहरण सुनिए। पिछले महीने बलरामपुर में लड़की के साथ रेप हुआ, पुलिस ने पोस्टमार्टम के तुरंत जबरन अंतिम संस्कार करा दिया। पत्रकारों ने इसपर रिपोर्ट छापी तो उनको नोटिस थमा दिया गया। एक अधिकारी ने धमकाते हुए कहा, बिना पोस्टमार्टम खबर चलाने की क्या जल्दी थी। 

अर्णब की गिरफ्तारी जिन्हें पत्रकारिता पर हमला लगती है छत्तीसगढ़ के कंकेर का मामला सुने। यहां सत्ताधारी गुण्डों ने पत्रकार कमल शुक्ला को दिनदहाड़े पीटा। घटना का वीडियो वायरल भी हुआ लेकिन कोई एक्शन नहीं लिया गया। झारखंड के रांची में पत्रकार आनंद दत्ता अपनी पत्नी के साथ सब्जी खरीदने निकले थे तभी पुलिस वालों ने पीट दिया। इस मामले पर भी सोशल मीडिया पर हंगामा हुआ लेकिन किसी भाजपा नेता ने पत्रकारिता पर हमला बताकर ट्वीट नहीं किय़ा। यूपी के बलिया में इसी साल अगस्त महीने में पत्रकार रतन कुमार सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई। तब भी पत्रकारिता खतरे में नहीं आई थी। 

ऐसे न जाने कितने मामले हैं, जहां भाजपा के नेताओं ने, कार्यकर्ताओं ने पत्रकारों के खिलाफ केस किया। उनके साथ मारपीट की। लेकिन किसी तरह से कोई सुनवाई नहीं हुई। अब जब अर्णब को गिरफ्तार किया गया है तब पत्रकारिता खतरे में आ गई है। आप खुद सोचिए क्या किसी से काम करवा लेना और उसके पैसे न देना मीडिया की स्वतंत्रता है? किसी को इतना परेशान करो कि वह अपनी मां के साथ आत्महत्या कर ले और आरोपी के खिलाफ कार्रवाई भी न हो। क्या अन्वय नाइक को न्याय नहीं मिलना चाहिए? आपने देखा होगा कि यही अर्णब ने सुशांत सिंह की मौत के मामले में 3 महीने तक रिया चक्रवर्ती को निशाने पर लेकर उनका जीना हराम कर दिया। अब जब एक सुसाइड मामले में खुद आरोपी बनाए गए तो पत्रकारिता पर हमला बताने लगे। 

केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी अर्णब की गिरफ्तारी को पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर हमला बताती है और फासीवाद के खिलाफ खड़े होने की बात करती हैं। लेकिन यही स्मृति जी किसी और भाजपाशासित राज्य में पत्रकारों पर हो रहे हमले पर चुप्पी साध लेती हैं। कई बार तो ऐसा लगता है कि अर्णब की गिरफ्तारी से जैसे पूरी भाजपा अनाथ हो गई हो। अमित शाह, जेपी नड्डा, जावड़ेकर जैसे दिग्गज नेता सुबह से ट्वीट कर रहे हैं। बस मोदी जी के ट्वीट की कमी है। 

आखिरी बात, अर्णब की गिरफ्तारी पत्रकारिता पर हमला नहीं है। पिछले एक साल में क्या आपने अर्णब की कोई ऐसी रिपोर्ट देखी जो जनहित में हो? अर्णब ने पिछली बार मोदी सरकार से सवाल कब पूछा था? अर्णब के अलावा कौन ऐसा पत्रकार है जो किसी राज्य के सीएम को ओ, ए सुन कहकर संबोधित करता है। कौन किसी राज्य के गृह मंत्री को कहता है कि ‘तुम हो कौन अनिल देशमुख’ कहीं के जागीरदार हो क्या? असल में अर्णब मोदी सरकार के अघोषित प्रवक्ता हैं। पत्रकारिता से उनका कोई मतलब नहीं। आज जब गिरफ्तार किया गया तो सबसे ज्यादा दर्द भाजपा को ही हो रहा है। 

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Andh Bhakt talks to Journalist on Nikita Murder case | अंधभक्त की पत्रकार से बात | Hathras Case

Why are you silent on Nikita Murder Case? You talked about Hathras rape but silent over Faridabad Murder? unfortunately questions like these are prevalent on social media platforms. Here we present a dramatic scene of an Andh Bhakt talking with a journalist. Andh Bhakt talks to Journalist on Nikita Murder case | अंधभक्त की पत्रकार से बात | Hathras Case #AndhBhaktVideo #ModiBhaktVideo Fake Video Exposed – Modi-Modi Slogans – https://youtu.be/J26T_W_fI4I Install Molitics Android App: https://molitics.app.link/1veztabf8W Like Molitics on Facebook: https://www.facebook.com/Molitics/ Follow Molitics on Twitter: https://twitter.com/moliticsindia