Nikita Tomar Murder Case को लव जिहाद से जोड़ना सिर्फ गोदी मीडिया का एजेंडा

हरियाणा के बल्लभगढ़ में परीक्षा देकर लौट रही निकिता तोमर की गोली मारकर हत्या कर दी गई। हत्या का आरोपी तौसिफ और उसका दोस्त रेहान है। ये पूरी घटना पास लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई। सरकार के फेल सिस्टम की वजह से ऐसी घटनाएं निरंतर सामने आ रही है। लेकिन इस घटना की चर्चा कुछ ज्यादा ही है, क्योंकि इसमें आरोपी मुसलमान है और मृत छात्रा हिन्दू। टीवी मीडिया का सबसे परफेक्ट विषय ही हिन्दू-मुस्लिम है। इसलिए इस घटना को हाथो-हाथ लपक लिया और पूरी घटना को हिन्दू-बनाम मुस्लिम बना दिया। 

जी न्यूज, रिपब्लिक टीवी, इंडिया न्यूज जैसे चैनलों ने पूरे मामले को मिसलीड करते हुए इस्लामिक कट्टरता से जोड़कर मुसलमानों को टारगेट कर लिया। हेडिंग बनाया- इस्लामिक जिहाद का शिकार हो रही बेटियां, कब तक शिकार होती रहेंगी हिन्दू बेटियां, हिन्दू बेटियों की हत्या के पीछे इस्लाम क्यों पड़ा, ऐसी तमाम हेडिंग जो सीधे तौर पर उकसाती नजर आ रही हैं। हैदराबाद में प्रियंका रेड्डी गैंगरेप में भी ऐसा ही हुआ था, चार आरोपियों में एक मुस्लिम को टारगेट किया गया, पुलिस पर दबाव बढ़ा और उसने एनकाउंटर कर दिया। अदालत तक मामला पहुंचा ही नहीं। 

निकिता मर्डर केस में एक चीज और भी गौर करने वाली है। यहां हत्यारे के समर्थन में कोई पंचायत नहीं की गई। कोई दल हत्यारे के समर्थन में रैली नहीं निकालने लगा। हत्यारे ने मजहबी नारा लगाते हुए हत्या को नहीं अंजाम दिया। किसी मुल्ला-मौलवी ने हत्यारे के समर्थन में बयान जारी नहीं किया। लेकिन हाथरस गैंगरेप और कठुआ में बच्ची के साथ रेप में ये सब कुछ हुआ था। हाथरस में सवर्ण परिषद ने पंचायत की, करणी सेना ने रैली की, भाजपा नेताओं ने बचाव में बयान जारी किया। किसी घटना को भी हिन्दू-मुस्लिम के एंगल से देखने का जो चश्मा सरकार ने पहनाया है वह जनता की आंखो में जाकर चिपक गया है, जिसे उतारना नामुमकिन सा हो गया है। 

कानून व्यवस्था को दुरुस्त रखने की जिम्मेदारी मनोहर लाल खट्टर सरकार की है, लेकिन वह न सिर्फ फेल रही बल्कि बड़ी लापरवाही सामने आई है। दो साल पहले निकिता के परिजनों ने आरोपी के खिलाफ केस दर्ज करवाया था लेकिन किसी भी तरह की कार्रवाई नहीं की गई। प्रशासन का हाथ अपनी पीठ पर रखा देखकर तौसिफ ने सरेराह निकिता को गोली मार दी। प्रदेश के गृह मंत्री अनिल विज घटना को लेकर कितने गंभीर है वो उनके बयान से नजर आता है, विज ने कहा, पुलिस किसी को पर्सनल सुरक्षा नहीं दे सकती, पेट्रोलिंग करती है। आप सोचिए जिसने चुनाव के वक्त सुरक्षा देने का वादा किया वह चुनाव जीतते ही कैसे बदल गया। 

अब बात इस घटना के दूसरे एंगल यानी लव जिहाद पर, जिस किसी सांप्रदायिक दिमाग वाले व्यक्ति ने इस शब्द का इजाद किया वह निश्चित तौर पर प्रेम विरोधी व अंतरधार्मिक विवाह विरोधी रहा होगा। मुस्लिम विरोध तो उसकी रग-रग में बसा होगा। तभी उसने सोचा कि प्रेम का इस्तेमाल करके भी कोई जेहाद किया जा सकता है। इस शब्द का इतना प्रचार किया जा चुका है कि जिसे कुछ भी नहीं आता वह भी लव जेहाद की अपनी एक अलग परिभाषा दिमाग में बना चुका है। ध्यान से देखेंगे तो पाएगे कि देश की सामाजिक समरसता में बहुत सारी कुरुपताएं भरी पड़ी हैं। 

अंतरधार्मिक विवाहों को इजाजत न देने का अभ्यास और उनके लव जेहाद खोजने की प्रवृत्ति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनो उस बंद समाज की निशानियां है जहां कट्टरता इंसान के दिमाग को नियंत्रित-निर्देशित करती है। अब्दुल, आमिर जैसे नाम का कोई लड़का प्रिया, प्रीति जैसी लड़की से प्यार कर ले तो पूरे समाज का फोकस लव जेहाद पर चला जाता है। पड़ोस में भले किसी को दहेज के खातिर जला दिया जाए, हर दिन पीटा जाए उससे इस समाज को फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि नफरत की खेती करने वालों ने अपनी उपज लोगों के दिमाग में डाल दी है। 

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source: https://www.molitics.in/article/729/nikita-murder-case-love-jihad-in-ballabhgarh-haryana

राष्ट्रीय कामधेनु आयोग द्वारा Cow Dung से बनी चिप सोखेगी Mobile Radiation। Raita Phail Gaya

राष्ट्रीय कामधेनु आयोग ने Cow Dung से चिप बनाया है, दावा किया कि मोबाईल से निकले Mobile Radiation को सोख लेगा। लोगों को बीमारी से बचाएगा। गाय-गोबर के जरिए कहीं हम पाषाणकाल की तरफ तो नहीं बढ़ रहे हैं? #CowDung #MobileRadiation #RashtriyaKamdhenuAayog #KamdhenuAayog

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‘PFI, foreign funding, international conspiracy’, when the Yogi government clocks then passes time from all these

In its investigation in the Hathras case, the ED has termed the alleged relationship between Bhima Army and PFI as false. The ED also said that there was no foreign funding in the Hathras incident. It is a lie to say 100 crores from abroad .

Significantly, the UP police had said about the international conspiracy in the alleged gang rape and murder in Hathras. The police had also said that an atmosphere of tension was created in Hathras due to the mutual relationship between PFI and Bhima Army.

It was also being said that 100 crore funding was done in Hathras gangrape. On the Hathras incident, CM Yogi also said that an international conspiracy is being hatched to incite ethnic and communal riots in the state.

The UP police had lodged FIRs against 19 people in the state over the alleged international conspiracy in the Hathras scandal and around 400 people were charged with sedition, conspiracy, attempts to spread unrest in the state and inciting communal tension.

The most interesting thing is that neither any evidence has been found yet nor has it been officially confirmed. In its investigation, ED has termed things like PFI connection, foreign funding of 100 crore.

Earlier , during the CAA Protest Protests were held in many parts of the state, during which time there was a fire of violence in many cities. Many people also lost their lives in violence. During that time too, the government had termed it as an international conspiracy, had told the PFI connection , not only that it was also said to be the handiwork of Islamic countries.

If we see the tenure of the Yogi government, then in all the incidents of violence that have taken place so far, they have dismissed it as an international conspiracy. We have also seen that this international conspiracy is not less than a ‘time pass’ for any event. Because of this, the government changes the natives, trying to cover their crimes in a curtain.

किसी भी घटना, वारदात के दो-चार हफ्ते बीतते हैं और सुनने में आता है कि गैंगरेप, हत्या, जातीय वर्चस्व, आधी रात को परिजनों के इजाजत के बगैर रेप पीड़िता का अंतिम संस्कार करना अफवाह हैं.असलियत तो अतंरराष्ट्रीय साजिश, पीएफआई, नक्सल एंगल और बाहर की फंडिंग है. लोगों का ध्यान वास्तविक मुद्दे से हटकर एक कॉन्सपिरेसीपर चली जाती है.

सरकार कहती है कि हाथरस, सीएए जैसी तमाम घटनाओं में अंतरराष्ट्रीय साजिश हुई थी. लेकिन सवाल ये उठता है कि ऐसे मामलों में हमारी खुफिया एजेंसी, पुलिस को क्यों नहीं खबर लगती. आखिर वे ऐसी सो कॉल्ड साजिशों को पहले ही क्यों नहीं रोकने का प्रयास करते? सच तो ये है कि सरकार ने ऐसी तमाम साजिशों के दम पर अपनी नाकामियों को छुपाया है या यूं कहें कि ‘टाइम पास’ किया है. मालूम हो कि ऐसे मामलों में न तो कोई पुख्ता सबूत मिलते हैं और न ही चार्जशीट फाइल की जाती है.

जहां तक हाथरस मामले का सवाल है, ईडी ने भीम आर्मी से पीएफआई का कनेक्शन और विदेशों से 100 करोड़ की फंडिंग की बात को झूठ करार दिया है. नक्सल एंगल वाली संदिग्ध महिला भी पुलिस से सबूत मांग रही है. लेकिन सरकार ‘अंतरराष्ट्रीय साजिश’ के तहत टाइम पास कर रही है. जांच में अभी तक सरकार के दावे गलत ही साबित हुए हैं.

हाथरस जैसी घटनाओं का सच तो ये है कि गैंगरेप, हत्या, जातीय वर्चस्व, रात के अंधेरे में पुलिस की करतूत जैसी बातें सिर्फ दो-चार दिन के लिए होती हैं. असली मुद्दे तो नक्सल एंगल, पीएफआई, अंतरराष्ट्रीय साजिश हो जाते हैं जो कई हफ्तों तक सरकार घुमाती रहती है. फिलहाल, इन तमाम मुद्दों पर सरकार जांच कर रही है, अब कथित नक्सल, विदेशी फंडिंग गिरोह बेनकाब होते हैं या नहीं देखने वाली बात होगी.

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 source: https://www.molitics.in/article/715/pfi-foreign-funding-international-conspiracy-does-yogi-government-time-pass-with-hathras-case

TRP-Khor’s hypocrisy explodes, will they apologize to Riya Chakraborty?

TRP-Khor’s dirty game has been revealed . There have also been allegations on regional TV channels including National TV, two owners of Marathi channels have also been arrested. The owner and officials of Republic TV can also be questioned by Maharashtra Police. Mumbai Police has said that in the Sushant case, these channels tampered with the TRP so that the case could be made more high voltage.

In this TRP hunger, these channels insulted Riya Chakraborty with various names such as witch, black magician, Bengal sorceress, Shokh-Hasina, Sushant’s money, part of drug mafia. In this TRP’s bare dance, TV channels proved that Riya was the one who killed Sushant. Some people accepted the decision that TV gave. This is proved by the kind of outrage seen on social media against Riya.

Currently, Riya Chakraborty has been released on bail from the Bombay High Court. While granting bail, the court said that as NCB had accused Riya that she is part of the drug mafia, she is baseless. Riya is not part of any drug mafia. The court also said that no drugs have been recovered from the homes of Riya or Sushant. Not only this, the CBI also said in its investigation that Sushant was not killed but he committed suicide.

When Riya’s parents met her outside the jail, her eyes swelled. His mother says that I was sure that my daughter would get justice and would come out one day, but we can never forget this bad time. 

The channels had declared Riya as the killer in the Sushant suicide case . TV channels were trying to prove Riya guilty of murder more than giving justice to Sushant. He got all the hashtags trended on social media, including #ArrestRheaChakroborty, after which he was detained by the police.

Riya remained in jail for 28 days, during which she and her family were humiliated every day. The media burnt TRP’s hunger in such a way that some people of the society also got hatred and hatred for them. Riya’s neighbor, food delivery boy, relatives were all being asked questions in such a way as if they were also accused.

देश में लोगों को दो हिस्सों में बांटा गया. कोई बिहारी गौरव की बात करने लगा तो कोई बंगाल की इज्जत की बात करने लगा. बॉलीवुड भी दो धड़े में बंट गया. इन सब से इतर नेता लोग मुद्दों की दरिद्रता में चुनावी मुद्दे बनाने लगे. खुद जज और सीबीआई बनकर इन्होंने लोगों की जज्बातों के साथ खेला और एक दूसरे को नंबर-वन घोषित करने में लग गए.

इस नंबर वन बनने की होड़ में रिया का बहुत कुछ गया. इज्जत, मान-मर्यादा सब टीआरपी-खोरों ने धूल-धुसरित किया. क्या टीवी के टीआरपी-खोर रिया से अपने किए की माफी मांगेंगे? ये मीडिया और समाज की गलतियां ही नहीं थीं ये गुनाह था. जिसके लिए इन टीआरपी-खोरों को लाइव टीवी पर माफी मांगनी चाहिए.

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 source link: https://www.molitics.in/article/714/trp-khor-hypocrisy-expposed-will-they-apologize-to-Riya-Chakraborty
 

1 दिन में औसतन 10 दलित महिलाओं का होता है बलात्कार! मनुवादी सोच है कारण!

 15 साल की दलित किशोरी हो, 11 साल की बच्ची, 22 साल की युवती या 4 साल की बच्ची – दलितों के ख़िलाफ़ बलात्कार की घटनाएँ लगभग आम हो गईं हैं। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार में दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा के मामलों की आवृत्ति अन्य राज्यों से अधिक है।

लगातारबढ़रहीहैंदलितोंऔरमहिलाओंकेख़िलाफ़अपराधकीघटनाएँ

2014 से 2018, 2019 और 2020 के दरम्यान साल तो बदले हैं लेकिन दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा, दलित महिलाओं के ख़िलाफ़ बलात्कार की दुखद कहानी नहीं बदली है। NCRB के आंकड़ों के मुताबिक पिछले 10 सालों में दलितों के खिलाफ अपराध के मामलों में 37 प्रतिशत का इज़ाफ़ा हुआ है। लेकिन सज़ा होने के दर में केवल 2.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 2019 में दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा के 45,953 मामले दर्ज किए गए। और सज़ा दर रही मात्र 32.1 फ़ीसदी।

आम तौर पर भी महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध के मामलों में साल-दर-साल इज़ाफ़ा हो रहा है। NCRB के आँकड़े बताते हैं कि 2017 में महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध के कुल मामले थे 3,59,849, 2019 में ये मामले बढ़कर हुए 3,78,236 और 2019 में 4,05,861।

पितृसत्तात्मकसमाजमहिलाओंकेख़िलाफ़अपराधकामुख्यकारण

महिलाओं और दलितों के ख़िलाफ़ बढ़ते अपराधों की संख्या मनुवादी पितृसत्तात्मक समाज का एक दुर्भाग्यपूर्ण चेहरा है। फ़िलहाल, हाथरस में 19 साल की लड़की के साथ हुए वीभत्स गैंगरेप, और मामले में प्रशासन की संदिग्ध भूमिका ने इस चर्चा को हवा दी है। घटना के बाद 12 गाँवों के सवर्ण लोगों द्वारा आरोपियों के पक्ष में की गई पंचायत, प्रशासन द्वारा सबूत मिटाने की कोशिश, हिंदुत्ववादी युवकों द्वारा पीड़ित के घर जाकर दी गई धमकी, व्हाट्सएप पर पीड़िता के ख़िलाफ़ तैर रही मैन्यूफैक्चर्ड कहानियाँ इस घटना के जातीय स्वरूप को उजागर करता है।

मनुस्मृतिकीजातीयव्यवस्थाकीतरफ़लोगोंकाबढ़ताझुकावदलितोंपरपड़रहाहैभारी

दरअसल, अब भी सवर्ण जातियों का एक बड़ा तबका दलितों को उसी तरह से रखना चाहता है जैसा मनुस्मृति में बताया गया है।  कट्टर हिंदुत्ववादी राजनीति ने ख़ास विचारधारा के लोगों के मन में जाति व्यवस्था पर विश्वास क़ायम करवाया है। हिंदुत्ववादी संगठन हिंदू महासभा के महामंत्री कहते हैं कि हम संविधान का सम्मान करते हैं लेकिन मनुस्मृति भी बढ़िया है। इसमें क्या ग़लत है।

समझना ज़रूरी है कि मनुस्मृति में सामाजिक श्रेणियों और उनके कर्तव्यों का वर्णन है। इन्हीं सामाजिक श्रेणियों में शूद्रों का वर्णन है। मनुस्मृति के अनुसार शूद्र के दायित्व हैं –

  1. उच्च जातियों की सेवा और
  2. ब्राह्मणों के प्रति समर्पण

मनुस्मृति के अनुसार इसके अलावा शूद्रों के पास कोई अधिकार नहीं है।

कई दलित एक्टिविस्ट्स का मानना है कि संविधान के द्वारा दिया गया बराबरी का अधिकार, मनुवादी पचा नहीं पाए। और यही कारण है कि मनुस्मृति के अनुसार शूद्रों की जो औक़ात है वो शूद्रों को याद दिलाया जाता है। और पितृसत्तात्मक समाज में औक़ात याद दिलाने के लिए बलात्कार से अधिक उपयुक्त और क्या होगा!

हिंदूराष्ट्रमेंदलितोंकेलिएग़ुलामीएकमात्रविकल्प

इस मामले में बात करते हुए दलित नेता और गुजरात के वडगाम से विधायक जिग्नेश मेवाणी ने कहा कि राजस्थान और उत्तर प्रदेश दोनों ही राज्यों में सामाजिक रूप से सामंती और सवर्णवादी सोच सशक्त है, जिसके कारण इन राज्यों में दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा की अधिक घटनाएँ देखने को मिली हैं। उन्होंने ये भी कहा कि उत्तर प्रदेश में इस तरह की सोच को सरकार और प्रशासन का समर्थन प्राप्त है, जिसके कारण वहाँ स्थिति और भी अधिक ख़तरनाक है।

कहा जा सकता है, कि मोेटे तौर पर मुसलमानों के लिए ख़तरनाक समझे जाने वाला हिंदू राष्ट्र का कांसेप्ट, दरअसल दलितों और आदिवासियों के लिए बराबर ख़तरनाक है। हिंदू राष्ट्र मनुस्मृति की नींव पर ही खड़ा हो सकता है और अगर ऐसा हुआ तो तथाकथित पिछड़ी जातियाँ एक बार फिर गुलामों की तरह ज़िंदगी जीने को मजबूर हो जाएंगी।

source: https://www.molitics.in/article/713/ten-Dalits-women-are-raped-every-day-crime-against-dalit-statistics

हिसुआ सीट कांग्रेस के खाते में, संभावित उम्मीदवार डॉ. जनार्दन को लेकर कार्यकर्ता उत्साहित

हिसुआ विधानसभा सीट पर भाजपा पिछले 15 सालों से कब्जा की हुई है. कांग्रेस पार्टी इस सूखे को खत्म करने पर पूरा जोर लगा रही है. महागठबंधन ने आज सीटों के बंटवारे का ऐलान किया है जिसमें यह तय किया गया है कि हिसुआ से कांग्रेस प्रत्याशी ही उतारा जाएगा.

हिसुआ सीट कांग्रेस के खाते में आते ही स्थानीय कार्यकर्ता बेहद उत्साहित हैं. स्थानीय कार्यकर्ता चुनचुन सिंह का कहना है कि पिछले 15 सालों से भाजपा के अनिल सिंह ने बस जनता को सिर्फ धोखा ही दिया है. विकास-विकास का दावा करने वाले अनिल सिंह का इस बार सफाया होगा.

स्थानीय कार्यकर्ता पंकज सिंह का कहना है कि डॉ. जनार्दन सिंह पेशे से एक डॉक्टर रहे हैं. वे दिल्ली के प्रतिष्ठित अस्पताल में सेवा दिए हैं. ऐसे में हिसुआ की जर्जर स्वास्थ्य व्यवस्था का इलाज सिर्फ डॉक्टर जनार्दन सिंह ही कर सकेंगे. उन्हें कांग्रेस से टिकट मिले तो जीत तय है. मौजूदा विधायक से युवा, किसान और मजदूर सब परेशान हैं. अब हमें बदलाव चाहिए.

65 साल के बुजुर्ग कार्यकर्ता रामसेवक यादव का कहना है कि कांग्रेस इस क्षेत्र में फिर से आ सकती है, बशर्ते यहां एक ऐसा उम्मीदवार चाहिए जो लोगों की आम समस्याओं को समझता हो. जो शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य समस्याओं पर ध्यान केंद्रित कर सके. डॉ. जनार्दन सिंह इस पंक्ति में सबसे आगे नजर आते हैं. पार्टी से उम्मीद है कि उन्हें ही टिकट देगी.

बता दें कि हिसुआ विधानसभा सीट से तीन बार के विधायक रहे अनिल सिंह से लोग खासे नाराज दिख रहे हैं. कांग्रेस पार्टी भी इस सीट पर सोच समझकर उम्मीदवार उतारना चाहती है. बताया जा रहा है कि पार्टी इस बार शिक्षित उम्मीदवार पर बाजी लगा सकती है. इसमें डॉ. जनार्दन सिंह पर ज्यादा चर्चा हो रही है.

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source:  https://www.molitics.in/article/711/Hisua-Assembly-seat-got-Congress-party-worker-first-choice-dr-Janardan-Singh

ट्वीट कर देने से मोदी, गांधी प्रशंसक नहीं बन जाएँगे, क्यों?

बापू के आदर्श समृद्ध भारत के निर्माण में हमारा मार्गदर्शन करते रहेंगे। – प्रधानमंत्री मोदी का ये ट्वीट पढ़ने में बहुत सुखकारी है। इस देश की नींव में बापू के आदर्श हैं। देश के प्रधानमंत्री का नींव से जुड़ाव ज़रूरी भी है और सुखद भी। लेकिन एक सच्चाई है कि बेशक आप कुछ भी कहें, कुछ भी लिखें, लोग आपको आपकी करनी से ही पहचानेंगे। इसीलिए बापू ने कहा था – मेरा जीवन ही मेरा संदेश है।

बापू के जीवन के तमाम उद्धरणों को रखने की जगह उनका जंतर रखा जा सकता है। गांधी जी का जंतर कुछ यूँ है – ‘‘मैं तुम्हे एक जंतर देता हूं। जब भी तुम्हे संदेह हो या तुम्हारा अहम तुम पर हावी होने लगे तो यह कसौटी अपनाओ, जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी तुमने देखा हो, उसकी शक्ल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम उठाने का तुम विचार कर रहे हो, वह उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा, क्या उससे उसे कुछ लाभ पहुंचेगा? क्या उससे वह अपने ही जीवन और भाग्य पर काबू रख सकेगा? यानी क्या उससे उन करोड़ों लोगों को स्वराज मिल सकेगा, जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा अतृप्त… तब तुम देखोगे कि तुम्हारा संदेह मिट रहा है और अहम समाप्त होता जा रहा है।’’

अब आते हैं मोदी जी के ट्वीट और उनके जीवन के संदेश पर। ट्वीट में मोदी जी गांधी के आदर्शों को अपनाने की बात कर रहे हैं, लेकिन उनकी राजनीति में उस शैली का प्रयोग करते दिखते हैं जिसका गांधी जी ने पुरज़ोर विरोध किया। हाल के दिनों में सराकर की नीतियों से असंतुष्ट अलग-अलग तबकों ने आंदोलन किया। लेकिन इनकी असंतुष्टि को दूर करने के लिए सरकार की तरफ़ से जवाब नहीं दिया गया। उल्टा असंतुष्ट लोगों को गुमराह कह दिया गया। आंदोलन में समर्थन करने वालों को देशद्रोही बता दिया गया। शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। किसानों पर, युवाओं पर, छात्रों पर, सामाजिक कार्यकर्ताओं पर, शिक्षकों पर लाठियाँ चलाईं गईं। संवाद के साधनों को ख़त्म करने की कोशिश हुई। विचाराभिव्यक्ति पर प्रतिबंध लगाए गए। संस्थाओं की रीढ़ तोड़ दी गई। लोगों को इस हद तक कमज़ोर बना देने की कोशिश हुई कि वो ज़रूरी सवाल न पूछ सकें।

मोदी की सरकार में देशद्रोह की धाराएँ लगाकर सामाजिक एक्टिविस्ट्स, छात्र-छात्राओं को गिरफ्तार किया गया। गांधी ख़ुद इस धारा के शिकार हुए। मोदी काल में सरकार और देश के बीच का अंतर ख़त्म कर देने की कोशिश चल रही है, जबकि गांधी ख़ुद देशप्रेम की भावना में डूबकर सरकार से सवाल पूछते थे, सरकार का विरोध करते थे। अन्याय के खिलाफ गांधी मुखर थे, मोदी सहमत न भी हों तो मौन हैं।

छात्रों के साथ हिंसा हुई- मोदी मौन रहे, एक्टिविस्ट्स के साथ हिंसा हुई – मोदी मौन रहे, मोदी समर्थकों ने सोशल मीडिया पर सरकार के आलोचक पत्रकारों (महिलाओं/पुरुषों) को गालियाँ दीं – एक्शन की दृष्टि से मोदी चुप रहे,  मोदी जी की विचारधारा से जुड़े लोगों ने धर्म के नाम पर हिंसा की – मोदी जी ने कोई कठोर एक्शन नहीं लिया। दूसरी जानिब गांधी ने चौरा – चौरी की एक घटना के बाद अपना देशव्यापी आंदोलन वापिस ले लिया।

गांधी के पक्ष में मोदी की एक, दो या हज़ारों ट्वीट्स/तस्वीरों/वीडियो पर भारी हैं राजनीतिक जीवन में उनके द्वारा लिए गए वो फ़ैसले, या अपनाए गए वो तरीक़े, जिनका विरोध गांधी लगातार करते रहे।

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  नोटबंदी, जीएसटी जैसे ‘मास्टरस्ट्रोक’ रहे फेल, फिर मोदी सरकार के कृषि बिल पर कैसे भरोसा करे किसान? source link: https://www.molitics.in/article/710/does-pm-modi-really-follow-gandhi-

राजनीतिक संरक्षण से लेकर पुलिस प्रोटेक्शन तक! क्या बलात्कारी मानसिकता को पाला जा रहा है?

हाथरस की दलित बेटी अब इस दुनिया में नहीं है. उसे कुछ हैवानों ने अपने हवस की आग मिटाने के लिए मार डाला. यह एक मामूली सी घटना तो बिल्कुल नहीं है, यह घटना बताती है कि हमारी पुलिसिया सिस्टम और उसे चलाने वाली सरकार पूरी तरह से फेल हैं. वह फिल्म सिटी तो बनाना चाहती है लेकिन एक अपराध मुक्त प्रदेश नहीं बनाना चाहती. ऐसे अपराध इसलिए हो रहे हैं क्योंकि बलात्कारी मानसिकता को राजनीतिक संरक्षण मिल रहा है.  पहले तो हाथरस की घटना को पुलिस फर्जी बताती है और जब एक्सपोज होती है तो फटाफट 100 एफआईआर दर्ज करती है.

इसी तरह जनवरी 2018 में कठुआ में एक मासूम सी बच्ची के साथ कुछ दरिंदो ने गैंगरेप किया था. उस घटना पर भाजपा नेता नंद कुमार चौहान कहते हैं कि कठुआ गैंगरेप में पाकिस्तान का हाथ होगा. सोचिए जब सिस्टम के लोग ही बेतुका और निहायत ही संवेदनहीन बयान देगें तो बलात्कारी मानसिकता क्यों नहीं पोषित होगी. यही नहीं सत्ताधारी पार्टी के नेता ही जब बलात्कार की घटनाओं को अंजाम देने लगेंगे तो आप उनसे सिस्टम में सुधार की उम्मीद भला कैसे कर सकते हैं. 

कुछ तो ऐसे हैं कि उस बलात्कारी नेता का खुलेआम समर्थन करते हैं, उसके जन्मदिन पर बधाई देने जेल जाते हैं. इतना ही नहीं बलात्कारी जब जेल से रिहा होता है तो उसे फूलों की माला पहनाई जाती है.

कुछ देख पा रहे हैं आप कि हमने कहां तक का सफर तय कर लिया है. कहने को तो हम विश्व गुरु, डिजिटल इंडिया, स्मार्ट इंडिया, आत्मनिर्भर भारत का ढोल पीटते हैं लेकिन वास्तविकता कुछ और ही है. हमारे यहां लोग जाति-धर्म के आधार पर बलात्कार को न्यायोचित ठहराने लगे हैं. कुछ तो ऐसे हैं जो इसे ”सबक सिखाने वाला” काम कहते हैं. 

हम ऐसे दौर में पहुंच गए हैं जहां बलात्कारियों के विरोध में नहीं उनके समर्थन में लोग प्रदर्शन करने लगे हैं. विशेष धर्म और विशेष जाति के नाम पर लोग एक बलात्कारी का भी समर्थन कर रहे हैं. दरअसल, ये समाज उन राजनेताओं ने बनाया है जिन्हें धर्म और जाति के नाम पर राजनीति करनी होती है, वोट लेना होता है.

पुलिस भी उसी राजनीति का हिस्सा है, इन्हें भी तो वही धर्म और जाति के नाम पर राजनीति करने वाले लोग गाइड करते हैं. सच कहें तो इस प्रकार की मानसिकता तब तक हमारे समाज में जिंदा रहेगी, जब तक इन्हें राजनीतिक संरक्षण मिलता रहेगा.

माफ करना गुड़िया, ये सिस्टम और ये समाज तुम्हारे लायक था ही नहीं.

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Source Link: https://www.molitics.in/article/709/political-protection-over-rape-mentality-people

हिसुआ : विधायक जी अपनी जाति के यहां मुंडन कार्यक्रम में भी पहुंच जाते हैं पर हमारे घर नहीं आते

देखिए सर हम लोग मुखिया जी के कहने पर पिछली बार कमल के फूल वाले अनिल बाबू को वोट दे दिए थे लेकिन पिछला पांच साल में वह इधर आए ही नहीं। पड़ोस वाले गांव में वह अपने जाति वाले लोगों के घर बच्चों के मुंडन में भी आ जाते हैं लेकिन इधर नहीं आते। क्या हम लोग इंसान नहीं है? क्या हम लोगों के भोटो (वोट) की भैल्यू (वैल्यू) नही हैं? यहां नेता लोग हम लोगों को बार बार ठग लेता है। 

ये बाते नवादा जिले के हिसुआ विधानसभा के अंतर्गत आने वाले अकबरपुर प्रखंड के तेलभद्रो गांव के सजीवन रजवार ने कही। वहां मौजूद कई और लोगों ने भी सजीवन की बातों में हां में हां मिलाई। इन सभी की शिकायत सिर्फ विधायक अनिल सिंह के न आने से नहीं है बल्कि गांव की खस्ताहाल सड़क, अस्पताल व स्कूल को लेकर भी है। कहते हैं कि अनिल जी बाते बड़ी-बड़ी करते हैं काम सिर्फ अपने वर्ग के लोगों का करवाते हैं। 

बिहार की पूरी राजनीति में जाति का फैक्टर सबसे अधिक महत्वपूर्ण रहा है। नवादा जिले की बड़ी संख्या भूमिहार वर्ग से है। जिले की हिसुआ सीट में अकेले 1 लाख 10 हजार से अधिक भूमिहार वोटर हैं। इसीलिए यहां पिछले 50 साल में भूमिहार वर्ग से ही विधायक चुने गए हैं। वह किस पार्टी से है इससे कोई मायने नहीं रखता। पिछले साल जदयू-राजद ने मिलकर चुनाव लड़ा था तब कौशलेंद्र यादव को उम्मीदवार बनाया था, जातीय समीकरण साधने के बावजूद वह भाजपा के अनिल सिंह से करीब 10 हजार वोटो से हार गए थे। 

2020 के चुनाव में हमने कई क्षेत्रों का दौरा किया, अकबरपुर मार्केट के बगल स्थित डीही गांव पहुंचे तो लोगों की भीड़ लग गई। हमने बात किया तो 65 वर्षीय सदानंद सिंह ने कहा, इस सीट पर भूमिहारों का ही चलेगा सर, राजद-कांग्रेस गठबंधन इस सीट पर किसी भूमिहार वर्ग का उम्मीदवार उतार दे तो उसकी जीत निश्चित हो जाएगी, क्योंकि इस वर्ग के लोग भी 15 साल से चल रहे नेतृत्व को लेकर परेशान हो गए हैं। लोगों को एकदम नया चेहरा चाहिए। 

कांग्रेस से यहां सबसे मजबूत उम्मीदवार डॉ. जनार्दन प्रसाद सिंह बताए जाते हैं। शादीपुर के लोग बताते हैं कि यहां एक साफ छवि के उम्मीदवार की जरूरत है। अगर जनार्दन को गठबंधन उम्मीदवार बनाता है तो अनिल सिंह को कड़ी टक्कर मिलेगी। दिवंगत कांग्रेस नेता व इस सीट से 25 साल विधायक रहे आदित्य सिंह की बहु नीतू सिंह भी टिकट की दावेदारी कर रही हैं लेकिन क्षेत्र में उनकी पहचान बेहद कम है इसलिए टिकट मिलने की संभावना कम ही नजर आती है। बाकी और भी उम्मीदवार टिकट के लिए लगे जरूर हैं लेकिन उन्हें टिकट मिलने की संभावना कम ही नजर आती है। 

इस विधानसभा की बड़ी समस्याओं में खस्ताहाल सड़क और स्वास्थ्य व्यवस्था सबसे बड़ा मुद्दा है। पिछले 40 साल से दो नेताओं के पास ही ये सीट रही लेकिन ये समस्या लगातार बनी हुई है। कई गांव में तो हालात ऐसे हैं कि अगर 50 मिनट पानी बरस दे तो उस गांव की सड़के गुम हो जाती हैं। रोजगार की समस्या सबसे विकट समस्या है। पुराने सारे नेताओं ने स्थानीय स्तर पर रोजगार मुहैया करवाने की बात तो कही लेकिन कभी अपने वादे को पूरा नहीं कर सके। इसके पीछे बड़ी वजह बिहार की सरकारें भी रही हैं जिन्होंने लोगों के पलायन को कभी जरूरी मुद्दा ही नहीं समझा। 

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source: https://www.molitics.in/article/707/bihar-assembly-election-ground-reporting-of-hisua-assembly

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