सिर्फ UPSC जिहाद पर ही नहीं बल्कि सुरेश चव्हाणके पर भी बैन जरूरी, 1-1 शब्द नफरत से भरा है

मीडिया का वास्तविक काम बिना किसी लाग-लपेट के लोगों तक सूचना पहुंचाना है। लेकिन पिछले कुछ वर्षो से इसके स्वरुप में व्यापक बदलाव आए हैं। सूचना के बजाय एक विचार भी लोगों तक पहुंचाए जा रहे हैं। यहां तक तो ठीक था लेकिन धीरे धीरे सुनियोजित तरीके से एक विचारधारा पर हमला हुआ। सोच को कुंद करने की कोशिश शुरु हो गई। ताज्जुब की बात ये कि इसमें भी मीडिया के तमाम संस्थान सफल रहे। रिपब्लिक भारत ने तो टीआरपी की जंग में खुद को सबसे ऊपर खड़ा कर लिया। 

ताजा मामला सुदर्शन टीवी से जुड़ा है। कहने को तो ये न्यूज चैनल है लेकिन इस पर वही न्यूज चलती है जिसमें सरकार से सवाल न पूछे जाए। जनता से जुड़े सरोकार का तो कोई मतलब ही नहीं। मतलब है तो बस नफरत से। जी हां नफरत से। चैनल के प्रमुख सुरेश चव्हाणके बिंदास बोल के जरिए लोगों के सामने आए मुद्दों को लेकर आते हैं जिसे समाज की शांति और एकता पर कुठाराघात करता हो। जो मुसलमानों को कठमुल्ला कहकर संबोधित करता हो उससे भला शांति की अपील कैसे की जा सकती है?

सुप्रीम कोर्ट ने सुदर्शन टीवी के बिंदास बोल के जरिए प्रसारित होने वाले UPSC जिहाद पर रोक लगा दी। इस कार्यक्रम के चार शो 11,12,13 व 14 सितंबर को प्रसारित किया जा चुका है। ये क्रम 20 सितंबर तक चलने वाला था जिसे कोर्ट ने रोक दिया। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा, इसमें खोजी पत्रकारिता जैसा कुछ नहीं है। समाज के एक खास समुदाय यानी मुसलमानों को टारगेट करके बनाया गया प्रोग्राम है। सुप्रीम कोर्ट के पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने भी इसपर रोक लगाई थी लेकिन बाद में केंद्र की मंजूरी के बाद इसे प्रसारण की अनुमति मिल गई थी.

कोर्ट की बातें ध्यान देने लायक हैं। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस इंदु मल्होत्रा व जस्टिस केएस जोसेफ की तीन सदस्यीय पीठ ने कहा, देखिए इस कार्यक्रम का विषय कितना उकसाने वाला है कि मुसलमानों ने सेवाओं में घुसपैठ कर ली है। यह तथ्यों के बगैर ही संघ लोग सेवा आयोग की परीक्षाओं को संदेह के दायरे में ले आता है। सुदर्शन न्यूज की तरफ से वकील श्याम दीवान ने कहा चैनल इसे राष्ट्रहित में एक खोजी खबर मानता है। 

ये तो रहा कोर्ट का फैसला। इस कार्यक्रम में कहा गया है कि जामिया के छात्र सिविल सेवाओं में हो रही घुसपैठ का हिस्सा हैं, आप सोचिए किस तरह देश की नंबर 1 यूनिवर्सिटी को लेकर लोगों के दिमाग में जहर भरने का काम किया जा रहा है। मुस्लिम सिविल सेवाओं में घुसपैठ कर रहे हैं यह कहने की आजादी भला किसी पत्रकार को कैसे दी जा सकती है? अगर सबूत है तो उसे कोर्ट में पेश किया जाए, केंद्र सरकार के सामने रखा जाए लेकिन ऐसा ये नहीं करने वाले, टीवी के जरिए ऐसा करेंगे तो ये अपने मंसूबे में कामयाब होंगे। 

सुरेश चव्हाणके दम लगाकार झूठ बोलते हैं, बिना रुके फर्जी चीजे दिखाते हैं, जिस जमाने में एनडीटी को राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर बैन कर दिया जाता है, द क्विंट के दफ्तर में छापेमारी हो जाती है उस दौर में सुदर्शन न्यूज बिना रुके बेधड़क धार्मिक उन्माद फैलाता है, केबल टीवी रेग्युलेशन एक्ट 1995 के अनुसार अगर कोई चैनल धार्मिकता का चोला पहनकर किसी धर्म के खिलाफ उग्रता से पेश आता है तो उसपर कार्रवाई बनती है पर इनपर आजतक किसी तरह की कोई आंच नहीं आई।

सुरेश दिल्ली जाकर एक मुस्लिम इलाके में रिपोर्टिंग करते हैं, वहां के मुसलमानों को रोहिंग्या बता दिया, उन्हें देश के लिए खतरा बता दिया, लोगों ने शिकायत की तो अल्पसंख्यक आयोग ने सुदर्शन न्यूज को नोटिस भेज दिया। आरोपों की लंबी लिस्ट हैं। नवंबर 2016 में इसी चैनल की एक एम्पलॉई ने सुरेश जी पर रेप व अटेम्ट टू मर्डर का आरोप लगाया, आईपीसी की 11 धाराओं में इनके खिलाफ केस दर्ज हुआ और पुलिस ने इन्हें गिरफ्तार कर लिया। जुलाई 2017 में सपा के नेता नरेश अग्रवाल जो अब भाजपा में आकर शुद्ध हो गए हैं उन्होंने राज्यसभा में भगवान राम को लेकर गंदा कमेंट कर दिया, सुरेश च्वहानके नरेश अग्रवाल से भी ज्यादा नीचे गिर गए और उनके लिए तमाम भद्दी बाते अपने बिंदास बोल में कह दी, 28 सांसदों के हंगामें के बाद राज्यसभा ने इन्हें नोटिस भेजा था।

मुसलमानों को कठमुल्ला कहने वाले सुरेश की इस्लाम से नफरत जगजाहिर है, अप्रैल 2017 में इन्होंने यूपी के संभल की खबर दिखाई, उसमें सुरेश ने बताया कि संभल में अलकायदा का नेटवर्क है, यहां के लोग आतंकी गतिविधियों में लिप्त हैं, ऐसी ही तमाम बातें उस प्रोग्राम में कही जिसके लिए बाद में बेइज्जती भी हुई पर जिसने जहर ही फैलाने की जिम्मेदारी ले ली हो उसे फिर बेइज्जती से क्या फर्क पड़ता है। मुसलमानों के बाद राष्ट्रवादी जी सनी लियोनी को टारगेट करते हैं, हर दूसरे दिन सनी लियोनी की खबरे दिख ही जाएगी, सुरेश जी के अनुसार आतंकियों के गोली बम से देश को उतना नुकसान नहीं हुआ है जितना सनी लियोनी की वजह से देश में सांस्कृतिक नुकसान हुआ है। 

संविधान के आर्टिकल 19 में लिखा है देश की एकता अखंडता को तोड़ने वाले स्पीच पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाया जा सकता है फिर सुदर्शन न्यूज का प्रसारण कैसे हो सकता है? ये पूरा चैनल देश की नई नस्ल को खराब कर रहा है। पूरा चैनल दिनभर दो समुदायों के बीच घृणा फैलाने का काम करता है। सुरेश का एक एक शब्द नफरत और घृणा से भरा रहता है। इस पूरे चैनल पर रोक लगाने की जरूरत है। चव्हाणके जैसे लोग पत्रकारिता के नाम पर जो जहर बो रहे हैं उसे अगर जल्द खत्म नहीं किया गया तो नतीजे बेहद खतरनाक होंगे। 

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नोटबंदी, जीएसटी जैसे ‘मास्टरस्ट्रोक’ रहे फेल, फिर मोदी सरकार के कृषि बिल पर कैसे भरोसा करे किसान?

2014 से पहले जब नई योजनाएं लागू की जाती थी तब उसे लेकर बहुत ढिंठोरा नहीं पीटा जाता था, उसकी सफलता असफलता उस योजना के लागू होने के बाद पता चलती थी, लेकिन 2014 भारतीय इतिहास का ऐतिहासिक साल रहा, सत्ता परिवर्तन हुआ और नरेंद्र मोदी जी देश के प्रधानमंत्री बने। उसके बाद जो योजनाएं शुरु हुई वह सभी मास्टरस्ट्रोक कही गई। नोटबंदी को भाजपा ने मौद्रिक सुधार बताकर पेश किया, जीएसटी को कर सुधार, तालाबंदी को महामारी से बचाव के लिए मास्टरस्ट्रोक बताया गया, चौथा सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक कृषि कानून है, जिसे किसानों के लिए वरदान बताया जा रहा है। 

सरकार के तमाम मास्टरस्ट्रोक सुधार के लिए ही होते हैं लेकिन सुधार किसका होता है और सुधरता कौन है ये सुधारक नहीं बताता। यहां तक कि जिसके लिए ये सुधार किए जा रहे हैं उसके प्रति भी इनकी कोई जवाबदेही नहीं होती। वह लाख विरोध करते हुए मर जाए लेकिन इनके कानों पर जू तक नहीं रेंगती। किसान एवं कॉरपोरेट की इस शिखर वार्ता में अब सरकार कहीं नहीं रही। उसने बाजार खोल दिए हैं। अब मनमर्जी चलेगी। 

राज्यसभा में पारित इस कानून को लेकर तमाम विरोधाभास है, जैसे अगर सरकार की नियत साफ है तो मंडियो के बाहर होने वाली खरीद पर किसानों को एमएसपी की गारंटी दिलवाने से क्यों इंकार कर रही है। मोदी जी कह जरूर रहे हैं लेकिन उनकी बातों पर कैसे भरोसा किया जाए, उन्होंने कहा था कि 2 करोड़ रोजगार हर साल मिलेंगे, लेकिन यहां तो नौकरी ही बचाना मुश्किल हो रहा है। उन्होंने कहा था कि काले धन की वापसी होगी लेकिन यहां तो सफेद धन को भी लेकर तमाम लोग बाहर भाग गए। 

सरकार के मुताबिक नए कानून के जरिए बिचौलियों को हटाया जाएगा, लेकिन किसान की फसल खरीद करने या उससे कॉन्ट्रैक्ट करने वाली प्राइवेट कंपनियां, अडानी या अंबनी को सरकार किस श्रेणी में रखती है, उत्पादक, उपभोक्ता या बिचौलिया? वही अगर टैक्स के रूप में मंडी की कमाई बंद हो जाएगी तो मंडिया कितने दिन तक चल सकेंगी भला? आखिर उन्हें कैसे बचाया रखा जा सकता है? डर ये भी है कि आगे चलकर रेलवे, टेलीकॉम की तरह क्या मंडियो का घाटा दिखाकर उन्हें निजी हाथों में नहीं सौप दिया जाएगा? 

आवश्यक वस्तु (संशोधन) अध्यादेश 2020 के तहत किसी को भी कितनी भी तादाद में अनाज और खाद्यान की जमाखोरी करने की छूट देता है। यह अध्यादेश जिस कानून को हटाता है वह आवश्यक वस्तु कानून इसलिए था कि मुनाफाखोर सस्ते में खाद्यान खरीदकर उसे बाद में मंहगे दामों में न बेचे, लेकिन अब नए कानून के तहत वह कितना भी खाद्यान जमा कर लें किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं हो सकती। 

ऐसे ही तमाम सवाल हैं जो गले से उतरती ही नहीं। जिस देश में खेती पहले से ही अभूतपूर्व संकट की चपेट में है, 85 फीसदी किसान लघु या सीमांत किसान हैं. आधी से अधिक ग्रामीण आबादी भूमिहीन या खेत में मजदूर है, खेती किसानी में घाटे के चलते करीब 2 करोड़ लोगों ने खेती छोड़ दी, हर दिन दर्जनभर से अधिक किसान आत्महत्या कर रहे हैं उस देश में किसानों की बात सुने बिना ही कोई फैसला लेना न्यायोचित नहीं हो सकता है। 

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How will online education fare in India post pandemic

The sudden lockdown due to the Covid-19 pandemic has thrust schools and teachers of both public and private institutions into an emergency remote teaching mode. As it becomes increasingly clear that the pandemic situation is likely to force the coming academic year to continue online, at least in some geographies, state governments and even the MHRD are looking for best practices and SOPs (standard operating procedures) for online education that can be shared with the school managements, teachers and parents. At this juncture, therefore, it is essential to review some of the recent experiences of emergency remote teaching and derive some useful lessons.

Learning from children

Experts suggest that some of the important lessons on the way forward could be learnt best from not just preparing overarching SOPs that largely are framed using a top-down approach, but by rather making the school children important stakeholders in the process. Evaluating how the online medium of teaching is interacting with children’s learning processes gives far greater insights on how the government, institutions and teachers can adapt to the new and evolving scenario.

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Teachers are wisely making use of the autonomy they have been given and the truncated contact hours to guide students through their own learning process through activity-based learning, rather than trying to replicate the face-to-face teaching model. This flipping of responsibility, putting students in charge of their own learning, albeit with different degrees of guidance from teachers and support from parents, is helping to develop student agency. Students are taking the initiative, and developing their own voice, as they learn through activities, working on their own, also in collaboration with peers and adults. 

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Addressing accessibility issues

Online education is necessary because children benefit from structured learning environments, and there is a danger of them regressing if their education is interrupted for too long. The Bengaluru-based Parikrma Humanity Foundation, which works for the education of children in the city’s informal settlements collected spare smartphones and used them to create virtual schools for approximately 2,000 children, all first-generation learners, from 87 slum communities. Two or three students gathered at selected homes with appropriate physical distancing and shared a smartphone.

The school began with assembly at 8.15 a.m. each morning and halted for the day at 12.30 p.m. with a break in between so that the cell phones could be charged. “Teachers have responded brilliantly to the challenge, the crisis bringing out their willingness to participate and help,” said Parikrma’s founder Shukla Bose, adding that these virtual schools had over 90 percent attendance


Learnings for creating a conducive policy framework


State governments such as Karnataka and Maharashtra have banned online classes for very young children, but Karnataka has allowed the use of recorded videos and has appointed a committee to suggest guidelines for revoking the ban. It would be good for such committees to keep some of the learnings outlined here in mind.

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The guidelines that MHRD is contemplating i.e., restricting the length of class time to up to two hours on weekdays, getting parents and volunteers to help teachers, and requiring schools to offer content in multiple mediums to cater to students with varying degrees of technology access or even no access, and providing for the physical and mental health of students, are all very good steps in the right direction.
source: https://www.molitics.in/article/699/How-will-online-education-fare-in-India-post-pandemic

ऑपरेशन ब्लू स्टार : पढ़िए, स्वतंत्र भारत में असैनिक संघर्ष की सबसे खूनी लड़ाई का पूरा किस्सा

ऑपरेशन ब्लू स्टार को आज 36 बरस हो गए। 1984 में पंजाब के हालात आज के कश्मीर के जैसे थे। प्रदेश में अस्थिरता पैदा करने की जोरदार कोशिश हो रही थी। पंजाब पुलिस के डीआईजी एएस अटवाल की हत्या कर दी जाती है। जालंधर के पास बंदूकधारियों ने पंजाब रोडवेज की बस रुकवाकर उसमें बैठे हिन्दुओं को चुन-चुनकर गोली मार दी। विमान हाईजैक कर लिया गया। पंजाब की स्थिति बेकाबू हो चुकी थी इसलिए केंद्र की सत्ता में बैठी इंदिरा गांधी ने वहां कि सरकार को बर्खास्त करके राष्ट्रपति शासन लगा दिया।

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प्रदेश को अस्थिर करने वाला कोई और नहीं बल्कि पंजाब में ही जन्मा जनरैल सिंह भिंडरावाले था। भिंडरावाले कोई मामूली इंसान नहीं था। शुरुआती जीवन आम लोगो जैसा रहा। फिर राजनीति में अपने तेज तर्रार बोल के कारण पंजाब के लोगों में अपनी पहचान बना लिया। कहा जाता है कि संजय गांधी का हाथ हमेशा उसके ऊपर रहा। भिंडरावाले पंजाब में लोगों को नशा छोड़ने को लेकर जागरुक करता था फिर अचानक उसमें बदलाव हुआ और अलग “खालिस्तान” की कल्पना जाग गई। “राज करेगा खालसा” का नारा उसके दिमाग में बस गया और वह आतंकवाद के रास्ते पर चला गया।

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भिंडरावाले के अन्दर हिन्दुओं को लेकर नफरत बढ़ चुकी थी। अलग खलिस्तान की मांग को लेकर उसने रास्तें में आई हर बाधा को उसने काट दिया। उसकी नफरत ने उसे सिखो के बीच पॉपुलर कर दिया। 1981 में उसने पंजाब केसरी निकालने वाले हिन्द समाचार समूह के प्रमुख लाला जगत नारायण सिंह की हत्या कर दी। आरोप भिंडरावाले पर लगा पर उसे पकड़ने की हिम्मत पंजाब पुलिस में नहीं थी। उसने खुद गिरफ्तारी के लिए दिन और समय निश्चित किया था। उसे सर्किट हाउस में रखा गया और बाद में छोड़ दिया गया।

1983 से अलग खलिस्तान की मांग बढ़ने के साथ भिंडरावाले का आतंक भी बढ़ गया था। उसने स्वर्ण मंदिर को एक किले में तब्दील कर दिया था। सिर के ऊपर पानी जाता देख तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी के माथे पर भी चिन्ता की लकीरे दिखने लगी थी। भिंडरावाले के खात्मे के लिए उन्होंने अधिकारियों से बात करनी शुरू की। बातचीत के दौरान उन्होंने पूछा खात्मे में “कितना नुकसान होगा” अधिकारी ने कहा कि तैयारी बेहतर है नुकसान कम होगा। पर इंदिरा को भिंडरावाले की शक्ति का एहसास था इसलिए फैसला लेने में हिचकती रही। आखिर में सेना को ऑपरेशन ब्लू स्टार की इजाजत दे दी गई।

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ऑपरेशन ब्लू स्टार शुरू होने से ठीक पहले राज्य की बिजली और टेलीफोन व्यवस्था काट दी गई। तीन जून को मंदिर की घेराबंदी करके फायरिंग शुरू कर दी गई। अर्जुन देव शहीदी होने के कारण मंदिर में काफी लोग थे। इसलिए सेना खुलकर फायरिंग नहीं कर सकती थी। आतंकियों को जब लगा कि सेना ने उनके सफाए के लिए अभियान चला रखा है तो उन्होंने मंदिर के अन्दर आए लोगों को ही डाल बना लिया और किसी को बाहर निकलने ही नहीं दिया। रात के साढ़े 10 बजे लगभग 20 कमांडों नाइट विजन चश्में, स्टील हेलमेट और बुलेटप्रूफ जैकेट पहनकर स्वर्ण मंदिर में घुसे।

सेना के लोग श्रद्धालु व पत्रकार बनकर अन्दर की रेकी तो कर लिए थे पर उन्हें भिंडरावाले की सही ताकत का अंदाजा लगाने में चूक हो गई थी। सेना होशियारी से इस ऑपरेशन को अंजाम देना चाहती थी पर उनकी होशियारी को भिंडरावाले की आतंकी सेना चुनौती दे रही थी। सेना को सख्त आदेश था कि अकाल तख्त पर गोलीबारी नहीं की जाएगी पर आंतकियों में ऐसा कुछ नहीं था वह हर जगह से गोलियां तड़तड़ा रहे थे। रात के दो बज चुके थे सेना और आतंकी दोनों की लाशे गिर रही थी। सेना को लग गया कि उसने आंतकियों की ताकत को हल्के में ले लिया है।

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आतंकी लगातार मशीनगन से गोलियां तड़तड़ाते रहे। भारतीय कमांडो दस्ते ने गोले फेंककर उनके इस ठिकाने को शान्त किया। सुबह तीन विकर विजयंत टैंक लगाए गए। 105 मिलिमीटर के गोले दागकर सेना ने अकाल तख्त की दीवारें उड़ा दी। उसके बाद चुन चुनकर आतंकियों को पकड़ा गया। दिनभर रुक रुककर गोलियां और बम चलते रहे। शाम को भिंडरावाले को मारकर गिरा दिया गया। इसके साथ ही ऑपरेशन ब्लू स्टार खत्म हो गया।

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स्वतंत्र भारत में असैनिक संघर्ष में यह सबसे खूनी लड़ाई थी। भिंडरावाले को रोकने के लिए मशीनगन, हल्की तोपें, रॉकेट और आखिरकार लड़ाकू टैंक तक आजमाने पड़े। इस ऑपरेशन में सेना के 83 जवान और 492 नागरिक मारे गए थे। इस घटना से कुछ महीने बाद ही इंदिरा गांधी की हत्या कर दी जाती है। उसके बाद देश में सिखों का कत्लेआम होता है।
source link: https://www.molitics.in/article/691/full-story-of-operation-blue-star-1984-in-hindi

The Tus(k)sle Between Politics and Animal Cruelty

In a gruesome incident reported from Kerala, a 15-year-old elephant died standing in water after she consumed a pineapple which was stuffed with firecrackers. The fruit exploded in her mouth and she bled to death.

This incident was reported after  Mohan Krishnan, a forest officer narrated the details of the horrific death on social media.  Krishnan wrote on Facebook, “She trusted everyone. When the pineapple she ate exploded, she must have been shocked not thinking about herself, but about the child, she was going to give birth to in 18 to 20 months.” 

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“So powerful was the cracker explosion in her mouth that her tongue and mouth were badly injured. The elephant walked around in the village, in searing pain, and hunger. She was unable to eat anything because of her injuries,” he added. Krishnan also informed that even during this pain she didn’t harm a single human being or crush a single home.

Not New in Kerala!

After this incident, there were reports that she was fed this pineapple but, according to wildlife experts, wild elephants can’t be fed anything. This is a common practice to stuff dynamite inside pineapples. This is done by locals to save their crops and fruits from wild boars.

This incident is the first time that Kerala has reported such an incident. Apparently, ‘God’s Own Country’ is not so friendly with animals. After this incident, it was highlighted that another female elephant was killed after she ate a firecracker filled pineapple which smashed her jaw and she died.

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The Misinformation

When this incident came to light there was news that this incident happened in Muslim majority Malappuram district of Kerala.  However, it was later clarified that the elephant died in the Mannarkkad division of Palakkad district.

But this misinformation had gone forward and Union minister Prakash Javadekar also ended blaming the Malappuram district. The BJP leader Maneka Gandhi went a step ahead and called Malappuram the “most violent district” in the country.

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She didn’t stop at this she somehow managed to drag Congress leader Rahul Gandhi’s name into this matter. She blamed him for not taking action against the killing of the pregnant elephant as the ‘Malappuram’ district fell under Wayanad Gandhi’s constituency. It was later revealed that her claims were false.

Giving it Communal Angle!

You know the politicians of our country love to give a communal angle to anything they like. And, the sad part is they know that we will fall for this trap every single time. This happened in this case as well. When the name of Malappuram district came up, it was automatically assumed that Muslims did it as it was a Muslim majority area. And, Maneka’s Gandhi’s statement that it is the ‘most violent district in the country’ was an indirect attack on the people of the district. 

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Apart from her, Pakistani-Canadian journalist Tarek Fateh also tweeted that the elephant’s death happened in the only Muslim-majority district of the state with an over 70% Muslim population. 

Communalising the death of an elephant was criticized by many eminent personalities including CM Vijayan.

CM Pinarayi Vijayan tweeted, 

“We are saddened by that fact some have used this tragedy to unleash a hate campaign. Lies built upon inaccurate descriptions and half-truths were employed to obliterate the truth. Some even tried to import bigotry into the narrative. Wrong priorities.”

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Actress Parvathy Thiruvothu tweeted, Just how you jump at an opportunity to make this an anti-Muslim, hate campaign is astonishing. Focus on the problem. ANIMALS ARE IN DANGER BECAUSE OF CRUEL EXPLOSIVE SNARES. Talk about the actual issue here!”

It is About Animal Cruelty, Nothing Else!

Once at the heart of Kerala’s traditional economy and culture, the care of elephants and other wildlife has become a victim of prospering forest buffer zones. It’s high time people understand that the death of a pregnant elephant is about animal cruelty and not about religion or politics. It’s about human-animal conflict and nothing else. Lawmakers need to make policies in which both humans and animals can co-exist without harming each other.
source: https://www.molitics.in/article/690/the-tussle-between-politics-and-animal-cruelty

6 बार माफीनामा लिखने वाले व अंग्रेजो से पेंशन पाने वाले सावरकर ‘वीर’ कैसे?


“वीर दामोदर सावरकर को सम्मान देना है तो गांधी की विचारधारा की तरफ अपनी पीठ करनी होगी। और अगर गांधी को स्वीकारना है तो सावरकर की विचारधारा को नकारना होगा। दोनों को एक साथ लेकर चलना लगभग असंभव है।”

हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व को राजनीति में प्रवेश दिलाने वाले विनायक दामोदर सावरकर की आज (28 मई) जयंती है। सावरकर भारतीय आधुनिक इतिहास की ऐसी शख्सियत हैं जिनका जब भी नाम लिया जाता है विरोध के सुर अपने आप तैयार हो जाते हैं। वर्तमान भाजपा सरकार सावरकर को लेकर जितना फिक्रमंद रही है कांग्रेस उतना ही विरोधी। बहुत मामलों में कांग्रेस और भाजपा एक छोर पर खड़े दिख जाएंगे पर जब बात सावरकर की हो तो दोनों पार्टियों दो अलग ध्रुव पर खड़ी दिखती हैं।

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नासिक के भागपुर में 28 मई 1883 को जन्में सावरकर जब 7 साल के थे तो हैजे की बीमारी से इनकी मां और जब इनकी उम्र 16 साल थी तो प्लेग की महामारी से इनके पिता दामोदर पंत सावरकर की मौत हो गई। इसके बाद परिवार की जिम्मेदारी बड़े भाई पर आ गई। जिन्होंने परिवार को पूरी जिम्मेदारी के साथ सम्भाला और आगे बढ़ाया।

सावरकर के जीवन का सबसे बड़ा धब्बा महत्मा गांधी की हत्या में संलिप्तता को लेकर लगा। पुलिस ने सावरकर को गिरफ्तार किया उनसे पूछताछ की, हालकि वो सबूतों के अभाव में छूट गए पर उनकी जांच को लेकर बैठा कपूर आयोग और उसके जांच की रिपोर्ट की सूई कभी भी सावरकर से नहीं हटी।

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राजनीति में हिदुत्व और हिन्दु राष्ट्रवाद को विस्थापित करने वाले विचारों को लेकर सावरकर को पुणे के फरग्यूसन कॉलेज से निष्काषित कर दिया गया। निष्कासन के 1 साल बाद उन्हें नासिक के कलेक्टर जैकसन की हत्या में सलिंप्तता के कारण लंदन में गिरफ्तार कर लिया गया। सावरकर पर आरोप था कि उन्होंने लंदन से एक कलेक्टर की हत्या करने के लिए एक पिस्तौल अपने भाई को भेजी थी।

सावरकर अंग्रेजो को चकमा देने की कोशिश में लगे रहे उन्हें जब लंदन से फ्रांस के मार्से बन्दरगाह पर लगाया जा रहा था तो वह पोर्ट होल से समुद्र में कूद गए। उसके बाद तैरकर शहर की ओर दौड़ना शुरू कर दिया। पुलिस वालों ने उनका पीछा किया और पकड़ लिया।

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सावरकर इसके बाद अंग्रेजो के कैद में चले गए, उनकी आजादी यहीं समाप्त हो जाती है। अगले ढाई दशक वह अग्रेजों के गुलाम रहे। 25-25 साल की दो सजाएं सुनाकर उन्हें भारत की किसी जेल में नहीं बल्कि भारत से दूर अंडमान यानी काला पानी भेज दिया गया। जहां सावरकर को एक छोटी सी कोठरी में रखा गया।

अंडमान की जेल में कैदियों को बड़ी यातनाएं दी जाती थी, उनसे कोल्हू के बैल माफिक काम लिया जाता था। नारियल को छीलकर उसमें से तेल निकालना होता था। उनसे सरकारी अफसरों की बग्घियों को खिंचवाया जाता था। जो नहीं खींच पाते थे उन्हें पीटा जाता था। खाना भी औसत ही दिया जाता था। जिससे वह जिन्दाभर रह सके।

सावरकर के अन्दर ये सब देखने के बाद शुरू में तो गुस्सा बढ़ा पर धीरे-धीरे वह समान्य हो गए और वहां से निकलने की तरकीबे सोचने लगे। 11 जुलाई 1911 को जेल पहुंचे सावरकर ने डेढ़ महीने बाद ही माफीनामा लिखा। अंग्रेजों ने उनके माफीनामें पर विचार करना उचित नहीं समझा। अगले 9 साल के भीतर सावरकर ने 6 बार माफीनाफा लिखा। माफीनामें उन्होंने लिखा

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‘अगर सरकार अपनी असीम भलमनसाहत और दयालुता में मुझे रिहा करती है तो मै यकीन दिलाता हूं कि मैं संविधानवादी विकास का सबसे कट्टर समर्थक रहूंगा और अंग्रेजी सरकार के प्रति वफादार रहूंगा।’

जानकार बताते हैं कि जिस कोठरी में सावरकर को रखा गया था उसके ठीक नीचे बैरक में कैदियों को फांसी दी जाती थी इसका भी उनपर असर हुआ। साथ ही जेल में बन्द कैदी बरिद्र घोष बताते थे हैं कि सावरकर हम कैदियों को जेलर के विरुद्ध आन्दोलन करने को भड़काते तो थे पर जब उनके कहा जाता था कि आप भी साथ आईए तो वह पीछे हो जाते थे।

सावरकर के माफीनामे का असर ये हुआ कि जेल का प्रशासन उनपर अन्य कैदियों की तरह बर्बरता के साथ पेश नहीं आता था। इसको इस बात से पुख्ता किया जा सकता है जेल में सभी कैदियों का वजन 15 दिन में लिया जाता था। सावरकर जब जेल गए तो वह 112 पाउंड के थे और जब उन्होंने अपना चौथा माफीनामा दिया तो वह 126 पाउंड के थे।

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1920 में बाल गंगाधर तिलक और वल्लभ भाई पटेल के कहने पर ब्रिटिश कानून न तोड़ने और विद्रोह न करने की शर्त पर उन्हें रिहाई दे दी गई। सावरकर को ये सख्त हिदायत थी कि बिना रत्नागिरी के कलेक्टर को बताए आप कहीं बाहर नहीं जा सकते। सावरकर इसके बाद भारत आए और उन्होंने हिन्दुत्व पर ग्रंथ लिखा।

कहा जाता है कि अंग्रेज उन्हें 60 रुपए महीना पेंशन दिया करते थे। अंग्रेज उनको अपनी कौन सी सेवा के लिए ये पेंशन देते थे फिलहाल इसपर कुछ कह पाना संभव नहीं है। इस तरह की पेंशन पाने वाले वह अकेले शख्स थे।

हिन्दू और हिन्दूस्तान के लिए काम करने वाले सावरकर को हिन्दू महासभा ने 1937 में अपना अध्यक्ष बनाया, 1938 में उन्होंने इसे राजनैतिक दल घोषित कर दिया। अगले सात सालों तक वह महासभा के अध्यक्ष बने रहे। और स्वतंत्रता अदोंलनों मे लगे रहे। गांधी और सावरकर में वैचारिक मतभेद शुरू से ही रहे। वह गांधी की आजादी की लड़ाई के तरीकों से एकदम सहमत नहीं थे।

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सावरकर की छवि को उस समय धक्का लगा जब उन्हें गांधी हत्याकांड में गिरफ्तार किया गया। उनके साथ 8 और लोगों को गिरफ्तार किया गया। जांच में ठोस सबूत न मिलने के कारण उन्हें बरी कर दिया गया पर इस धब्बे से वह अपने आप से कभी साफ नहीं कर पाए। यहां तक की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी उनसे पल्ला झाड़ लिया। 1966 तक वह जिन्दा रहे लेकिन समाजिक स्वीकार्यता कभी नहीं मिली।

भाजपा हमेशा सावरकर के साथ खड़ी रही। अटल बिहारी की सरकार ने सन 2000 में उन्हें भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ देने का प्रस्ताव भेजा पर तत्कालिक राष्ट्रपति केआर नरायणन ने सरकार के इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया। 2014 में प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आए पीएम मोदी शपथ लेने के दो दिन बाद सावरकर के आगे शीश नवाते हैं जिधर मोदी जी की पीठ थी उधर महात्मा गांधी की तस्वीर लगी थी।

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पहले तबलीगी अब प्रवासी मजदूर बना भाजपा का दुश्मन, आखिर योगी बिना दुश्मन क्यों नहीं चला सकते सरकार

समाज में दो तरह के लोग हैं, एक वो जो अपनी हर सफलता-असफलता के लिए खुद को जिम्मेदार मानते हैं. दूसरे वह जो अपनी सफलता के लिए तो खुद को लेकिन असफलता के लिए किसी दूसरे इंसान को दोषी बता देते हैं। देश की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी भी कुछ इसी तरह से है। अपनी असफल नीतियों के लिए पार्टी के तमाम नेता किसी भी हद तक चले जाते हैं। पिछले छह सालों के कार्यकाल में ये न जाने कितनी बार अपनी नाकामियों के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहरा चुके हैं। 

मौजूदा समय में दुनिया के तमाम देशों की तरह भारत की भी स्थिति कोरोना वायरस से बेहद खराब है, हर दिन रिकॉर्ड मात्रा में नए केस आ रहे हैं, सरकार पर चौतरफा दबाव पड़ा रहा. स्वास्थ्य व्यवस्था से लेकर अर्थव्यवस्था तक गर्त में चली गई है, उसे पटरी पर लाने के बजाय सरकार अभी भी जुमलेबाजी व आरोपों से काम चला रही है. देश में कोरोना संक्रमण बढ़ा तो सरकार ने इसके लिए तबलीगी जमात के लोगों को जिम्मेदार बता दिया.

प्रेस कॉन्फ्रेंस में बकायदा बताया जाने लगा कि कुल मरीजों में इतने मरीज तबलीगी जमात से ताल्लुक रखने वाले हैं. फैलते संक्रमण को पूरी तरह से मुसलमानों से जोड़ दिया गया. तमाम ढीले पड़े भाजपा नेताओं को मानों संजीवनी मिल गई हो, वह पूरी मुस्लिम कौम को गरियाने में जुट गए, नफरत का आलम ये रहा कि गली मुहल्ले में सामान बेचकर घर चलाने वाले मुसलमानों को बाहर किया जाने लगा, उनके साथ मारपीट की गई, ये तो भला हो सुप्रीम कोर्ट का जिसने सरकार को कोरोना संक्रमितों के बारे में जानकारी सार्वजनिक न करने का आदेश दिया.

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अब नया मामला यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ से जुड़ा हुआ है, पिछले दिनों योगी आदित्यनाथ ने कहा, मुंबई से आने वाला जो भी कामगार है उसमें 75 फीसदी लोग ऐसे हैं जिनमें कोरोना संक्रमण है. दिल्ली से आने वाले 50 फीसदी में संक्रमण है, वहीं अन्य राज्यों से आने वाले 25-30 फीसदी लोगों में कोरोना का संक्रमण है. उनके इस बयान के बाद अब दो सवाल सामने आकर खड़े हो गए हैं. 

पहला ये कि क्या तबलीगी जमात के बाद उनका निशाना प्रवासी मजदूरों की तरफ है? या उनका निशाना उस उपेक्षित वर्ग की तरफ है जो दो वक्त की रोटी का इंतजाम करने के लिए घर से हजार किलोमीटर दूर जाकर हाड़तोड़ मेहनत कर रहा है? दूसरा ये कि योगी सरकार के मंत्रियों ने बताया था कि लॉकडाउन के बाद दूसरे राज्यों से करीब 25 लाख लोग यूपी की सीमा में आ चुके हैं। अगर योगी की बात मानी जाए तब तो कोरोना संक्रमितों की संख्या लाखों में होनी चाहिए, क्या सरकार आंकड़ो के साथ खेल कर रही या फिर जांच के नाम पर बस खानापूर्ति?

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अब पहले सवाल पर बात करते हैं. शुरू में ही कहा भाजपा सरकार हमेशा से एक दुश्मन तैयार करके चलती है, इसबार उसका निशाना प्रवासी मजदूर हैं. भाजपाशाषित राज्य उत्तराखंड में भी सीएम त्रिवेंद्र रावत ने कोरोना के लिए प्रवासियों को जिम्मेदार बताया था, कहा-उसके पहले राज्य में मरीजों की संख्या न के बराबर थी. बिहार के सीएम नीतीश कुमार का मजदूरों के प्रति रुख पहले ही देखा जा चुका है जब उन्होंने कहा था कि जो मजदूर जहां है वहीं रहे, प्रदेश की सीमाओं में इंट्री नहीं मिलेगी.

यूपी की राजनीति को लंबे समय से समझ रहे अनुदीप जगलान बताते हैं कि सीएम योगी का मुसलमानों व दलितों के प्रति क्या रवैया है उससे हर कोई वाकिफ है, प्रवासी मजदूरों में बड़ी संख्या ऐसे ही वर्ग की है, जिसे अगर निशाने पर लिया भी जाए तो इनके रसूख को आंच नहीं आएगी, इसलिए योगी आदित्यनाथ ने कोरोना संक्रमण के फैलने के पीछे प्रवासी मजदूरों को जिम्मेदार बता दिया. अनुदीप आगे कहते हैं कि योगी का इतना कहना ही उनके समर्थकों व नेताओं के लिए अमृत है, अब वह तमाम कहानियां गढ़कर इन्हें बदनाम कर देंगे। 

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सीएम योगी के बयान को अगर एकबार मान भी लें तो सवाल उठता है कि क्या यूपी में 10 लाख से ज्यादा कोरोना के संक्रमित हैं? अगर योगी सरकार को ये बात पता है तो जांच में तेजी क्यों नहीं ला रही? अगर योगी के आंकड़ो में इतनी ही सच्चाई है तो फिर टेस्टिंग, संक्रमण के डेटा को पूरी पारदर्शिता के साथ जनता के सामने रखना चाहिए। लेकिन इसकी उम्मीद नहीं की जा सकती क्योंकि पूरी सरकार अपनी असफलता के लिए एक दुश्मन खोज रही थी जो उसे प्रवासी मजदूर के रूप में मिल चुका है.

गुजरात मॉडल: मैं इस देश के लोगों को बेचा गया सबसे बड़ा झूठ हूँ!

गुजरात मॉडल – ये वो प्रोडक्ट है, जिसपर PhD होनी चाहिए। गुजरात मॉडल का पैकेट हवा से भरा हुआ था। लेकिन बिका खूब। इतना कि पूरे देश को इस मॉडल के रंग में रंगे जाने की बात होने लगी। और इस मॉडल के पेंटर बाबू यानी कि नरेंद्र मोदी को देश की जिम्मेदारी सौंप दी गई।

गुजरात मॉडल की पोल-खोल


हालाँकि 2014 के बाद से ही गुजरात मॉडल की पोल खुलने लगी। खासतौर पर शुरुआती सालों में आम आदमी पार्टी गुजरात मॉडल के खिलाफ बड़ी ताकत से खड़ी रही। अरविंद केजरीवाल खुद गुजरात गए और वहाँ की सड़कों, सफाई व्यवस्था को लेकर गुजरात मॉडल की आलोचना की।

लोगों को बेचा गया सबसे बड़ा झूठ


अब गुजरात मॉडल खुद चीख-चीख कर बता रहा है कि मैं इस देश के लोगों को बेचा गया सबसे बड़ा झूठ हूँ। ज्यादा पीछे नहीं जाते हैं। शुरू करते हैं फरवरी से। कोरोना का वायरस दस्तक दे चुका था। और पीएम मोदी एक नए परसेप्शन को क्रिएट करने के लिए नमस्ते ट्रंप का आयोजन करवा रहे थे। अहमदाबाद क्रिकेट स्टेडियम में भव्य आयोजन होना था। और इस आयोजन से पहले गुजरात मॉडल को ढ़कने के लिए अहमदाबाद में सड़कों पर 4 फुट ऊँची दीवार खड़ी कर दी गई। इस दीवार ने झुग्गियों में रहने वाले गरीबों को ट्रंप की नज़र से तो बचा लिया लेकिन गुजरात मॉडल की हकीकत नहीं बचा पाई।

कोरोना में ध्वस्त हुआ गुजरात मॉडल


इसके बाद धीरे-धीरे कोरोना फैलता रहा। और अहमदाबाद कोरोना का बड़ा शिकार बना। कोरोना से सर्वाधिक प्रभावित राज्यों में से एक बना गुजरात लेकिन अधिक चिंता की बात है यहाँ का मृत्यु दर। देश के कुल कंफर्म्ड केसेज में गुजरात का हिस्सा है लगभग 11 प्रतिशत जबकि कोरोना के कारण हुई कुल मौतों में गुजरात का हिस्सा है लगभग 21.5 फीसदी। मुख्य कारण हो सकती हैं – स्वास्थ्य सुविधाएँ।

स्वास्थ्य सुविधाओं में भी गुजरात मॉडल कमज़ोर


अब अगर स्वास्थ्य सुविधाओं को जाँचे तो भी मोदी जी का गुजरात मॉडल नाकाम दिखता है। गुजरात में निजी और सरकारी मिलाकर कुल अस्पताल हैं – 1408, कुल अस्पताल बेड हैं – 64862, कुल ICU बेड हैं – 3243 और कुल वेंटीलेटर्स हैं – 1622. 2020 में गुजरात की अनुमानित जनसंख्या 6 करोड़ 82 लाख है। सरकारी अस्पतालों में गुजरात की हालत राष्ट्रीय औसत से भी खराब है।

फेक वेंटीलेटर्स


ख़ैर वेंटीलेटर्स की बात आई तो याद आया विजय रुपाणी जी के राजकोट वाले वेंटीलेटर्स की। रुपाणी साहब ने ज्योति CNC की इन मशीनों को खूब एंडोर्स किया। राज्य में कुल 900 मशीनें इंस्टॉल की गईं।  अकेले अहमदाबाद सिविल अस्पताल में 230. लेकिन इसके बाद भी अहमदाबाद सिविल अस्पताल ने और वेंटीलेटर्स मंगवाए क्योंकि रुपाणी साहब के एंडोर्स किए जा रहे वेंटीलेटर्स ठीक नहीं थे।

प्रवासी मज़दूरों ने भी किया पर्दाफ़ाश

सूरत में प्रवासी मज़दूरों का प्रदर्शन भी गुजरात मॉडल का ही एक चेहरा है। जिस मॉडल को दुनिया भर में प्रचारित किया गया, वह मॉडल महामारी के दौरान अपने मज़दूरों को अपना नहीं सका। मज़दूरों के मामले में अधिकतर राज्यों की हालत ऐशी है लेकिन गुजरात के हालात अधिक निराश करते हैं।

सांप्रदायिकता की कसौटी पर गुजरात मॉडल


इस गुजरात मॉडल में सुविधाओं का जितना अभाव है, सांप्रदायिक सोच की उतनी ही अधिकता। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अहमदाबाद सिविल अस्पताल में धार्मिक आधार पर हिंदू-मुसलमानों के अलग-अलग वार्ड बनाए गए। डॉक्टर के अनुसार मेजॉरिटी समुदाय के कुछ लोगों को माइनोरिटी समुदाय के लोगों के साथ रहने में दिक्कत थी जिसके बाद अस्थायी तौर पर ऐसा किया गया। इस बात में ताज्जुब होनी भी नहीं चाहिए। क्योंकि जिस राज्य के मुख्यमंत्री समुदाय विशेष को टारगेट करते हुए बयान देते हैं, वहाँ आम सोच ऐसी बनेगी ही।

मैन्युफैक्चर्ड परसेप्शन औऱ गुजरात मॉडल


परसेप्शन राजनीति का सबसे बड़ा हथियार होता है। परसेप्शन आपको एक झटके में CM से PM बना देती है। परसेप्शन स्वाभाविक भी होती है और मैन्यूफैक्चर भी की जा सकती है। स्वाभाविक परसेप्शन था महात्मा गाँधी का। जहाँ जाते थे वहाँ हिंसा रुक जाती थी। विरोधी मत वाले भी बात सुनते थे-मानते थे। मैन्यूफैक्चर्ड परसेप्शन चिप्स के पैकेट में भरे हवा की तरह होता है। झूठा वास्तविकता से कोसों दूर। मोदी जी का गुजरात मॉडल इसी मैन्यूफैक्चर्ड परसेप्शन का एक उदाहरण है।

source: https://www.molitics.in/article/687/the-biggest-lie-gujarat-model-exposed

Haryana Government jobs – No joining in 5 years | HSSC wants to cancel exams on 503 posts

Haryana government jobs has been a tough dream for youth. In 2015, HSSC announced exams for 503 posts in different advertisements. But No joining in 5 years was the outcome.

After this, HSSC writes letter to Chief Secretary Haryana demanding the withdrawal of exams on those 503 posts.

HSSC wants to cancel the exam on 503 posts.

HSSCPendingPosts #HaryanaGovernmentJobs

जी न्यूज के सुधीर चौधरी के 28 सहकर्मी मिले कोरोना संक्रमित, लोग प्रार्थना के बजाय ट्रोल क्यों कर रहे?

देश की बड़ी मीडिया कंपनी जी न्यूज इन दिनों चर्चा में है, चर्चा में रहने का कारण कोरोना संक्रमण है, जी न्यूज कोरोना की कवरेज को लेकर नहीं बल्कि इस महामारी से संक्रमित होने को लेकर चर्चा में है। 15 मई को जी न्यूज में काम करने वाले एक कर्मचारी में कोरोना की पुष्टि हुई जिसके बाद बाकी और लोगों की जांच हुई तो 28 लोग इस महामारी से ग्रसित मिले। 

कोरोना के तमाम मामलों के बीच जी मीडिया में मिले केस को भी एक सामान्य घटना की तरह लेना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ, सोशल मीडिया पर जी न्यूज का मजाक उड़ाया जाने लगा। ‘जानवरों को हुआ कोरोना’, ‘जी जमाती’ जैसे तमाम शब्द प्रयोग किए जाने लगे, ऐसा नहीं कि सबने ऐसा किया। तमाम ऐसे भी लोग हैं जिन्होने जी के संक्रमित कर्मचारियों के जल्द स्वास्थ्य होने की कामना की, एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने भी पत्रकारों को लेकर चिंता जाहिर करते हुए जल्द स्वस्थ होने की कामना की.

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कोरोना संकट के बीच भी जी न्यूज के ट्रोल होने के पीछे उसका ही कृत्य है, निजामुद्दीन में तबलीगी जमात के मरकज का मामला सामने आने के बाद जी के एडीटर सुधीर चौधरी ने लगातार शो किए, जमातियों की आड़ में सुधीर ने पूरी मुस्लिम कम्युनिटी पर सवाल खड़े कर दिए. नतीजा ये हुआ कि समाज में मुस्लिम दुकानदारों को शक की नजर से देखा जाने लगा, उनका समाजिक बहिष्कार शुरु हो गया और तो और कई जगह बुरी तरह से पिटाई की गई।

पत्रकारिता का मूल सरकार से सवाल पूछना होता है लेकिन जी के डीएनए में ये है ही नहीं, उसे सरकार की चटुकारिता करनी है, देश में कोरोना संकट के बीच जब सरकार से उसकी तैयारियों को लेकर सवाल पूछने थे तब सुधीर चौधरी की टीम ‘कोरोना की मौत मरेगा पाकिस्तान’ जैसे फालतू और वाहियात कार्यक्रम कर रही थी। विपक्ष ने पैदल जाते मजदूरों की आवाज उठाई तो जी न्यूज के ही एंकर राजनीति न करने की सलाह दे रहे थे.

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वर्तमान मामले पर दोबारा लौटे तो पाएंगे की सुधीर चौधरी ने आपराधिक लापरवाही की है, 3 मई को जब लॉकडाउन 3.0 के तहत गृह मंत्रालय ने 33 फीसदी कर्मचारियों के साथ दफ्तर खोलने की अनुमति दी तो सुधीर ने संस्थान से जुड़े सभी कर्मचारियों को दफ्तर में आकर काम करने का आदेश दिया। दुनिया को कोरोना से बचाने की समझाइस देने वाले सुधीर चौधरी की लापरवाही से ऑफिस के 28 लोग कोरोना संक्रमित हो गए हैं, अभी कई और लोगों की जांच होनी बाकी है.

 जी मीडिया दावा कर रहा है कि वह अपने सभी कर्मचारियों के साथ है लेकिन न्यूजलॉड्री वेबसाइट के अनुसार जिस व्यक्ति में कोरोना की पुष्टि सबसे पहले हुई उसने खुद अपने खर्च पर जांच करवाई थी, उसे काफी वक्त से खांसी जुकाम बुखार की शिकायत थी लेकिन लगातार ऑफिस बुलाया जाता रहा। संक्रमित लोगों में एक कर्मचारी अपनी मां के साथ रहता है उनकी जांच भी जरूरी है लेकिन जी न्यूज ने इससे पल्ला झाड़ते हुए कहा वह अपना खुद से देखें, हम मदद नहीं कर सकते हैं। 

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बाकी रही बात सोशल मीडिया पर ट्रोल की तो ये जी न्यूज के कृत्यों का नतीजा है, हालांकि इसे किसी भी तरह से जस्टिफाई नहीं किया जा सकता। हम संक्रमित कर्मचारियों के जल्द स्वस्थ होने की कामना करते हैं। बाकी पत्रकारों के लिए ये वक्त बेहद कठिन है। इस वक्त बहादुरी का मतलब सुरक्षा और सावधानी से है, इससे किसी भी प्रकार का समझौता हमें मंहगा पड़ सकता है। 
source: https://www.molitics.in/article/686/28-employees-found-coronavirus-positive-in-Zee-media-company