मीडिया क्यों फैला रही है नफ़रत? – पार्ट-1

Author :- Neeraj Jha

पूरा विश्व नाज़ुक वक्त से गुज़र रहा है। लेकिन भारतीय मीडिया का एक बड़ा तबका अभ भी सांप्रदायिक उन्माद फैलाने में लगा हुआ है। फ़र्ज़ी वीडियो और झूठी ख़बरें प्रकाशित कर एक  खास तरह का नैरेटिव सेट किया जाता है। इस नैरेटिव से समाज का ताना-बाना बुरी तरह से खराब हो रहा है। आखिर क्यों मीडिया का एक बड़ा तबका समाज के खिलाफ खलनायक की तरह एक्ट कर रहै है? – इस मुद्दे पर हमने बातचीत की सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्र पत्रकार प्रशांत कनौजिया से।

वीडियो देखें – https://youtu.be/bVKEV2379Y0

बातचीत के अंश –

प्रश्न – एक ऐसे समय में जब देश महामारी से लड़ रहा है, आखिर क्यों गोदी मीडिया सांप्रदायिक नफ़रत फैला रही है? 
उत्तर –
 जब चौकीदार सो जाता है तब वह सारी जिम्मेदारी कुत्तों को दे जाता है। मीडिया का एक बड़ा तबका कुत्तों की भूमिका में आ चुका है। जब चौकीदार सो रहा है, चोर लोग आकर देश को लूट रहे हैं, बेईमान लोग देश को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं तो मीडिया को काम दिया गया है कि लोगों को निरंतर गुमराह करके मूलभूत सुविधाओं पर सवाल पूछना शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल पूछना – यह सब नहीं होना चाहिए। मीडिया को सरकार से यह कॉन्ट्रैक्ट मिला हुआ है कि वह किसी भी तरह से आमजन को गुमराह करे। इसी गुमराही में जो सरकार स्थापित हुई है, देश में वह नफरत की बिसात पर स्थापित हुई है।

प्रश्न – मतलब पत्रकारिता संस्थान में जो लोग काम कर रहे हैं वह इंस्ट्रक्टेड हैं?
उत्तर – 
बिल्कुल-बिल्कुल इंस्ट्रक्टेड हैं। पहले अरुण जेटली जी हैंडल करते थे ये सब कुछ। अब कोई और हैंडल कर रहा है। यह मुझे अभी नहीं पता कि कौन अभी गोदी मीडिया को हैंडल कर रहा है?

प्रश्न – पत्रकारिता संस्थान में काम करने का आपका अपना अनुभव रहा है आप सोशल मीडिया पर भी काफी एक्टिव रहते हैं, जिसकी वजह से आपको जेल भी जाना पड़ा है? सरकार की तरफ से जिस तरह के दबाव की बात आप कर रहे हैं, उस दबाव के बीच पत्रकारों के जमीर और उनकी पेशेवर कमिटमेंट का क्या होता है?
उत्तर – 
देखें, क्या है ना की गणेश शंकर विद्यार्थी का एक जमाना था पर अब एक अलग जमाना हमें देखने को मिल रहा है। इमरजेंसी के दौरान जब पूरी तरीके से अधिकार आपके ले लिए गए थे, उस समय भी बहुत सारे पत्रकार थे जो लड़ने का काम कर रहे थे, लिखने का काम कर रहे थे, अखबार छापने का काम कर रहे थे। लेकिन आज तो अप्रत्यक्ष रूप से इमरजेंसी है। यह तो साफ-साफ नहीं कहा गया है कि अखबार नहीं छपेंगे। न ही प्रिंटिंग प्रेस की लाइट काट दी गई है। समस्या यह है की मीडिया का इतना व्यापारीकरण हो गया है कि हर पत्रकार को पैकेज में बांध रखा गया है। 25 लाख, 50 लाख, 80 लाख रुपयों का पैकेज। इसके कारण आपकी लाइफ स्टाइल उस दर्ज़े की हो जाती है कि आप साल का ₹80 लाख कमा रहे हैं। जाहिर सी बात है अगर आप ईमानदारी से पत्रकारिता करेंगे तो कोई आपको 60-70 हज़ार रुपये प्रति महीना से ज्यादा नहीं देगा। इस लाइफस्टाइल से मजबूर हैं पत्रकार। उनको एक आदत डाल दी गई है कि आपको यह करना है। 

आजकल पत्रकारिता के अंदर आपको पत्रकार नहीं चाहिए। आप एनएसडी के किसी पास आउट को लाकर भी एंकर बना सकते हैं। एंकर और पत्रकार में बहुत अंतर होता है। जैसे स्क्रिप्टिंग होती है, फिल्म बनती है, मुझे लगता है अब न्यूज़ चैनल में भी वैसे ही काम होता है। स्क्रिप्ट बनती है, BOD मीटिंग में तय होता है कि हमें रिलायंस से एडवर्टाइजमेंट मिल रहा है तो हम उनके खिलाफ नेगेटिव नहीं रहेंगे; अदानी पावर से एडवर्टाइजमेंट मिल रहा है तो हम उसके खिलाफ नहीं जाएंगे। कुल मिलाकर मीडिया मालिक केंद्रित हो गया है पहले वह एडिटर केंद्रित हुआ करती थी। पहले संपादक सारे निर्णय लेता था। अब मालिक निर्णय लेते हैं। इसीलिए यह परिणाम देखने को मिलते हैं। 

मालिक का अपना व्यवसायिक हित होता है। और उस इंटरेस्ट को प्रोटेक्ट करने के लिए वह सरकार के खिलाफ बहुत ज्यादा आलोचनात्मक नहीं हो सकता है। उसे सरकार की जरूरत पड़ती है। उसे जमीन सस्ते दाम पर चाहिए। टैक्स की चोरी से वह बचा रहे। ED या इनकम टैक्स उस पर हाथ ना डाले। हर बिजनेसमैन टैक्स की चोरी करता है यह जगजाहिर है। जाहिर सी बात है कि सरकार की गोद में बैठने से वह सुरक्षित महसूस करता है। विदेशों में एक ट्रेंड है बड़े बड़े बिजनेसमैन भी सरकार से सवाल करते हैं, उसकी आलोचना भी करते हैं लेकिन हमारे देश में जो भी बिजनेसमैन है वह जिसकी भी सत्ता हो उसकी गोद में बैठा रहता है। आजकल तमाम मीडिया संस्थान किसी ना किसी बिजनेस वेंचर का पार्ट है।

2008 तक मीडिया का बड़ा सम्मान था लेकिन उसके बाद 2012-13 से इसकी छवि में गिरावट आई है। आज आप अपने आप को पत्रकार कहिए तो समाज के अंदर लोग आपको दलाल समझते हैं। पहले सम्मान की नजर से देखते थे कि पत्रकार हैं।

प्रश्न – आज स्थिति हास्यास्पद हो चली है। अगर आप कहें कि अब पत्रकार हैं तो आपसे सवाल होता है कि आप कांग्रेसी पत्रकार हैं कि भाजपाई? वामपंथी पत्रकार हैं या दक्षिणपंथी? इस स्थिति को आप कैसे देखते हैं?
उत्तर –
 पत्रकार दो ही तरीके का होता है – या तो सत्ता का गुलाम हो सकता है या सत्ता से सवाल पूछने वाला हो सकता है। अगर किसी को किसी चीज से फायदा हो रहा है तो जाहिर है वह पावर की तरफ रहेगा। विपक्ष की तरफ क्यों रहेगा गाली खाने के लिए? यह बहुत पहले से चला आ रहा है आप बीजेपी से सवाल पूछे तो कहते हैं आप कांग्रेसी हैं कांग्रेसियों से सवाल पूछे तो कहते हैं भाजपाई हैं आम आदमी पार्टी से सवाल पूछे तो कहते हैं भाजपाई और कांग्रेसी दोनों हैं।

…..जारी है.

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source: https://www.molitics.in/article/684/why-godi-media-is-spreading-hatred

Gujarat की चोरी छिपाने के लिए Modi Speech | BJP Minister का चुनाव रद्द | Lockdown 4.0

12 मई, रात 8 बजे Modi Speech क्यों हुआ? जवाब – Gujarat की चोरी छिपाने के लिए Modi Speech. BJP Minister का चुनाव रद्द क्यों किया गया? Why High court cancelled election of BJP Minister, Bhupendra Singh Chudasma? 1. लॉकडाउन कब खत्म होगा? ( lockdown kab khatam hoga) 2. सैलरीज़ काटे जाने का खेल कब बंद होगा? (salary cut) (lockdown me salary milega ki nhi) 3. नौकरी रहेगी या जाएगी? (naukri ka kya hoga) 4. गरीब/मज़दूर कब तक रास्तों में मरते रहेंगे? (migrant workers ka pain) इन सवालों को दबाने के लिए Modi Address to the nation during lockdown का आयोजन हुआ।

गरीबों से पैसे वसूलने का गुजरात मॉडल, गैर-कानूनी तरीके से हो रही रेल टिकटों की होम डिलीवरी

Author :- Satyam Pandey

‘ग्राम प्रधान ने लाकर हम सबको टिकट दिया, हमें स्टेशन पर कोई टिकट नहीं मिला, प्रधान ने हमें टिकट दिए और सारे पैसे लिए’ रेलवे टिकट दिखाते हुए गुजरात के वडोदरा से उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले के महखरा गांव में लौटे एक श्रमिक मज़दूर ने बताया। प्रवासी श्रमिक के इस बयान ने सरकारी दावों और कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।

किराया वसूलने का नया तरीका- ब्लैक में हो रही टिकटों की होम डिलीवरी 


लॉक डाउन के तीसरे चरण में श्रमिक मज़दूरों को लाने का सिलसिला जारी है, लेकिन रेल टिकट के नाम पर छिड़ी बहस पर आए दिन नए नए खुलासे हो रहे हैं जो सरकारी दावों की पोल खोल रहे हैं। प्रवासी मज़दूरों के लिए चलाए जा रहे श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में इन लोगों से बढ़ा हुआ किराया वसूला जा रहा है। बढ़े हुए किराए का साक्ष्य कभी दीन दयाल उपाध्याय स्टेशन से मिलता है, तो कभी लखनऊ, बाराबंकी, गोरखपुर जैसे तमाम स्टेशनों से मिलता है। 
गुजरात के वडोदरा से यूपी के प्रयागराज आने वाले प्रवासी मजदूरों को बाराबंकी स्टेशन तक जाने वाली ट्रेन में बैठा दिया था, सभी लोगों से 560 रुपए किराया लिया गया है, टिकट के अनुसार दोनों स्टेशनों की दूरी 1154 किलोमीटर है।

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किराए के बारे में पूछने पर एक मजदूर ने बताया कि ‘ग्राम प्रधान ने लाकर हम सबको टिकट दिया, हमें स्टेशन पर कोई टिकट नहीं मिला, प्रधान ने ही टिकट के सारे पैसे लिए।’ नाम नहीं बताने के शर्त पर उस प्रवासी मज़दूर ने बताया कि ‘हमारे पास और कोई विकल्प नहीं बचा था, प्रधान ने हम लोगों को टिकट दे दिया हमारे लिए वही बहुत है, पैसे लिए तो क्या हुआ हम अपने घर तो पहुँच रहे हैं, वर्ना भूख के मारे हम वहीं पर दम तोड़ देते।’ ‘हमने भी सुना है कि सरकार ने रेल किराया माफ कर दिया है लेकिन हमारी मजबूरी ऐसी है कि बिना पैसे दिए अपने घर वापस नहीं लौट सकते थे, फिर चाहे उधार लेना पड़े या कुछ और इंतज़ाम करना पड़े, दलाल तो हर जगह ही होते हैं।’ भारी आवाज़ में उसने यह कहा।  


हाल में उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने दावा किया कि उन्होंने 7 लाख से अधिक प्रवासी मज़दूरों को अन्य राज्यों से लाया है, लेकिन किराए के अनुपात को लेकर कोई बयान नहीं दिया। 5 मई को योगी सरकार ने जनसुनवाई पोर्टल भी जारी किया, जिसपर अपनी जानकारी देकर प्रवासी मज़दूर अपने घर लौट सकते हैं, लेकिन सरकार का यह पोर्टल उतना कारगर नहीं दिख रहा जितना गुजरात में टिकटों के होम डिलीवरी का तरीका कारगर साबित  हो रहा है। 

क्या है किराए का सच? 


श्रमिक स्पेशल ट्रेनों से लौट रहे प्रवासी मजदूरों से लगातार किराया वसूला जा रहा है, किराए के साथ थर्मल स्क्रीनिंग, यात्रा के दौरान दिए जा रहे भोजन का चार्ज भी टिकट के साथ जोड़ा जा रहा है। गुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगाना समेत कई राज्यों से लौटे प्रवासी मजदूरों से बढ़ाकर किराया लिए जाने पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने 4 मई को ऐलान किया था कि प्रदेश कांग्रेस कमेटियां प्रवासी मज़दूरों को किराया देंगी, कांग्रेस अध्यक्ष के इस ऐलान के बाद पूरे देश में किराए को लेकर बहस छिड़ गई। 

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भाजपा के वरिष्ठ सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने भी सोनिया के सुर में सरकार पर हमला बोला, प्रवासी मजदूरों से वसूले जा रहे किराए के फैसले पर स्वामी ने फटकार लगाया था। 


इसके बाद रेल मंत्रालय की ओर से स्वास्थ्य मंत्रालय ने सफाई पेश की, स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने मीडिया को बताया, ‘केंद्र या रेलवे ने कभी भी किसी मजदूर से किराए की बात नहीं की है, श्रमिक स्पेशल ट्रेन किराए के हिस्से का 85 फीसदी रेलवे दे रही है बाकी बचा 15 प्रतिशत राज्य सरकार को देना होता है।’  
हालांकि अधिकारी के बयान को ठोस बनाने के लिए सरकार के किसी मंत्रालय या विभाग ने कोई सर्कुलर या नोटिफिकेशन नहीं जारी किया है। लेकिन पूर्व में रेल मंत्रालय द्वारा जारी किए गए 2 सर्कुलर ने तमाम प्रकार के विवादों को उत्पन्न किया है। 

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2 मई की एक सर्कुलर में स्पष्ट तौर पर लिखा था, ‘किसी स्टेशन पर टिकट नहीं बेचा जाएगा।’ इसी सर्कुलर में आगे लिखा था कि रेलवे उन्हीं यात्रियों को स्वीकार कर रही है जिन्हें राज्य सरकार सुविधा देकर ला रही है। लेकिन इस सर्कुलर में कहीं इस बात का ज़िक्र नहीं किया गया कि मजदूरों से किराया नहीं लिया जाएगा, उन्हें यात्रा के दौरान या यात्रा के पहले टिकट दिया जाएगा और उनसे अधिक रकम नहीं वसूला जाएगा। 
बहरहाल, रेलवे ने एक और सर्कुलर जारी किया था, जिसमें कई प्रकार की शर्तों के बारे में लिखा है जो विवादों और बहसों को नया रास्ता दे रहे हैं। सर्कुलर के अनुसार- 


‘जिस राज्य से श्रमिक ट्रेन स्पेशल चलेंगी वो राज्य रेलवे को यात्रियों की संख्या बताएगी। यह संख्या 1200 के आस- पास होनी चाहिए या फिर श्रमिक स्पेेशल ट्रेन की क्षमता के 90 फीसदी तक होनी चाहिए।’ 


‘जहां से ट्रेन का संचालन शुरू होगा, वहां पर निर्धारित मजदूरों की संख्या के हिसाब से रेलवे टिकट प्रिंट करवाएगी और राज्य सरकार को सौंपेगी।’

 
‘गंतव्य तक पहुंचने के बाद वहां की राज्य सरकार, श्रमिकों को टिकट देगी, उनसे किराया वसूलेगी, फिर वही वसूला गया किराया रेलवे के अधिकारियों को सौंप देगी।’ 


एक अन्य सर्कुलर में इस बात का भी उल्लेख किया गया है कि मेल एक्सप्रेस ट्रेन के साथ अतिरिक्त 30 रुपये सुपरफास्ट का चार्ज लगाया जाएगा साथ में और 20 रुपये देने होंगे। 


स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारी ने बताया कि किराए के हिस्से का 85 फीसदी रेलवे दे रही है, हालांकि इस बात को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक सर्कुलर नहीं जारी किया गया है लेकिन समय समय पर विपक्ष पर हमला करने के लिए भाजपा के नेता- मंत्री, अधिकारी के इस बयान को अपना हथियार बना रहे हैं। 

सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने जानकारी देने से किया इंकार 


स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारी और ट्विटर पर भाजपा नेताओं के दावों पर स्पष्टीकरण के लिए एक्टिविस्ट जयदीप छोकर ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी, इस याचिका में उन्होंने प्रवासी मज़दूरों को घर पहुंचाने  के लिए तत्काल व्यवस्था बनाने, उनसे किराया नहीं लिए जाने एवं लिए गए रेल किराए और अधिकारी के बयान पर स्पष्ट जानकारी की मांग की थी।  


द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की बेंच ने इस याचिका पर सुनवाई की। अधिकारी के बयान पर जवाब मांगे जाने पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने किसी भी प्रकार की जानकारी देने से मना कर दिया। मेहता ने कहा कि रेलवे और राज्य सरकार के अनुपातों को साझा करने के निर्देश उन्हें नहीं मिले हैं। मेहता ने पीठ को बताया कि पूरे देश में ट्रेनों और बसों को उनके लॉजिस्टिक की क्षमता के अनुसार सेवा में लगाया गया है। 

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याचिकाकर्ता की तरफ से अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने मजदूरों की दयनीय स्थिति के बारे में पीठ को बताया, जज द्वारा रिपोर्ट का हवाला देने पर भूषण ने कहा कि इस संकट के समय में मजदूर 15 प्रतिशत किराया भी देने की हालात में नहीं हैं। 


पीठ ने लिखित आदेश जारी कर इस याचिका का निपटारा कर दिया, अपने आदेश में कोर्ट ने कहा कि याचिका में किए गए मांग को पहले से ही पूरा किया जा रहा है, अतः इस मामले पर आगे कोई सुनवाई नहीं होगी और इस याचिका को यहीं पर बंद किया जाता है। 


हालांकि यह बहस का कारण बन गया कि उच्चतम न्यायालय में भी सरकार ने किराए के अनुपात की जानकारी देने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया है। इससे उनकी मंशा का पता चलता है कि श्रामिकों से अतिरिक्त किराया लेने की प्रक्रिया को जारी रखा जाएगा। 


किराया लौटने के लिए योगी सरकार नहीं कर रही कांग्रेस का समर्थन


यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू ने बताया कि राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी के निर्देशानुसार यूपी कांग्रेस प्रवासी मजदूरों के किराए को वापस करना चाहती है, इस बाबत उन्होंने राज्य की योगी सरकार से प्रदेश में लौटे प्रवासी मज़दूरों की सूची मांगी है लेकिन उन्हें राज्य सरकार द्वारा कोई सूचना नहीं दी जा रही है। 


लल्लू ने ट्वीट किया, ‘कांग्रेस अध्यक्षा ने सभी PCC को प्रवासियों के ट्रेन किराया का ध्यान रखने के लिए निर्देशित किया था। हम प्रवासियों की सूची के लिए उप्र सरकार से पूछ रहे हैं और एक लिखित अनुरोध भी भेजा गया था। दो दिन बीत चुके हैं लेकिन सरकार द्वारा कोई विवरण नहीं दिया गया है।’ 

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इस संकट काल में प्रवासी मज़दूरों से बढ़ाकर किराया वसूलने की प्रक्रिया जारी हैं, उत्तर प्रदेश ही नहीं बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों में लौटे श्रमिकों से किराया वसूला जा रहा है। रेलवे के सर्कुलर का बखूबी पालन हो रहा, रेलवे द्वारा निर्देशित है कि स्टेशन पर टिकटों की बिक्री नहीं होगी। इसके उलट सरकार ने वसूली का नया तरीका अपनाया है, नियमों का उल्लंघन कर टिकट सीधे मजदूरों के घर पर पहुंचाया जा रहा है। मजदूरों से यह नहीं पूछा जा रहा कि कई महीनों से बेरोजगार बैठे इन लोगों के पास टिकट का पैसा कहां से आएगा। 


प्रश्न यह भी उठ रहा है कि रेलवे अधिकारियों और प्रधान की सांठगांठ से चल रही इस गैर कानूनी प्रक्रिया को किसने अनुमति दी है?
रेलवे जैसे सरकारी संस्थानों को क्या अब प्रधान या स्थानीय सरकार की मदद से ही चलाया जाएगा? 
सरकार अपनी ही पीठ थपथपाने में व्यस्त दिखाई दे रही है, रेल मंत्री पीयूष गोयल ने पीएम केयर्स कोष में 151 करोड़ फंड जमा कराने की घोषणा की थी, इस बात को लेकर भी मंत्रालय ने कोई जवाब नहीं दिया था कि जब ट्रेन बंद है, विभाग घाटे में चल रही है तो कोष में राशि जमा करना आवश्यक है?  

मजदूरों के प्रति क्यों संवेदनहीन है सरकार 


मज़दूरों के प्रति सरकार की संवेदनहीनता जग जाहिर होती जा रही है, लॉक डाउन की मार सबसे अधिक श्रामिकों पर पड़ी है, भूख प्यास से लाचार मजदूर अपनी जान बचाने के लिए सैकड़ों किलोमीटर पैदल ही नापने को तैयार है, उन्हें क्या पता कि यह यात्रा उनके जीवन की आखरी यात्रा भी हो सकती है, लेकिन उनके पास कोई विकल्प भी तो नहीं है। सरकार दावे और ऐलान कर सराहना बटोर लेती है, लेकिन जब इनके क्रियान्वयन की बारी आती है तो योजनाएं कहीं रास्ते में ही दम तोड़ देती हैं।  


तकनीकी वेबसाइट www.thejeshgn.com के अनुसार 5 मई तक 370 ऐसे लोगों की मौत हुई जिन्हें कोरोना नहीं हुआ था, लेकिन पैदल चलने के कारण उनकी सांस ने उनका साथ छोड़ दिया और नतीजन उनकी मौत हुई है। इसी वेबसाइट के अनुसार 1 मई तक वित्तीय संकट और भूखमरी के कारण 34 लोगों की मौत हुई है।

समय पर स्वास्थ्य सुविधा नहीं मिलने के कारण 38 लोगों की जान जा चुकी है। लॉक डाउन के दौरान आत्महत्या(संक्रमण  आदि के डर की वजह से) करने वालों की संख्या 73 है।

पुलिस अत्याचार की वजह से भी 11 लोगों ने अपनी जान गंवा दी है। यह आंकड़े सरकार के दावों और तैयारियों को चुनौती दे रही हैं, सरकार के पास इस बात का भी जवाब नहीं है कि लॉक डाउन कब खत्म होगा। सरकार अब कोरोना के साथ जीने वाली प्लान बना रही है, जल्द ही उसको भी अमलीजामा पहनाए जाने की आशंका है।
source: https://www.molitics.in/article/683/railway-gujrat-government-black-ticket-selling-migrant-labors

लॉकडाउन : प्रवासी मजदूरों को वापस बुलाने को लेकर इतना बेबस क्यों हैं सुशासन बाबू?

सोशल मीडिया पर सूरत का एक वीडियो देखा, जिसमें बिहार के कुछ मजदूर एक जगह इकट्ठा हैं उसमें एक मजदूर घर वापसी को लेकर बिहार सरकार से अपील करता है, पहले वह अपने खाने, रहने और नौकरी के जाने की बात करता है फिर वह सीएम नीतीश कुमार को गाली देता है, गाली देते वक्त पर यही कहता है कि जब सारे राज्यों की सरकारें अपने लोगों को वापस बुला रही है तो नीतीश कुमार क्यों नहीं बुला रहे। इसके बाद वह लगातार गालियां देता है, बाद में नाम और मोबाइल नंबर भी बताता है। 

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महज एक वीडियो ही नहीं ऐसे तमाम वीडियो सोशल मीडिया पर भरे पड़े हैं जिसमें बिहार के मजदूर सरकार से घर पहुंचाने की बात कर रहे हैं लेकिन सरकार इन्हें जहां है वहीं रहने को कहते हुए एक हजार रुपए की नाकाफी मदद की बात कहती है। चुनावी वर्ष होने के बावजूद भी सरकार आखिर अपने लोगों के लिए आगे आकर क्यों मदद नहीं कर पा रही है, इसे लेकर अनेक तर्क दिए जा रहे हैं। 

स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और महामारी का डर 
बिहार की पृष्ठभूमि से आने वाले नीरज झा कहते हैं कि बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था पहले से ही काफी लचर रही है, पिछले 10 दिन में प्रदेश में कोरोना संक्रमितों की संख्या में भी 3 गुना इजाफा हुआ है ऐसे में सरकार के भीतर ये डर बसा हुआ है कि अगर बाहर से मजदूर बुलाए जाते हैं और उसमें कोई एक भी संक्रमित शामिल हुआ तो पूरी भीड़ को संक्रमित कर देगा, रही बात दूसरे राज्यों से तुलना की तो वहां संख्या हजारों में है जबकि बिहार में वापस लौटने वालों की संख्या लाखों में है, जिन्हें लाने, जांच करने व क्वारनटाइन करने में खासी फजीहत हो सकती है इसलिए सरकार कदम आगे बढ़ाने से हट रही है.

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बसों की कमी
बिहार की राजनीति को काफी नजदीक से देख रहे अनुदीप जगलान कहते हैं कि बिहार में सरकारी बसों की संख्या महज 600 है, प्राइवेट बसों की संख्या करीब 15 हजार है। इन्हें अगर वापस लाने में लगाया जाएगा तो पहली दिक्कत बजट को लेकर आती है दूसरी दिक्कत सोशल डिस्टेंसिंग के पालन की, क्योंकि किसी भी बस में 20-25 लोग से ज्यादा नही बैठाए जा सकते ऐसे में इन बसों को लाखों मजदूरों को लाने में न जाने कितने चक्कर लगाने होंगे। 

अनुदीप कहते हैं कि बसों से लाने का एक बड़ा नुकसान ये है कि कब कौन कहां उतर लिया उसका डेटा सरकार के पास नहीं रहेगा, ऐसे में फिर उन्हें लाने का मतलब महामारी को बढ़ावा देना है। नीतीश कुमार द्वारा केंद्र सरकार से स्पेशल ट्रेन चलाए जाने की मांग को वह सही बताते हैं। क्योंकि इससे सरकार के पास आंकड़े रहेंगे कि कितने लोग आ रहे हैं और इन्हें कहां क्वारंटाइन करना है। 

चुनावी साल में भी बिहार में महामारी को लेकर जमकर राजनीति हो रही है, राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव कहते हैं कि नीतीश सरकार अगर असहज है तो बताए हम 2000 बसें देते हैं। पप्पू यादव ने भी बिहार सरकार को बसें देने का ऑफर किया है। इस बसों के ऑफर के बीच सियासत छिपी है, सियासत और महामारी के बीच नीतीश सरकार बुरी तरह फंस चुकी है।

source: https://www.molitics.in/article/681/why-is-cm-nitish-kumar-so-helpless-about-migrant-laborers

कोरोना महामारी के दौरान भी जारी है एक्टिवस्ट्स को दबाने की मुहिम!

देश कोरोना से जंग लड़ रहा है और दिल्ली पुलिस दलविशेष के राजनैतिक पूर्वाग्रहों के कारण दुश्मन माने जा चुके लोगों के खिलाफ जंग को एक नए आयाम तक पहुँचा रही है। मीरान हैदर, सफूरा ज़रगार, गौहर गिलानी, मसरत जहाँ, उमर ख़ालिद, ख़ालिद सैफ़ी, साबु अंसारी आदि – ये वो नाम हैं जिन्हें एंटी-टेरर लॉ के के तहत या तो गिरफ्तार किया गया है या नामज़द।

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गौहर गिलानी और मसरत जहाँ कश्मीरी जर्नलिस्ट्स हैं। उन पर UAPA का कारण उनके सोशल मीडिया पोस्ट्स हैं। बाकियों पर दिल्ली में दंगा भड़काने का आरोप है। इसके अलावा भी कई आरोप लगे हैं। एक बात समझने लायक है दिल्ली दंगों के आरोप में UAPA झेल रहे ये एक्टिविस्ट्स एंटी-सीएए आंदोलनों में मुख्य रूप से मुखर रहे। 14 दिसंबर से शुरू हुआ आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्वक रहा। देश में कई सारे रेप्लिका तैयार हुए। पूरा देश इन आंदोलनों के रंग में रंग गया।

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कैसे हुईथीहिंसाकीशुरुआत?


हिंसा करने वालों को कपड़ों से पहचाना जा सकता है। 15 दिसंबर को प्रधानमंत्री झारखंड के चुनावी सभा में ऐसा बोलते हैं और उसी दिन शाम को जामिया मिलिया इस्लामिया यूनीवर्सिटी में घुसकर पुलिस स्टूडेंट्स के साथ हिंसा करती है। इसके बाद CAA के खिलाफ चल रहे आंदोलन को मुस्लिमों का आंदोलन के रूप में पेट करने की कोशिश होती है। गोदी मीडिया से लेकर बीजेपी के कई नेता इस काम में लग जाते हैं। मुसलमानों को एक दुश्मन के रूप में प्रोजेक्ट किया जाने लगा। और ऐसा लगता है कि दिल्ली पुलिस आज भी उसी प्रोजेक्शन पर काम कर रही है।

हिंसा किसने की? 


27 जनवरी – बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर की एक सभा में उनके सामने देश के गद्दारों को गोली मारो सालों को का नारा लगा। इस भाषण के बाद 30 जनवरी को एक रामभक्त गोपाल ने जामिया में फायरिंग की। 1 फरवरी को हिंदू राष्ट्र ज़िंदाबाद कहते हुए एक लड़के ने शाहीन बाग में फायरिंग की।

क्या उमर खालिद या अन्य आंदोलनकारियों ने भी हिंसक बातें कहीं?


आंदोलनकारियों की तरफ से तब भी कोई हिंसा नहीं हुई। उमर ख़ालिद समेत तमाम लोग जो मुखर रहे, उन्होंने अहिंसा और गाँधी के सिद्धांतों का जिक्र किया बार-बार। अमरावती में दिए गए जिस भाषण पर विवाद गहराया है, उसमें उमर कहते हैं-  कि अगर वो नफरत फैलाएंगे तो हम उसका जवाब प्यार से देंगे। अगर वो डंडा चलाएंगे तो हम तिरंगा उठाकर लहराएंगे। अगर वो गोली चलाएंगे तो हम संविधान को हाथ में लेकर अपने आप को बुलंद करेंगे।

कपिल मिश्रा ने क्या किया?


फिर आती है 23 फरवरी। कपिल मिश्रा पुलिस के सामने धमकी देते हैं कि “ट्रंप के जाने तक आप जाफराबाद और चांदबाग खाली करवा दें। उसके बाद हम आपकी भी नहीं सुनेंगे। हम लौट कर आएंगे।” ठीक उसी दिन से हिंसा शुरू हो जाती है। शुरुआत जाफराबाद से ही होती है, जिसका जिक्र बीजेपी नेता कपिल मिश्रा अपनी धमकी में करते हैं।

तीन दिनों तक दिल्ली भयानक हिंसा से जूझती रही। दिल्ली हिंसाओं में 53 लोगों की मौत हुई। 36 मुसलमान मारे गए। सैंकड़ों विस्थापित हुए। पीड़ितों के मुताबिक पुलिस पूरी हिंसा के दौरान या तो मूक रही या फिर हिंसा में सहभागी।

अब क्या हो रहा है? 


दिल्ली हिंसा में स्पष्ट तौर पर जिन लोगों के बयानों की भूमिका रही, उनपर कोई कार्रवाई नहीं हो रही। कार्रवाई उनपर हो रही है जिन्होंने सांप्रदायिक नागरिकता संशोधन कानून का विरोध किया। कार्रवाई उनपर हो रही है जो अपने हर नारे में नफ़रत का जवाब मोहब्बत से देने की बात करते रहे। कार्रवाई उन स्टूडेंट्स पर हो रही है जो जामिया में हुई हिंसा का विरोध करते रहे। 

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सवाल ये है कि क्या ये सब RSS के तय एजेण्‍डे के तहत हो रहा है जिसके अनुसार वो 2025 तक देश को हिंदू-राष्ट्र बना देना चाहती है। या फिर सब इत्तेफ़ाक है?  सवाल ये भी उठता है कि क्या संविधान में उल्लिखित अधिकारों की मांग करना और देश की आत्मा को बचाए रखने की कोशिश करना भी देशद्रोह हो गया है? 
source: https://www.molitics.in/article/682/delhi-police-suppressing-the-dissent-through-UAPA

THREAT OF FUTURE MARGINALISATION OF MUSLIMS IN INDIA

Several instances of religious discrimination and further marginalization of the Muslims have come to notice in this coronavirus pandemic. Vegetable vendors are being asked to show their religious identity, demanding their Aadhaar cards, those who are found to be Muslims are not allowed to do business in Hindu areas. Strangely, Muslim women are being refused groceries because of their religion. Not only in private domains, but this discrimination is happening in government domains too.

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A pregnant Muslim woman was refused to be admitted to the government hospital, which leads to the delivery of a baby in the ambulance itself which further lead to the baby’s death. Another govt hospital has been accused of separating the wards based on religion for treating COVID 19 patients. In some places, workers are being thrashed because of their religion.

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Inhumanity among people has grown to this level that people are being denied food based on their faith. These instances may seem disparate and isolated ones limited to some states, but the danger they pose to India’s growth and development prospects is huge, nevertheless. But, RELIGIOUS DISCRIMINATION will also endanger economic prosperity.

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According to a multi-disciplinary global study spanning 109 countries over 100 years, religious discrimination is bad for the economic health of a country. Religious discrimination has the potential to de-rail far more than just the social harmony and democratic order of a country.source: https://www.molitics.in/article/680/threat-of-future-marginalisation-of-muslims-in-indiaCartoon

कोरोना महामारी और दो हिस्सों में बंटा समाज

हम सब महामारी के दौर से गुजर रहे है। लेकिन हमारे सामने इसके अलावा भी कई चुनौतियां और सवाल हैं। मसलन –

महामारी के बाद क्या होगा?
जो लोग बच जायेंगे उनका भविष्य कैसा होगा?
उनकी स्थिति कैसे होगी?
 

इस महामारी ने अर्थव्यवस्था को चौपट करने के साथ ही दो हिस्सों में बँटे समाज को स्पष्ट रेखांकित किया है.
 

एक तरफ वो लोग है जिनके पास अपार संपत्ति है तो दूसरी तरफ वो हैं, जो एक-एक दाने को मोहताज है.
एक तरफ पूँजीपतिओं की बड़ी डील है तो दूसरी तरफ पलायन को मजबूर मजदूरों की व्यथा।


इस महामारी के बीच भी पूँजीपतियों की सत्ता वैसी की वैसी कायम है. इस महामारी से लड़ने के क्या उपाय है हमारे पास?
अर्थव्यस्था लगभग चौपट होने की कगार पर है।  घनी आबादी वाले देश भारत के लिए भुखमरी पहले से एक बडी समस्या रही है. महामारी ने इस समस्या को दोगुना कर दिया हैं। जितने भी मजदूर है उनका काम ठप्प हो जाने के बाद उनके पास दो वक़्त की रोटी नहीं है। उन्हें खाना खिलाने के लिए तरह तरह की सरकारी योजनाओ का ऐलान हो रहा है लेकिन क्या वाकई ये सब हो रहा है. इसका जवाब तो इस लॉकडाउन के अंत में पता चलेगा। लेकिन क्या देश के नागरिक अपनी सरकार से जारी सवाल पूछेंगे?
 

इस महामारी में कितना पैसा कहा लगाया जा रहा है और क्या जरुरतमंद लोगों तक मदद पहुंच रही है?
 

द हिन्दू का एक सर्वे बताता है कि सरकारी योजनाएँ कितना असरदार रहीं हैं. द हिन्दू ने अप्रैल 8 से अप्रैल 13  के बीच 11,159 प्रवासिओं का सर्वे किया जिसमे पता चला कि 90 प्रतिशत लोगों तक सरकारी राशन नहीं पहुंच रहा है. इसके अलावा 27 मार्च और 13 अप्रैल के बीच  मजदूरों का सर्वे किया गया था उनके पास केवल 200 रूपए की धनराशि ही बची थी. इस सबसे मालूम ये भी चलता है कि आधी जनता के पास इस लॉकडाउन  के बाद रहने को छत, खाने को भोजन और पहनने को क्या कपडा बचेगा? ये सब बुनियादी जरूरतें भी क्या बचेंगी?
 

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जब देश का एक हिस्सा छत पर खड़े होकर थाली और चम्मच बजाता है तो दूसरी और प्रवासी मजदूर दो वक़्त की रोटी के लिए सरकार की तरफ देखने की ओर मजबूर है. विश्व बैंक ने भी कहा है की ये लॉकडाउन लगभग 4 करोड़ प्रवासी मजदूरों की जिंदगियों को प्रभावित करेगा. नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी का भी मानना है कि केंद्र सरकार ने गरीब मजदूरों के लिए उतना नहीं किया जितना उसे करना चाहिए था. लॉकडाउन की घोषणा करने से पहले उन्हें अथि गरीब वर्ग और प्रवासी मज़दूरों के खाने व रहने की व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए थी।

ग्लोबल हंगर इंडेक्स के मुताबिक भारत 117 देशों की सूचि मे 102 नंबर पर हैं. इस महामारी और लॉकडाउन ने भारत में भुखमरी के खतरे को और बढ़ा दिया है. दिहाड़ी मजदूर, कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स और प्रवासी मजदूरों पर एक बड़ा असर डाला है. इनके पास न तो घर जाने के रास्ते बचे न ही जहाँ हैं वहाँ रहने की सुविधा रही। भारत डिजिटल हो गया है लेकिन भूख के लिए अभी भी कोई टेक्नोलॉजी का आविष्कार नहीं हुआ है।  

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जाने- माने लेखक डॉ युवाल नोआ हरारी बताते हैं कि कैसे इस महामारी से लड़ने में हमे एकजुटता दिखानी चाहिए थी लेकिन हम पूरी तरह से असफल साबित हुए है. हमने इस वायरस को भी धर्म, सम्प्रदाय और जाति से जोड़ दिया। उनका कहना ये भी है की इंसानियत हर वायरस का इलाज ढूंढने में सक्षम है लेकिन अपने अंदर के वायरस का इलाज ढूंढने में असफल रही है। देश एक दूसरे पर प्रतिबन्ध लगा रहे हैं, लोगों पर जातीय व नस्लीय टिप्पणियाँ की जा रही हैं और ये सब डरा देने वाला है. युवाल नोआ हरारी का ये भी कहना है की हमे इस महामारी को एक साथ मिलकर ही लड़ना होगा लेकिन आगे आने वाले खतरों के लिए भी चौकन्ना रहना होगा.

source: https://www.molitics.in/article/679/Corona-Virus-and-divide-in-society

A quick tour of the Coronavirus Aftermath

Well look here. “They” have not “imprisoned us forever”, like some feared.
Now they want us soon to go back to work so we can start rebuilding the bruised economies.
 

I suspect 5G will be around for a long time and if that was responsible for all this, then we will get no respite. We will continue dying from it until we leave our place to other animals that are not affected by it. Als, the virus has devoured populations which probably even haven’t heard about the 5G yet, but are struggling to stay alive.

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Bill Gates apparently made a bid mistake in predicting a pandemic beforehand, which led to theories of him administering this epidemic. Bill Gates has not come up with a vaccine yet and chances are others will beat him to it; so if he was behind the Covid-19 virus, he was bad at math not to have had it ready and waiting before he triggered this off.

The “globalists” have not achieved “one-world government” as far as I can tell. Countries will continue going to war with each other even after the pandemic is over. Peace as we are experiencing today could possibly be the silence before a storm. Besides, “the one world government is inversely proportional to religion”, which runs more rapidly in veins than even blood does.


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The “Internet experts” will have had their 15 minutes of fame and some will attempt to extend this for a little while longer, by trying to convince us they were right all along. This is a trend we all have encountered in the course of time.

Thanks to them, we’ve come to learn the term “herd immunity” (some of us even understood the implications) and get acquainted with the names of some medicines we’ll probably never need to use again. Not sure to what extent the model of “Herd Community” is feasible in the current situation, also because of the apathy most of the populations are infected with. Personally I’m grateful to hear that Vitamin C can cure this virus among others and coming from a citrus producing land, I’ll be sure to consume even more oranges and tangerines from now on will probably also recommend people to do so.

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The “seasonal flu” will continue to claim lives every year but I doubt that will force governments to build, in record time, emergency hospitals to deal with it, in the way we saw happening this year.

If and when we get a final, acceptable (global) tally of the dead, it may show that it was not as bad as was originally expected, which in itself would be a good thing. No self respecting person would wish for the worst case scenario. Remember: hindsight is not a gift and it’s always more prudent to err on the side of caution.


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Humanity has had to face many viruses in its history, the worst of which was the plague which, thankfully, never made a come back. Hopefully this too will leave us never to reappear. Time is our test for now and we have to unite to fight against a common enemy.
 

Those of us who have lost loved ones to this, will grieve for them, irrespective of whether they had “underlying health issues” that had not killed them before and were unlikely to kill them this year had it not been for this virus. Medical attention, especially of the immediate nature, should be provided at any cost to anybody who is ill irrespective of what is he suffering from.


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Soon it will be the time to divert our energy and “imagination” to arguing on whether this was a naturally occurring virus, or whether it was a biological weapon unleashed on us by China, the US or any other third country. One thing I am sure of, is that new “experts” will emerge with links to support the position of each theory. And life goes on….thankfully!
source: https://www.molitics.in/article/678/what-happens-after-the-pandemic

Crude Oil price drops to a record low below $0 : Explained by molitics

The US crude West Texas Intermediate (WTI) slumped below $0 per barrel for the first time in history while its peer Brent comparatively remained stable, dropping 9 per cent to $25.57 a barrel. Here is an explainer of what WTI is, and how and why it fell to an unprecedented level on Monday.

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What are Grades of Oil

Three main grades or benchmarks for oil are- WTI, Brent and Dubai/Oman. Almost all of the crude oil prices are pegged to the three grades.

Oil Grades Trading

WtTI is considerably light by the virtue of its low density and low sulphur content. However, Brent is lighter than WTI. Trades related to WTI take place in The New York Mercentile Exchange, like wise Brent contracts on the ICE Future Europe and Dubai grade on the Dubai Mercentile Exchange.

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Oil Futures and Their Functioning

Oil futures played a pivotal role in the fall of WTI. These Futures are basically future contracts and also they are highlt volatile. Under such contracts between the sellers and buyers, a specific date of delivery of a specific amount of oil is decided between the two parties. These oil futures are traded on advance basis in light of the fact that the extraction of oil and its delivery followed by that are time consuming. Most of the factories require consistent supply of oil to run smoothly, and the future contracts ensure this requirement.

WTI price falls below $0. Why?

The major three reasons for which the WTI price plummeted to a record low are; A substantial decrease in demand, lack of storage facility and finally the expiration of the future contracts. Demand declined in light of the impact of coronavirus on the global economy, while refineries rejected WTI crude oil supply because the storage has reached to the brim. Under futures contract, WTI needs to be physically delivered while Brent is deliverable offshore. Given logistics and storage constraints in Cushing, Oklahoma (where WTI is stored) for physical crude amidst low demand, traders started selling Tuesday’s futures to avoid taking physical delivery. This pushed WTI price into the negative territory on Monday.

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Oil storage capacity problem

Due to the massive oversupply on Monday, traders rushed to find storage on land and at sea in what is believed to be the biggest oil glut in history. Fuel storage rates doubled this month in some onshore European and US hubs as traders rushed to secure tanks in the hope of selling their products at a higher price when the coronavirus outbreak eases and demand recovers.

Floating capacity explained

Oil can be stored in very large crude carriers (VLCCs), commonly known as supertankers. On Monday, oil held in floating storages on tankers reached at least 160 million barrels, including 60 supertankers, which can each hold 2 million barrels. This can be compared with 25 to 40 VLCCs already chartered with storage options at the start of April and fewer than 10 VLCCs in February. The last time floating storage reached levels close to this was in 2009, when traders stored over 100 million barrels at sea before offloading stocks.

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Will the fall in WTI price benefit UAE

Due to the contagion effect from the fall in WTI and Brent prices, it is highly likely that the benchmarks on which UAE oil prices are fixed each month will go lower. Therefore, we could see lower oil prices for UAE residents in May 2020. UAE retail oil prices are based on S&P Global Platts, which is a benchmark for refined petroleum products. UAE Retail Pricing Committee for Refined Petroleum Products adds margin and transportation/logistics cost etc. to the Platts prices to arrive at the retail prices for refined petroleum products each month. Global Platts price changes are linked directly to the changes in Brent crude.

Impact on the airline sector

For cash-strapped airlines, the decline in crude prices will make it cheaper to operate flights that are already nearly empty as people remain homebound due to the coronavirus.
The plunge in crude futures also indicates that the market does not expect airlines to add back many flights to their slimmed-down networks any time soon,

source: https://www.molitics.in/article/677/Oil-drops-to-a-new-low

All is not rosy for the Wildlife amid lockdown

With most of us indoors, the routine babel of human voices and vehicles is being swapped by an eerie and empty calm. The wildlife we share our concrete jungles with are noticing, and responding. Our newborn habits are revising the environment in ways that are likely to be both positive and negative for nature. So which species are likely to prosper and which are likely to struggle?

Beyond a shadow of doubt, there is a directory of animals buoyed up amid the lockdown to investigate areas which are otherwise densely populated.

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Buffalos have taken to the highways in India. Mountain lions are resting in the trees in Boulder, Colorado. Wild pigs meander the streets of Barcelona while peacocks swagger along open lanes in Brazil.

Rodents in New York City have anywise become more confident in pursuit of food. What’s more, a groundhog seemed to gaze intently at two dogs peeping through a window while eating a bite of its pizza, which presumably doesn’t have anything to do with the lockdown, yet was a much needed distraction on social media regardless.

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The Washington Post reports that a herd of goats congested the roads of Wales. A viral video shows the animals incautiously wandering the vacant streets commandeering their quest for food.

As indicated by SFGate, an employee from Yosemite National Park said that since the wildlife park shut to the general public in late March, the sightings of large animals including bears and coyotes have augmented.

“It is not the case that [bears] aren’t normally here,” Yosemite worker Dane Peterson tells SFGate, ” most of the times they prefer to stay around the edges”.

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In Mexico, crocodiles that by and large remain cloaked up in lagoons close to the sea shores in La Ventanilla, Oaxaca, have been moving into the open since the sea shores were shut to the public around a fortnight back, Mexico News Daily reports.

Sea turtles which are on the brink of extinction have exploited the empty sea shores to encamp in Brazil and Florida. It’s too soon to tell how lockdown steps will influence sea turtle numbers. Reduced traffic could contribute to less distracting lights to befuddle the hatchlings about which way to go, Shanon Gann, the program supervisor at Brevard Zoo Sea Turtle Healing Center in Florida, said in an interview with weather.in.
 

ALL IS NOT ROSY FOR WILDLIFE

In most urban areas, where animals and birds are reliant on our daily activities, the lockdown is set to precipitate new challenges. The New York Times chronicled the situation in Thailand, where macaques have come to depend on people for nourishment. Their numbers have ballooned in the last few days which when coupled with the shortage of food offerings has given rise to aggressive behaviour amongst the breed. According to city residents, the furry fracas likely resulted from a sharp dip in tourism to the 800-year-old city, and thus a dip in free food offerings to thousands of local monkeys.

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Reduced traffic will prompt less hedgehog roadkill but parallel to it, the reduced noise pollution will also adversely affect the capacity of the bats, birds and other animals to communicate.

In the UK, the birds breeding season has dawned. Contingent on how long the lockdowns last, many birds could eventually settle on wrong choices about where to breed, and based on their prior experience, they ought to expect their scrupulously chosen spot a safe haven, which however, might not be the case . Rarer birds which breed in the UK will become vulnerable, for example, little terns, as people make for the beaches once limitations are lifted, possibly stomping on and upsetting breeding pairs and their little ones.

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The absence of humans hasn’t benefited the animals entirely, especially in African preserves. With less tourists around, cases of poachers slaughtering rhinos have topped-up in Botswana and South Africa.

“We’re in a situation of zero income, and our expenses are actually going up all the time just trying to fight off the poachers and protect the reserve,” Lynne MacTavish, operations manager at Mankwe Wildlife Reserve in South Africa, tells the Times. “To say it’s desperate is an understatement. We’re really in crisis here.”

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Several claims of wildlife emerging in populated regions ended up being fake, as indicated by National Geographic. One such claim says baby elephants in China become inebriated on corn wine and passed out in a tea garden, which may be entirely relatable during these times, however never happened. The absence of boats in the channels of Venice brought cases of dolphins showing up for the first time in decades, but the pictures were from the island of Sardinia, almost 500 miles away.

There may not be dolphins in Venice, however the waters have become incredibly clear, as the absence of gondolas and other boats on the water haven’t been working up sediments. At the present time, it isn’t clear what the long term impacts of this lockdown will be on nature, fundamentally on the grounds that this is happening when numerous species in the Northern Hemisphere are mating, conceiving an offspring, or coming out of hibernation. And people who are agog by wildlife roving in their close proximity during lockdown, should cautiously keep tabs on their activities once they step outside.
source: https://www.molitics.in/article/676/Some-species-are-set-to-suffer-during-lockdown