Who is at risk from the constitution?

किसे है संविधान से ख़तरा?

किसे है संविधान से ख़तरा?

चुने हुए प्रतिनिधियों को होटल की चाहरदीवारी में क़ैद करके रखे जाने का ट्रेंड लगभग स्थापित हो गया है। सरकार बनाने से पूर्व  खरीद-फ़रोख़्त को चाणक्यगिरी कहना नयी बुद्धिमत्ता हो गई है। संस्थानों का सरकार के हित में प्रयोग सामान्य समझा जाने लगा है। गवर्नर और प्रेसीडेंट की छवि पूरी तरह से कठपुतली वाली हो गई है।

दलित घोड़ी चढ़े – तो पिटाई। महिलाएँ अपनी मर्ज़ी से कपड़े पहनें – तो बवाल। विद्यार्थी शिक्षा के लिए आवाज़ उठाएँ – तो हो हल्ला। एक्टिविस्ट्स जन सरोकार के मुद्दों पर सरकार की आलोचना करें – तो शोर-शराबा। ये माहौल संविधान दिवस को अधिक प्रासंगिक बना रहा है।

संविधान का अनुच्छेद 15 कहता है कि धर्म, नस्ल, जाति, लिंग और जन्मस्थान के आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन वर्तमान राजनीति इन आधारों के साथ-साथ और बारीक आधार निकाल रही है विभाजन के लिए-बँटवारे के लिए।

बँटवाराअपनेचरमपर

पूर्वांचली, मराठा, गुजराती – जन्मस्थान के आधार पर इंसानों का वर्गीकरण आज़ादी के बाद अपने चरम पर है। हिंदुओं और मुस्लिमों का विभाजन बहुत पहले हो चुका था। ब्राह्मण अब दत्तात्रेय, गौड़ आदि-आदि में बँट गए, शूद्र, ज्यादा शूद्र और कम शूद्र हो गए हैं, ओबीसी वर्ग क्रीमी और नॉन क्रीमी लेयर में बँटे हुए हैं।

लोकतंत्रकेनामपरलोगोंकोबनायाजारहाहैगुलाम

इन सब बँटवारों को वोटबैंक नाम दिया जा रहा है। संविधान के दायरे में रहकर संविधान के तमाम अनुच्छेदों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं। लोकतंत्र के नाम पर लोगों को गुलाम बनाया जा रहा है।एक-दूसरे के नाम पर वोट हासिल करने वाली पार्टियाँ एक-दूसरे से लड़-भिड़ कर अलग हो जाती हैं। एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले लोग कुर्सी रानी के लिए हाथ मिलाने लगते हैं। इस दुश्मनी और दोस्ती में ठगे जा रहे हैं वोटर्स और अपमानित हो रही है संविधान की मूल भावना।

द टेलीग्राफ ने इस भावना के अपमान की कहानी अपने एक हेडलाइन We The Idiots के द्वारा बयान किया। संविधान का कवच होने के बावजूद लोग मूर्ख बनाए जा रहे हैं – सरेआम। 

लोगहाशिएपर

संविधान सभा द्वारा अंगीकृत किया गया संविधान लोगों को व्यवस्था का सिरमौर बनाने की भावना रखता है। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में लोगों के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों ने लोगों को इस व्यवस्था के हाशिए पर बिठा दाया है। हाशिए के अंदर नए हाशिए बनाए जा रहे हैं। लोगों के अंदर बँटवारे के नवीन बीज तलाशे जा रहे हैं।

एक तस्वीर तेज़ी से विकसित हो रही है – संविधान विरोधी ताकत बनाम संविधान की। लेकिन ये तस्वीर दिखे नहीं – इसके लिए एक संस्थान को दूसरे के खिलाफ खड़ा किया जा रहा है। आभासी तस्वीर खींची जा रही है पुलिस बनाम किसान, वकील बनाम पुलिस, या शिक्षक बनाम फोर्सेज़ आदि की।

संविधान एक सीमा तय करता है। सीमाएं स्वच्छंदता को रोकती हैं। पशु स्वच्छंदता चाहते हैं। राजनीति पाश्विक हो गई है। स्वाभाविक है आपके संवैधानिक हितों की रक्षा आपके तथाकथित प्रतिनिधि कभी नहीं करेंगे। आपकी जिम्मेदारी बस आपकी ही है।

source: https://www.molitics.in/article/609/constitution-is-at-stake-constitution-day-special

JNU – … finger is somewhere, but pointing somewhere

तो कौन ग़लत है –

  • फीस हाइक के विरोध में खड़े जेएनयू के छात्र या
  • उन छात्रों पर लाठीचार्ज़ करती पुलिस

अगर आपके पास सामान्य बौद्धिक क्षमता भी है तो आप लाठीचार्ज़ करती पुलिस को ग़लत मानेंगे। तर्कों में विश्वास कम है और बौद्धिकता को अलविदा कह चुके हैं तो छात्र भी ग़लत दिख सकते हैं।

पुलिस vs छात्रों की तस्वीर
एक तरफ़ डंडे बरसाती पुलिस और दूसरी तरफ नारे लगाती छात्रों की भीड़ – इस तस्वीर में समाज के दो धड़ों को एक दूसरे का दुश्मन दिखाया गया है। जो बिग बॉस इस पूरे खेल को चला रहा है वो यही चाहता है कि समाज इन दो धड़ों में बँटे। क्योंकि जितना बँटवारा होगा, समाज उतना ही कमज़ोर होता चला जाएगा। और समाज की कमज़ोरी ही बिग बॉस की ताकत बनेगी।

कैमरे पर बोलने से मना करने वाले कुछ पुलिसकर्मियों ने पहचान सुरक्षित रखने की शर्त पर बातचीत में स्वीकार किया है कि “सरकार और आला अधिकारी उनसे पाप करवा रही है।” एक पुलिसकर्मी ने कहा कि “बड़े-बड़े अधिकारी और नेता तो अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए विदेश भेज देते हैं या बड़ी-बड़ी प्राइवेट यूनीवर्सिटी में भेज देते हैं लेकिन हम जैसे ३०-३५ हज़ार कमाने वाले अपने बच्चों को कैसे पढ़ाएँ।”

पुलिस और छात्रों को दुश्मन के तौर पर दिखाता हुआ ये चित्र जानबूझ कर खींचा गया है। ताकि पुलिस के नाम पर भावनाओं को केंद्रीकृत किया जाए और विद्यार्थियों को विलेन साबित कर दिया जाए। पुलिस का विरोध करने वाले छात्रों को अराजक और कानून विरोधी बताकर इस छवि को मज़बूत किया जा सके।

निजीकरण की चौखट पर बेची जाएगी शिक्षा
बकौल वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण भारत पेट्रोलियम और एयर इंडिया मार्च 2020 तक बेचा जा चुका होगा। तेजस के साथ निजी रेल पटरी पर दौड़ने लगी है। बीएसएनएल और एमटीएनएल मृतप्राय हो गए हैं। सरकार की कार्यशैली से लगता है कि जो कुछ बेचा जा सकता है वो बेचा जाएगा – सरकार इस सिद्धांत पर काम कर रही है। शिक्षा सरकार की दृष्टि से एक बेचे जा सकने वाली सेवा है। अतः बेची जाएगी। भूलिए मत इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस के तहत ग्रीनफील्ड कैटेगरी में जियो यूनीवर्सिटी का नाम।

नए ब्रिटशर्स चाहते हैं शिक्षा में मैकाले नीति
मैकाले की शिक्षा नीति के बारे में ज़्यादातर लोगों ने पढ़ा-सुना होगा। ब्रिटिशर्स वह शिक्षा नीति इसलिए लाए ताकि भारतीयों को केवल क्लर्क बना कर छोड़ दिया जाए। पूँजीपति वर्ग के समर्थन से फली फूली सरकारें और पूंजीवादी व्यवस्था में विश्वास रखने वाले लोग आज के ब्रिटिशर्स हैं। जबकि ग़रीब, शोषित, वंचित आज के भारतीय। सो पूंजीवाद की हिमायती सरकार ग़रीबों को क्लर्क या उससे भी कहीं नीचे ही रखना चाहती है।

इसके लिए ज़रूरी है शिक्षा के अवसरों को वंचित वर्ग से दूर कर देना। यह तत्काल लिया जा सकने वाला फैसला नहीं है। इसके लिए माहौल बनाना पड़ेगा। ज़रूरतमंदों को विलेन साबित करना पड़ेगा। जिन्हें लगता है कि वो ज़रूरतमंद नहीं, उन्हें इस बात का यकीन दिलाया जाएगा ताकि ज़रूरतमंदों का विरोध समाज के बीच से ही हो। फूट डालो और राज करो की नीति पुरानी ज़रूर है लेकिन है बिल्कुल अचूक।

कुल मिलाकर –

“बड़े खेल की हैं बड़ी साज़िशें
है उंगली कहीं पर इशारा कहीं”

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source: https://www.molitics.in/article/604/reasons-behind-jnu-fees-hike-privatization

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शिक्षित समाज बोझ नहीं वरदान है

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"शिक्षित समाज बोझ नहीं वरदान है"

शिक्षापरव्यय – जीडीपीमेंइज़ाफ़ा

ढाका यूनिवर्सिटी में बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन विभाग के एक प्रोफेसर ने शिक्षा पर व्यय और आर्थिक विकास के बीच एक तुलनात्मक अध्ययन के बाद एक पेपर लिखा- ‘पब्लिकएक्सपेंडिचरऑनएजुकेशनएंडइकोनॉमिकग्रोथकेसऑफबांग्लादेश.’ पेपर के मुताबिक शिक्षा के बजट में एक प्रतिशत की वृद्धि प्रति व्यक्ति जीडीपी में 0.34 फ़ीसदी इज़ाफ़ा लाती है। 

अगर सरकार इस पेपर को पढ़ती और शिक्षित समाज के महत्व को समझती तो जेएनयू को लोगों की पहुँच से दूर करने की कोशिशें न होती। इस विश्वविद्यालय को कभी बदनाम नहीं किया जाता। कभी जिन लोगों को जेएनयू कुछ सैक्स का अड्डा दिख रहा था, आज उन्हीं और उन जैसे ही कुछ लोगों को यह विश्वविद्यालय मुफ्तख़ोरी का गढ़ नहीं लगता।

पिछले कुछ दिनों से JNU में आंदोलन चल रहा है। आंदोलन की वजह – अलग-अलग मदों में फीस हाइक। छात्र-छात्राओं और एल्यूमिनाईज़ का कहना था कि इन मदों में वृद्धि करके शिक्षा को आम लोगों की पहुँच से दूर किए जाने की कोशिश हो रही है। आंदोलन बढ़ा तो मानव संसाधन मंत्रालय की तरफ से रोलबैक का एक ट्वीट आया।

फीसमेंआंशिकवापसीकेसहारेआंदोलनकोमंदकरनेकेप्रयास

ख़बर चली की जेएनयू में फीस हाइक को लेकर चल रहे आंदोलन को देखते हुए इस फैसले को वापिस ले लिया गया है। लेकिन छात्र-छात्राओं का आंदोलन रुका नहीं। उनसे बातचीत कर हमने पाया कि फीस वापिस लेने की ये खबर भ्रामक थी। मतलब बढ़ोतरी हुई थी रूम रेंट के साथ-साथ सुविधा शुल्क और प्रपोज़ल्स में जबकि कम किया गया केवल रूम रेंट, वो भी आंशिक तौर पर।

नतीज़ा – आंदोलन चलता रहा। मांग थी- व्यवस्था को पहले जैसा किया जाए। सवाल उठता है कि आखिर छात्र-छात्राओं को पहले वाली व्यवस्था क्यों चाहिए और प्रशासन क्यों फीस वृद्धि करना चाहता है? पहले सवाल का जवाब दूसरे सवाल के जवाब में छिपा हुआ है।

जेएनयूकोजानबूझकरकियाजारहाहैबदनाम

दरअसल, पिछले पाँच-छः सालों में जेएनयू को बदनाम करने की तमाम कोशिशे की गई। यहाँ के छात्र-छात्राओं को एंटी-नेशनल कहा जाने लगा। गोदी मीडिया ने जेएनयू को देशद्रोह के अड्डे के तौर पर प्रचारित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हालात ये हो गए कि आम लोगों को भी जेएनयू दुश्मन दिखने लगा। जेएनयू से पीएचडी कर रहे छात्र उन्हें टाइमपास करते दिखे और कड़ी मेहनत से इस विवि में प्रवेश पाने वाले युवा मुफ़्तखोर।

गौरतलब है कि जेएनयू में पूरा हिंदुस्तान दिखता है। देश के लगभग हर कोने से प्रतिभाशाली छात्र-छात्राएँ इस विश्वविद्यालय में अध्ययन के लिए आते हैं। कम फीस, कम हॉस्टल किराया और सब्सिडाइज़्ड दाम पर मिलने वाले सामानों के कारण ग़रीब परिवारों को अपने बच्चों को इस परिसर में भेजते हुए सोचना नहीं पड़ता।

कहीं न कहीं सरकार ने इस भाव को प्रसार दिया है। इसी भाव के कारण संभावना पैदा होती है कि फीस हाइक के माध्यम से जेएनयू की शिक्षा को गरीब परिवारों से दूर किया जा रहा है। ताकि शिक्षा को खत्म करके सवाल को खत्म किया जा सके। तर्कों को मारा जा सके और शासन की रोटियाँ सेंकी जा सके।

अगर फीस हाइक के पीछे सरकार का तर्क अर्थव्यवस्था पर बोझ है तब भी उसे समझना चाहिए कि अच्छी शिक्षा से लैस युवा अर्थव्यवस्था के लिए वरदान ही साबित हो सकते हैं।

source link

To give equal rights to dumb wrestler, Rishi Venkariya will awaken the youth

गूंगा पहलवान को समान अधिकार दिलाने, युवाओं को जागृत करेंगे रुषि वेंकारिया

गूंगा पहलवान के नाम से मशहूर मूक और बधिर रेसलर वीरेंद्र सिंह के संघर्ष को देख हिंदूवादी नेता रुषि वेंकारिया ने मीडिया से बातचीत में बताया कि वे बहरी हो चुकी सरकार के कानों तक एक गूंगे पहलवान की आवाज़ को पहूंचाकर रहेंगे. रुषि वेंकारिया ने बताया कि दूसरे आम खिलाड़ियों के मुकाबले मूक और बधिर खिलाड़ियों की सुविधाओं में सरकार की ओर से कितनी लापरवाही की जा रही है. इस गंभीर मुद्दे को सरकार की नज़रों में लाने के लिए रुषि सभी आम जन का साथ चाहते है.

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दरअसल, पहलवान वीरेंद्र सिंह सभी मूक खिलाड़ियों के हक की आवाज़ उठा रहे हैं. वीरेंद्र की मांग है कि सरकार विकलांग खिलाड़ियों को वह सभी सुख-सुविधा मुहैया कराए जो वह बाकी आम खिलाड़ियों को देती है. 

इसी मांग के चलते वीरेंद्र सिंह ने खेल मंत्री किरण रिजिजू को एक पत्र भी लिखा है. इस पत्र के ज़रिए उन्होंने शांतिपूर्ण तरीके से सरकार से अपनी मांगो को पूरा करने की पेशकश की है. पत्र में वीरेंद्र ने कुल चार मांगें रखी हैं. उनकी पहली मांग यह है कि सभी खिलाड़ियों की तरह मूक और बधिर खिलाड़ियों को भी सरकार की ओर से कैश अवार्ड दिया जाना चाहिए. इसी के साथ उन्होंने, अर्जुन अवार्ड और राजीव खेल रत्न अवार्ड के लिए मूक और बधिर खिलाड़ियों की योग्यता को अहमियत देने की मांग रखी है.वीरेंद्र की मांग है कि  बधिर खिलाड़ियों को भी TOPS स्पोर्ट स्कीम की सूची में शामिल किया जाना चाहिए. वहीं उनकी आखिरी मांग है कि मूक और बधिर खिलाड़ियों को Olympics Pension Yojna में शामिल किया जाना चाहिए.

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बता दें कि अर्जुन अवार्ड विजयी पहलवान वीरेंद्र सिंह में रुषि वेंकारिया जैसे गंभीर नेता का साथ मिलने के बाद अपनी मांगो के पूरा होने की उम्मीद बढ़ गई है.

 source: https://www.molitics.in/article/600/deaf-athelete-virender-singh-demands-equal-rights-from-govt.-supported-by-rushi-vekariya

Amid the Chest Thumping Politics Over Odd-Even, Will Delhi Get Rid of Pollution?

Delhi Chief Minister Arvind Kejriwal on Friday announced the return of Odd-Even scheme in Delhi. He announced that from 4th to 15th November the Delhi government will implement the odd-even scheme in Delhi to tackle the rising pollution levels in Delhi.

The government has chosen to re-implement the Odd-Even scheme in November only because in that month farmers burn crops in the neighboring states of Punjab and Haryana. Due to which Delhi becomes a gas chamber. 

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Let us tell you that the odd-even scheme was first implemented in the year 2016. The first phase of this scheme was implemented from 1st -15th January 2016, the second phase was implemented from 15th April to 30th April 2016. 

What is the Odd-Even Scheme?

The odd-even scheme is a car rationing scheme. Under this scheme cars with license plates ending in an odd and even number are allowed on roads on alternate days, except weekends. 

This means cars whose number plate ends with 0, 2, 4, 6, 8 are allowed on roads on even dates i.e. 4,6,8 and so on. 

Similarly, cars whose number plate ends with odd numbers 1,3,5,7,9 will be allowed on roads on odd dates i.e. 5,7,9 and so on. 

Let us tell you that the odd-even scheme was adopted from countries like China and European countries. 

In the initial phase of Odd-Even scheme, the government exempted women, VIPs, and two-wheelers.

Result of Odd-Even Scheme

After the implementation of the first phase of the Odd-Even scheme, a study was published which stated that there was only a marginal drop in the PM 2.5 levels during the first phase of the scheme.

Another study conducted by atmospheric scientists revealed that pollution levels declined only by 2%-3% in the first phase. 

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The study also revealed that only three areas in Delhi—Najafgarh, Shalimar Bagh and Greater Kailash—witnessed an 8%-10% drop in pollution.

However, executive director of Energy Policy Institute at the University of Chicago Dr. Ken Lee had said the pilot scheme in January 2016 had “reduced particulate air pollution concentrations by 14 to 16%”. 

Public Reaction of Odd-Even Scheme

Our team went on the ground to know what people think about the re-implementation of Odd-Even scheme. We got a mixed reaction. Few people felt that this move by the Delhi government is correct as it will help in the reduction of pollution. While some felt that this move is correct but the decision to implement one day ban on crackers during Diwali won’t affect the pollution levels as rest of the year or during New Year eve whole world burst crackers. 

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Some people were not happy with this decision as they felt that the last time the government implemented this scheme there was not much effect on the pollution levels in Delhi. Many people who had one car faced a lot of problems like there travel time to their work increased as they had to switch modes of transportation. 

While there are the third set of people who feels that this decision is correct but it should not be implemented for a limited period and to one state only. This scheme should be implemented all over India and the state governments should promote cab sharing and vehicle sharing.

Opinion

In our opinion this step is correct but implementing it for just 15 days out of 365 days won’t bring a drastic change. No doubt that it will help in bringing down the traffic on roads but, vehicles are not the only source of pollution. Many industries cause more pollution than vehicles on roads. Along with these baby steps, the government needs to make stringent laws to curb the emission from these industries.