बिहार में चमकी बुखार से मौतों के बीच प्रदेश के नेताओं के बेतुके बयान आने जारी है। बीजेपी सांसद अजय निषाद ने चमकी बुखार के लिए 4G फॉर्मूले को जिम्मेदार बताया है।
अजय निषाद ने कहा है कि गरीबी, गांव, गंदगी और गर्मी बच्चों की मौत की वजह है। निषाद का कहना है कि इंसेफलाइटिस के मामले हर साल आते हैं लेकिन इस साल इसकी संख्या में इजाफा हुआ है। उन्होंने कहा कि संभव है इसका कारण प्रचंड गर्मी हो। Chamki Fever — कौन जिम्मेदार 100 मौतों का | Acute Encephalitis Syndrome
दिल्ली के मुखर्जीनगर में सिख बाप-बेटे की पिटाई के मामले में नया खुलासा हुआ है. दरअसल, टैक्सी ड्राइवर सरबजीत सिंह पर इसी साल 3 अप्रैल को मारपीट का मामला दर्ज कराया गया था. सरबजीत पर आरोप लगा था कि उन्होंने दिल्ली के गुरुद्वारे बंगला साहब के सेवादार से मारपीट की थी. मारपीट के बाद मामला पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने में दर्ज कराया गया था. यहां तक कि दिल्ली पुलिस ने उसे गिरफ्तार भी किया था.
दिल्ली के मुखर्जीनगर में हुई वारदात के बाद दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की टीम मामले की जांच कर रही है. साथ ही पुलिस सरबजीत के आपराधिक बैकग्राउंड की भी जांच कर रही है, जिस दौरान पुलिस को पुराने मामले की जानकारी मिली. सरबजीत पर हुई एफआईआर के मुताबिक मारपीट का मामला 3 अप्रैल 2019 का है.गुरुद्वारा बंगला साहिब के सेवादार मंगल सिंह ने पुलिस से शिकायत की थी. उस दौरान सरबजीत अपने बेटे के साथ कई दिनों से गुरुद्वारे में रह रहा था. जब उससे गुरुद्वारे में रहने की वजह पूछी तो सरबजीत ने कुछ जवाब नहीं दिया. फिर जब घर नाम और पता पूछा गया तो वो भागने की कोशिश करने लग गया. शक होने पर सेवादार ने गुरुद्वारे के दूसरे लोगों के साथ उसे रोकने की कोशिश की फिर सरबजीत सेवादार से भिड़ गया और उसका हाथ तोड़ दिया. इस पूरे मामले की शिकायत पुलिस से कई गई थी जिसके बाद सरबजीत की गिरफ्तारी भी हुई थी.
अब दिल्ली के मुखर्जीनगर में भी सरबजीत की पुलिस वाले से भिड़ंत हो गई थी. जिस दौरान उसने मौके पर ही कृपाण निकालकर पुलिसवाले को ज़ख्मी कर दिया था. इस घटना का वीडियो वायरल होने के बाद दिल्ली पुलिस ने कार्रवाई करते हुए 3 पुलिसवालों को भी सस्पेंड कर दिया. लेकिन कार्रवाई के बावजूद सिख समुदाय मुखर्जीनगर में थाने के बाहर डेरा जमाए हुए थे. 17–18 जून की रात भी उन्होंने काफी देर तक नारेबाजी भी की.
थाने के बाहर धरना दे रहे सिख समुदाय के लोगों के बीच से एक डेलिगेशन पुलिस के अधिकारियों से भी मिलने गया. उन्होंने मांग की कि सिख ड्राइवर सरबजीत के ऊपर जो धाराएं लगाई गई हैं उन्हें हटाया जाए. जबकि सरबजीत के हमले से पुलिस वाला बुरी तरह से ज़ख्मी हुआ था.सिख डेलिगेशन की मुलाकात के बाद सुबह 3–4 बजे के दौरान हालात नॉर्मल हुए. फिर लोग अपने-अपने घर की तरफ बढ़ गए. हालांकि दिल्ली पुलिस सुरक्षा को देखते हुए अभी भी काफी सतर्क है.
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“हमें सरकार पर भरोसा नहीं है, इसलिए हम खुद से कुंआ खोद रहे हैं, पीने के लिए पानी नहीं है.”
ये कहना है सेमाभाई का,सेमाभाई एक छोटे से गांव उपाला खापा में रहते हैं. उनके पास जमीन तो है लेकिन खेती करने के लिए पानी नहीं है.
उत्तरी
गुजरात के पालनपुर जिले के अमीरगढ़ ब्लॉक के अधिकांश किसानों का यही हाल
है. इन सबके खेत सूखे पड़े हुए हैं और फसल की सिंचाई के लिए पानी नहीं है.
इनके मक्के की फसल पूरी तरह सूख गई है.सेमाभाई के पास दो बैल हैं लेकिन उनका इस्तेमाल खेतों को जोतने में नहीं हो रहा है, बल्कि कुंआ खोदने में किया जा रहा है.
पिछले साल उनकी फसल सूख गई थी और इस साल उनका कुंआ भी सूख गया था.
वे
बताते हैं, “मेरे कुंए में पानी नहीं है, इसलिए अब मैं एक कहीं गहरा कुंआ
खोद रहा हूं. पहले तो कुंए में थोड़ा पानी था लेकिन इस बार सूखे के चलते
पानी ख़त्म हो गया है, पीने तक के लिए पानी नहीं है.”
उपाला
खापा एक छोटा सा गांव है, गांव के बाहरी हिस्से में एक सरकारी प्राथमिक
स्कूल है. गांव में प्रवेश करते ही सड़क के दोनों तरफ दूर तक खेत ही खेत
नजर आते हैं लेकिन इन खेतों में कोई हरियाली नजर नहीं आती.इन खेतों में कुछ
में कुएं मौजूद हैं, कुछ में पुराने तो कुछ में नए. लेकिन इनमें किन्हीं
में पानी मौजूद नहीं है.
बीते
साल मानसून में सेमाभाई ने मक्के की फसल लगाई थी लेकिन मक्का नहीं उपजा.
वे बताते हैं, “सूखा था, हमारे खेतों में कुछ नहीं हुआ. सरकार से भी कोई
मदद नहीं मिली. हमें सरकार पर कोई भरोसा भी नहीं है इसलिए कुद से ही कुंआ
खोद रहे हैं.”
सेमाभाई
का परिवार अब तक 70-80 फीट तक की खुदाई कर चुका है लेकिन अब तक पानी मिलने
के कोई संकेत नहीं मिले हैं. पानी मिलने के लिए अभी कितनी खुदाई और करनी
होगी, इसका अंदाजा परिवार को नहीं है.
गुजरात
के दूसरे हिस्सों में भी कुएं और तालाब सूख रहे हैं. पानी के स्थानीय
स्रोत क्यों सूख रहे हैं, इस बारे में स्थानीय कार्यकर्ता नफीसा बारोट
बताती हैं, “1970 के दशक में सरकार स्थानी पानी के स्रोतों को बेहतर बनाने
का काम करती थी लेकिन 1990 में सरकार का ध्यान जरूरतमंद इलाकों में सप्लाई
वाटर पहुंचाने पर शिफ्ट हो गया.”
नफीसा
बारोट बताती हैं कि जरूरत स्थानीय जल संसाधनों के देखभाल की थी लेकिन
सरकार का ध्यान बड़े पैमाने पर जलआपूर्ति करने वाले प्रोजेक्टों की तरफ हो
गया, ऐसे में स्थानीय जल संसाधनों की लगातार उपेक्षा हुई.
ये
तो वो हकीकत है जो हमारे जैसे पत्रकारों के नज़र में आई मौजूदा समय में न
जाने कितने ऐसे सेमाभाई की हकीकत सूखे ज़मीन पर गड्ढा खोद रही होगी।
हालाँकि सेमाभाईको 70 फीट खोदने के बाद भी पानी नहीं मिला लेकिन उम्मीद है
सरकार को उनके इस परिश्र्म की खबर जरूर मिलेगी और हमारी सरकार सूखाग्रस्त
इलाकों के लिए जरूर कोई योजना जल्द ही लेकर आएगी।
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