जेएनयू प्रशासन द्वारा 48 शिक्षकों के प्रदर्शन को लेकर दिए नोटिस के मामले में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) प्रशासन और शिक्षक संघ अब आमने-सामने आ गए है।साथ ही शिक्षक संघ ने जेएनयू प्रशासन पर ये भी आरोप लगाया है कि प्रशासन लगातार आरक्षण नीति के उल्लंघन, जबरन अटेंडेंस पॉलिसी को लागू करने, मनमाने तरीके से विभागों के अध्यक्षों और डीनों की नियुक्ति और उन्हें हटाने, शिक्षकों को परेशान करने जैसे जेएनयू विरोधी कदम उठाता रहा हैं।
गुडगाँव के सैक्टर 31 में एक बच्ची नाले में गिरकर मर गई। शहर मे हर थोड़ी दूरी पर खुले मैनहोल दिख जाते हैं। सैक्टर्स के अंदर भी बिना ढ़क्कन के मैनहोल बड़ी समस्या हैं। न तो चुने हुए प्रतिनिधि न हीं संबंधित अधिकारी कभी इस मामले में गंभीर दिखते हैं।
मुसलमानों को तोड़ने का प्रयास है Triple Talaq राज्यसभा में पेश हुए बिल के पक्ष में 99 लोगों ने वोट किया, जबकि 84 लोगों ने इसके विपक्ष में वोट किया।अब विपक्ष के कई नेताओं तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि ये बिल मुस्लिम समुदाय को कमजोर करने तथा उसे तोड़ने की नियत से बनाया है, जबकि सत्ताधीशों का कहना है कि इस बिल से मोदी जी देश की मुस्लिम महिलाओं को न्याय देने का काम किया है।
सरकार ने जहाँ UAPA बिल में संशोधन के लिए देश की सुरक्षा का हवाला दिया वही ये भी सोचने का विषय है कि केवल शक के आधार पर किसी को भी हिरासत में लेना कहाँ तक जायज है और अगर सरकार किसी को हिरासत में लेती भी है तो उसका कारण बताने की क्या समयसीमा होगी ?
“केंद्र
सरकार मे RTI संशोधन बिल पास कर दिया है जिसके अनुसार सैलरी, भत्ते, सेवा
की शर्तें और कार्यकाल केंद्र सरकार के अधीन होगा। ये संशोधन पारदरिशिता के
कानून को हिला कर रख देगा। मोदी जी, ये संशोधन दर्शाता है कि आप लोकशाही
की जगह तानाशाही में विश्वास करते हैं।
”सबसे पहले आपको ये बताएँ RTI है क्या? एक समय जब CBI, Election Commission और न्यायपालिका जैसे संस्थानों की स्वतंत्रता लगातार खतरे में दिख रही थी, RTI – आम लोगों के लिए सूचनाओं का बड़ा हथियार माना जा रहा था।नोटबंदी के बाद सबसे ज्यादा पैसे किस बैंक में जमा हुए, कॉमनवेल्थ घोटाले से लेकर कोयला घोटाला, राशन घोटाला, 2G – घोटाला आदि न जाने कितने ही घोटालों का पर्दाफ़ाश RTI ने किया।
ख़ैर
सरकार ने सूचना का अधिकार संशोधन बिल पास कर दिया है। विपक्ष के आरोप हैं
कि सरकार RTI को कमज़ोर करना चाहती है क्योंकि ये भ्रष्टाचारियों से मिली
हुई है। सरकार ने इस बात को खारिज किया है। कहती है – सरकार सरलीकरण के लिए
प्रतिबद्ध है। चलिए जानते हैं कि RTI संशोधन है क्या -ओरीजिनल
RTI बिल के अनुसार –
1.
मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त का कार्यकाल 5 साल का होता। और अधिकतम
उम्र 65 साल की होगी। संशोधन के हिसाब से कार्यकाल के बारे में के बारे
में कोई भी फैसला केंद्र सरकार की जिम्मेदारी होगी।
2. पहले
के बिल के हिसाब से सूचना आयोग के सदस्यों की सैलरी और सेवा की शर्तें
चुनाव आयोग के सदस्यों के समान होती थी। लेकिन संशोधन के जरिए भत्ते और
वेतन के बारे में निर्णय केंद्र सरकार ने अपने अंदर ले लिया है।सरकार ने ये
दलील दी है कि चुनाव आयोग और सूचना आयोगों की कार्यप्रणालियां ‘एकदम
भिन्न’ हैं. चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है सूचना आयोग एक कानूनी निकाय
है।लेकिन सरकार यह भूल गई कि फ्री स्पीच और निष्पक्ष चुनाव संविधान के
लक्ष्य हैं और चुनाव आयोग और सूचना आयोग इस लक्ष्य को पाने के लिए ज़रूरी
संस्थान हैं।
2013
से 2018 तक भारत के केंद्रीय सूचना आयुक्त रह चुके प्रोफेसर श्रीधर
आचार्युलू कहते हैं कि यह संशोधन सूचना आयोग को सरकार के अधीन ला देगा.
उनके मुताबिक, इसके खतरनाक परिणाम होंगे.अप्रैल 1996 में राजस्थान के
बियावर में कुछ लोग इकट्ठा हुए। SDM ऑफिस तक गए और आंदोलन किया। उन्होंने
नारा लगाया था – हमारा पैसा – हमारा हिसाब। अंततः इसी तरह के आंदोलन का
परिणाम था RTI एक्ट। सरकार के इस संशोधन से भ्रष्टचार के खिलाफ और
निष्पक्षता के लिए सड़क पर हो रहे तमाम आंदोलनों को कुचल दिया है।
4
जून 2017-उन्नाव में एक लड़की का बलात्कार होता है। बलात्कार के आरोप
उन्नाव के विधायक कुलदीप सिंह सेंगर पर लगते हैं। पीड़िता पुलिस के पास
जाती है। लेकिन नेता के रसूख़ के सामने पुलिस की कार्यवाही मंद पड़ जाती
है।
असंतुष्ट
होकर रेप पीड़िता 8 अप्रैल 2018 को सीएम आदित्यनाथ के घर के बाहर खुद को
जला लेने की कोशिश करती है। 9 अप्रैल को न्यायिक हिरासत में पीड़िता के
पिता की मौत हो जाती है। कुलदीप सेंगर के भाई पर आरोप लगता है कि उसने
जुडिशियल कस्टडी में पीड़िता के पिता की पिटाई की जिससे उसकी मौत हो गई।
विरोध बढ़ता है। विशेष जाँच दल गठित की जाती है। जाँच दल रिपोर्ट सौंपती
है। रिपोर्ट में बताया जाता है कि स्थानीय पुलिस और डॉक्टर्स ने कई बड़ी
लापरवाहियाँ की।
मामला
सीबीआई को सौंप दिया जाता है। CBI, कुलदीप सेंगर और उसके भाई के खिलाफ
चार्जशीट दर्ज करती है। अगस्त 2018 में बलात्कार के की-विटनेस की मौत हो
जाती है। बिना ऑटॉप्सी के उसकी लाश ज़मीन में गाड़ दी जाती है। 21 नवंबर
2018 को पीड़िता के चाचा को 18 साल पुरानी गन फायरिंग केस में अरेस्ट किया
जाता है।
अब
28 जुलाई 2019 को पीड़िता के कार को एक ट्रक टक्कर मार देती है। दो परिजन
मर जाते हैं। पीड़िता बुरी तरह से घायल हो जाती है। जिस ट्रक से एक्सीडेंट
हुआ है, उसका नंबर प्लेट काले पेंट से लिपा हुआ है। अफसोस यह है कि ये
कहानी बॉलीवुड के किसी थ्रिलर फिल्म की नहीं है। ये कहानी है उत्तर प्रदेश
की एक लड़की की। जिसे नौकरी देने के नाम पर बलात्कार किया गया। और फिर लगभग
पूरे परिवार पर शिकंजा कस लिया गया।
गौरतलब
है कि उत्तर प्रदेश में सरकार बीजेपी की है और 403 में से 312 विधायक
बीजेपी के हैं। कुल 143 विधायकों पर आपराधिक मुकदमें दर्ज़ हैं। इन 143
विधायकों में से 114 विधायक बीजेपी के हैं। मतलब बीजेपी के चुने हुए 37
प्रतिशत विधायक आपराधिक पृष्ठभूमि से हैं। वहीं अगर बात गंभीर आपराधिक
मामलों की हो, तो कुल 107 विधायक और बीजेपी के 86 विधायक इस पृष्ठभूमि से
संबंध रखते हैं।
मतलब साफ है, उत्तर प्रदेश की विधानसभा में केवल नेता नहीं बल्कि नामी गुण्डे और अपराधी भी चुनकर जाते हैं। इसकी जिम्मेदारी जनता पर है। लेकिन जब जानकारियों का मुख्य स्तंभ मीडिया पक्षपाती हो जाए तो जनता कहाँ से जानकारियाँ हासिल करेगी? धनबल और बाहुबल के आगे बेबस लोगों को गोदी मीडिया और कमज़ोर कर रहा है।
“जो न बोले जय श्री राम, भेज दो उसको कब्रस्तान” जैसे गाने मुसलमानों के ख़िलाफ़ समाज में जहर भर रहे हैं। विवादित गाना गाने वाले गायक वरुण बहार का जुड़ाव बजरंग दल से है। सोशल मीडिया पर ऐसे कई गाने मौजूद हैं जो सीधे तौर पर मुसलमानों की हत्या करने की वकालत कर रहे हैं। आख़िर कब तक सत्ता के संरक्षण में ऐसे डिजिटल आतंकवाद को बढ़ावा दिया जाएगा
कृषि संकट का निवारण करने के बजाए सरकार किसानों के आत्महत्या के रिकॉर्ड को छुपा रही है। किसानों के आत्महत्या से जुड़े तथ्यों को जानने के लिए देखें यह वीडियो।
अगर
आपकी दाढ़ी खास करीने से बढ़ी हुई है, आप मूँछ नहीं रखते और सिर पर खास
टोपी पहनते हैं; मतलब अगर आप सीधे तौर पर मुसलमान दिखते हैं, तो कभी भी और
कहीं भी एक भीड़ आपको रोक सकती है। आपका नाम पूछ सकती है। आपकी टोपी
उतारकार फेंक सकती है और आपसे जबरन जय श्री राम के नारे लगवा सकती है। आपको
ये नारा लगाना पड़ेगा। नहीं लगाएँगे तो मारे जाएंगे। दोहरा चरित्र ये है
कि मुसलमानों को टोपी फेंकने के लिए मजबूर करने वाली भीड़ में वो लोग भी
शामिल होते होंगे जिन्हें फिल्म केसरी में अक्षय कुमार द्वारा पगड़ी न
उतारने की ज़िद पागल बना गई थी।
मोदी
साहब के पीएम बनने के बाद की घटनाओं में उपर की बातें बहुत कॉमन हैं।
पश्चिम बंगाल हो या हरियाणा, बिहार हो या झारखंड, महाराष्ट्र हो या उत्तर
प्रदेश लगभग हर राज्य में जय श्री राम का नारा हिंसा का आधार बना।
क्या
जय श्री राम एक आध्यात्मिक/ऐतिहासिक संबोधन है? अगर आप अभिवादन के शब्दों
के ऐतिहासिक सफर के बारे में पढ़ेंगे तो पाएँगे कि आपने राम-राम सुना होगा,
जय सिया-राम सुना होगा या फिर जय राम जी की सुना होगा। जय श्री राम
अभिवादन का शब्द कभी नहीं रहा।
जय
श्री राम का नारा लोकप्रिय हुआ रामानंद सागर के सीरियल रामयण से। जब
राम-रावण युद्ध के दौरान हनुमान राम की वानरी सेना के उत्साह को बढ़ाने के
लिए जय श्री राम बोलते थे और समस्त वानरी सेना पुनरावृत्ति में जय श्री राम
का उद्धोष करती थी। ये 1980 का दौर था।
इसी
दौर में विश्व हिंदू परिषद देश पर हिंदुत्व का रंग चढ़ाने की कोशिशें कर
रही थी। लोकप्रिय धारावाहिक से निकला एक लोकप्रिय नारा विहिप का राजनैतिक
नारा बन गया। जय श्री राम को राम जन्मभूमि आंदोलन में जमकर प्रयोग किया
गया। भगवा वेश धरे हुए हिंदुत्ववादियों के हाथों में हथियार और मुँह पर जय
श्री राम के ओजस्वी नारे से आई आक्रामक लालिमा हिंदुत्व की सिग्नेचर इमेज
बन गई।
1990-92
के दौर में यह नारा बीजेपी ने ज़ोरों-शोरों से अपनाया। फिर चुनाव-दर-चुनाव
जय श्री राम गूँजता रहा और बीजेपी का ग्राफ बढ़ता रहा। बीजेपी ने एक ऐसे
वोटबैंक का निर्माण कर लिया जिसकी रीढ़ हिंदू आस्था प्रतीक राम थे। 2014
में मोदी सत्ता की केंद्र में आए और इसके बाद से जय श्री राम नारे की
उग्रता बढ़ी। 2019 में मोदी दोबारा आए लेकिन जिस ऐतिहासिक मैनडेट के साथ
मोदी आए उससे कहीं अधिक उग्रता के साथ जय श्री राम का नारा राजनैतिक पटल पर
उभरा।
जय
श्री राम के नारे के साये में हिंसा पलने लगी, लोग मरने लगे, बीजेपी के
विपक्षी इस साये में कमज़ोर होने लगे। यूट्यूब, ट्विटर औऱ फेसबुक पर जय
श्री राम के साथ भड़काऊ कंटेंट जमकर फैलाया जा रहा है। हिंदुत्ववादी
संगठनों ने लोगों के मन से जय श्री राम नारे के प्रति आदर का भाव छीनकर डर
के भाव से भर दिया है। आज जय श्री राम आदर की नहीं बल्कि डर की निशानी हैं।
हालात ऐसे हैं कि अगर खुद राम आकर कहें कि मेरे नाम पर हिंसा मत फैलाओ, तो
ये उन्मादी भीड़ राम की भी मॉब लिंचिंग कर दे।