बुआ-भतीजा के रिश्तो में आ गई दरार : मायावती का अखिलेश पर बड़ा हमला, चुनाव में हार के कारण भी गिनाए
हाल ही में शकील अहमद शेख नाम के एक्टिविस्ट द्वारा फाइल की गयी RTI के जरिये महाराष्ट्र के कई बड़े नेता नगर निगम की ब्लैकलिस्ट में शामिल हो गए। पर ये नेता ब्लैकलिस्ट क्यों हुए ? जवाब में पता चलता है कि महारष्ट्र के सीएम देवेंद्र फडणवीस समेत 18 बड़े नेताओ ने कई सालो से पानी का बिल ही जमा नहीं किया।
निंदनीय है की जो नेता समाज के आदर्श होने चाहिए वो समाज में
चोरी और सरकारी संपत्ति का दुरूपयोग करने के लिए सुर्खियों में नज़र आ रहे
हैं। और तो और हमारे देश में एक चलन ये भी बन गया है की नेता सरकारी आवासों
पर अनधिकृत कब्जा क्र लेते हैं। देश की राजधानी दिल्ली में ही 1200 से
ज्यादा सरकारी बंगलों पर अनधिकृत कब्जा है।
ये बंगले सरकारी सुविधा के तहत कुल आवासों की संख्या के करीब 2 फीसदी हैं। नेताओ द्वारा सरकारी संपत्ति को इस तरह से उपयोग करना न तो केवल भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहा है बल्कि सरकारी बजट को भारी नुक्सान पहुंचा रहा है।
हर उम्मीदवार को चुनाव के बाद कुल खर्च का हिसाब देना होता है. चुनाव के वक्त हर कैंडिडेट एक अलग अकाउंट रखता है. यहां खर्च हो रहे पैसे का हिसाब रखता है. कैंडिडेट के अलावा चुनाव आयोग की ओर से नियुक्त अधिकारी भी इस खर्च का हिसाब रखते हैं. जिसे शैडो रिजस्टर का नाम दिया जाता है. यानी टू वे मामला है.
चुनाव आयोग उम्मीदवार की हर सभा या रैली में पोस्टर-बैनर
से लेकर गाड़ियों तक के खर्च की डिटेल रखता है. चुनाव खर्च की मैक्सिमम
लिमिट है 70 लाख. लेकिन चुनाव आयोग के शैडो रिजस्टर के मुताबिक सन्नी ने 86
लाख से ज्यादा खर्च किए हैं.सन्नी ने क्या कहा सन्नी देओल की ओर से जवाब
आया है कि चूक उनसे नहीं, चुनाव की टीम से हुई है. सन्नी की लीगल टीम ने
कहा कि उनके क्लाइंट के चुनाव खर्च का हिसाब ठीक है.
चुनाव
आयोग की टीम से चूक हुई है. अगर कोई कन्फ्यूज़न है तो खर्च की सही डिटेल
फिर मुहैया करा दी जाएगी.सन्नी के प्रचार में खर्च बढ़ने का अहम कारण है
बड़ी रैलियां.
29 अप्रैल को गुरदासपुर में भाजपा ने बड़ी रैली की थी. 2 मई को सन्नी देओल ने रोड शो किया.
5
मई को पठानकोट में एक और बड़ी रैली हुई. इस रैली में भाजपा अध्यक्ष अमित
शाह समेत कई नेता हेलीकॉप्टर से पहुंचे थे. लाज़मी है खर्च बढ़ा.
बिहार में चमकी बुखार से मौतों के बीच प्रदेश के नेताओं के बेतुके बयान आने जारी है। बीजेपी सांसद अजय निषाद ने चमकी बुखार के लिए 4G फॉर्मूले को जिम्मेदार बताया है।
अजय निषाद ने कहा है कि गरीबी, गांव, गंदगी और गर्मी बच्चों की मौत की वजह है। निषाद का कहना है कि इंसेफलाइटिस के मामले हर साल आते हैं लेकिन इस साल इसकी संख्या में इजाफा हुआ है। उन्होंने कहा कि संभव है इसका कारण प्रचंड गर्मी हो। Chamki Fever — कौन जिम्मेदार 100 मौतों का | Acute Encephalitis Syndrome
दिल्ली के मुखर्जीनगर में सिख बाप-बेटे की पिटाई के मामले में नया खुलासा हुआ है. दरअसल, टैक्सी ड्राइवर सरबजीत सिंह पर इसी साल 3 अप्रैल को मारपीट का मामला दर्ज कराया गया था. सरबजीत पर आरोप लगा था कि उन्होंने दिल्ली के गुरुद्वारे बंगला साहब के सेवादार से मारपीट की थी. मारपीट के बाद मामला पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने में दर्ज कराया गया था. यहां तक कि दिल्ली पुलिस ने उसे गिरफ्तार भी किया था.
दिल्ली के मुखर्जीनगर में हुई वारदात के बाद दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की टीम मामले की जांच कर रही है. साथ ही पुलिस सरबजीत के आपराधिक बैकग्राउंड की भी जांच कर रही है, जिस दौरान पुलिस को पुराने मामले की जानकारी मिली. सरबजीत पर हुई एफआईआर के मुताबिक मारपीट का मामला 3 अप्रैल 2019 का है.गुरुद्वारा बंगला साहिब के सेवादार मंगल सिंह ने पुलिस से शिकायत की थी. उस दौरान सरबजीत अपने बेटे के साथ कई दिनों से गुरुद्वारे में रह रहा था. जब उससे गुरुद्वारे में रहने की वजह पूछी तो सरबजीत ने कुछ जवाब नहीं दिया. फिर जब घर नाम और पता पूछा गया तो वो भागने की कोशिश करने लग गया. शक होने पर सेवादार ने गुरुद्वारे के दूसरे लोगों के साथ उसे रोकने की कोशिश की फिर सरबजीत सेवादार से भिड़ गया और उसका हाथ तोड़ दिया. इस पूरे मामले की शिकायत पुलिस से कई गई थी जिसके बाद सरबजीत की गिरफ्तारी भी हुई थी.
अब दिल्ली के मुखर्जीनगर में भी सरबजीत की पुलिस वाले से भिड़ंत हो गई थी. जिस दौरान उसने मौके पर ही कृपाण निकालकर पुलिसवाले को ज़ख्मी कर दिया था. इस घटना का वीडियो वायरल होने के बाद दिल्ली पुलिस ने कार्रवाई करते हुए 3 पुलिसवालों को भी सस्पेंड कर दिया. लेकिन कार्रवाई के बावजूद सिख समुदाय मुखर्जीनगर में थाने के बाहर डेरा जमाए हुए थे. 17–18 जून की रात भी उन्होंने काफी देर तक नारेबाजी भी की.
थाने के बाहर धरना दे रहे सिख समुदाय के लोगों के बीच से एक डेलिगेशन पुलिस के अधिकारियों से भी मिलने गया. उन्होंने मांग की कि सिख ड्राइवर सरबजीत के ऊपर जो धाराएं लगाई गई हैं उन्हें हटाया जाए. जबकि सरबजीत के हमले से पुलिस वाला बुरी तरह से ज़ख्मी हुआ था.सिख डेलिगेशन की मुलाकात के बाद सुबह 3–4 बजे के दौरान हालात नॉर्मल हुए. फिर लोग अपने-अपने घर की तरफ बढ़ गए. हालांकि दिल्ली पुलिस सुरक्षा को देखते हुए अभी भी काफी सतर्क है.
कब तक शांत रहोगे, कुछ तो कभी बोलोगे ही ना (फेसबुक और insta स्टेटस के अलावा) अगर सच में शासन-प्रशासन से परेशान हैं तो Raise Your Voice के मदद से आवाज उठाईए।
प्रणय
रॉय को सेबी ने एनडीटीवी के डायरेक्टर पद से प्रतिबंधित कर दिया है।
प्रमोटर्स स्टॉक मार्केट से अगले दो सालों तक लोन भी नहीं ले सकते हैं।
इसका भी प्रतिबंध है।
ख़बर
एनडीटीवी से जुड़ी ज़रूर है लेकिन केवल एनडीटीवी की नहीं। ये ख़बर उन सभी
के लिए है जिन्हें गौरी लंकेश की हत्या ने दुखी किया। उन सभी के लिए भी है
जो देश में बढ़ रहे हेट क्राइम्स के खिलाफ बोल रहे थे, लिख रहे थे। उन सभी
के लिए भी जो हिंदुत्व या इस्लाम को देश और समाज के बाद रखते हैं।
उन
सभी नवागंतुक पत्रकारों के लिए एक वॉर्निंग सायरन है जो सिद्धांतों में
सहेजी हुई पत्रकारिता करने आए हैं। उन सभी पत्रकारों के लिए एक रेड सिग्नल
है जो सत्ताधीशों के तंबू की नहीं बल्कि उस तंबू से उजड़े लोगों के
दुख-दर्द को दिखाने को पत्रकारिता समझते हैं।
जहाँ
ये ख़बर काफी लोगों के लिए दुख और चिंता का कारण है, वहीं कुछ लोगों के
लिए ख़ुशी और जीत का आधार भी। मसलन, वे तमाम लोग जो नए नोटों में चिप होने
की ख़बर सुनकर ख़ुश और गौरवान्वित होते थे, वे लोग, जो ये जानकर
आश्चर्यचकित होते थे कि एलियन हमारे यान ले गए, वे लोग, जो न्यूज़रूम में
दौड़-दौड़ कर डिबेट सेशन कंडक्ट करने वाले एंकर को देखकर सोचते थे कि यही
इच भगवान है, उन सभी के लिए ये ख़बर खुशगवार है।
एनडीटीवी
में तनख़्वाह की अनियमितता की ख़बरें भी सुनने में आई थी। ऐसे में इन
हालातों में अब एनडीटीवी किस दिशा में आगे बढ़ेगा और कैसे – ये देखने वाला
विषय होगा। पैसा ज़रूरी है। पैसे के बिना कुछ भी संभव नहीं।
बहरहाल,
अमित शाह और नरेंद्र मोदी के बारे में कहा जाता है कि ये जोड़ अपने
दुश्मनों (प्रतिद्वंद्वियों) को छोड़ती नहीं। राजनैतिक पार्टियों का जो
हश्र हुआ है वो हम सबने देखा। स्वतंत्र आवाज़ों (गौरी लंकेश, कलबुर्गी) की
हत्या हमारे सामने की बात है। जेएनयू जैसे संस्थान का डिफेमेशन हम सबके
सामने हुआ। ज़ाहिर है कि ये सब या फिर इनके शह में रहने वाले उस विचारधारा
के आलोचक थे जिसके पोस्टर ब्वॉय मोदी और शाह हैं।
बचा-ख़ुचा मीडिया और स्वतंत्र पत्रकार वे दुश्मन हैं, जो पिछले कार्यकाल में साधे नहीं गए। इस बार साधे जाएँगे।
“हमें सरकार पर भरोसा नहीं है, इसलिए हम खुद से कुंआ खोद रहे हैं, पीने के लिए पानी नहीं है.”
ये कहना है सेमाभाई का,सेमाभाई एक छोटे से गांव उपाला खापा में रहते हैं. उनके पास जमीन तो है लेकिन खेती करने के लिए पानी नहीं है.
उत्तरी
गुजरात के पालनपुर जिले के अमीरगढ़ ब्लॉक के अधिकांश किसानों का यही हाल
है. इन सबके खेत सूखे पड़े हुए हैं और फसल की सिंचाई के लिए पानी नहीं है.
इनके मक्के की फसल पूरी तरह सूख गई है.सेमाभाई के पास दो बैल हैं लेकिन उनका इस्तेमाल खेतों को जोतने में नहीं हो रहा है, बल्कि कुंआ खोदने में किया जा रहा है.
पिछले साल उनकी फसल सूख गई थी और इस साल उनका कुंआ भी सूख गया था.
वे
बताते हैं, “मेरे कुंए में पानी नहीं है, इसलिए अब मैं एक कहीं गहरा कुंआ
खोद रहा हूं. पहले तो कुंए में थोड़ा पानी था लेकिन इस बार सूखे के चलते
पानी ख़त्म हो गया है, पीने तक के लिए पानी नहीं है.”
उपाला
खापा एक छोटा सा गांव है, गांव के बाहरी हिस्से में एक सरकारी प्राथमिक
स्कूल है. गांव में प्रवेश करते ही सड़क के दोनों तरफ दूर तक खेत ही खेत
नजर आते हैं लेकिन इन खेतों में कोई हरियाली नजर नहीं आती.इन खेतों में कुछ
में कुएं मौजूद हैं, कुछ में पुराने तो कुछ में नए. लेकिन इनमें किन्हीं
में पानी मौजूद नहीं है.
बीते
साल मानसून में सेमाभाई ने मक्के की फसल लगाई थी लेकिन मक्का नहीं उपजा.
वे बताते हैं, “सूखा था, हमारे खेतों में कुछ नहीं हुआ. सरकार से भी कोई
मदद नहीं मिली. हमें सरकार पर कोई भरोसा भी नहीं है इसलिए कुद से ही कुंआ
खोद रहे हैं.”
सेमाभाई
का परिवार अब तक 70-80 फीट तक की खुदाई कर चुका है लेकिन अब तक पानी मिलने
के कोई संकेत नहीं मिले हैं. पानी मिलने के लिए अभी कितनी खुदाई और करनी
होगी, इसका अंदाजा परिवार को नहीं है.
गुजरात
के दूसरे हिस्सों में भी कुएं और तालाब सूख रहे हैं. पानी के स्थानीय
स्रोत क्यों सूख रहे हैं, इस बारे में स्थानीय कार्यकर्ता नफीसा बारोट
बताती हैं, “1970 के दशक में सरकार स्थानी पानी के स्रोतों को बेहतर बनाने
का काम करती थी लेकिन 1990 में सरकार का ध्यान जरूरतमंद इलाकों में सप्लाई
वाटर पहुंचाने पर शिफ्ट हो गया.”
नफीसा
बारोट बताती हैं कि जरूरत स्थानीय जल संसाधनों के देखभाल की थी लेकिन
सरकार का ध्यान बड़े पैमाने पर जलआपूर्ति करने वाले प्रोजेक्टों की तरफ हो
गया, ऐसे में स्थानीय जल संसाधनों की लगातार उपेक्षा हुई.
ये
तो वो हकीकत है जो हमारे जैसे पत्रकारों के नज़र में आई मौजूदा समय में न
जाने कितने ऐसे सेमाभाई की हकीकत सूखे ज़मीन पर गड्ढा खोद रही होगी।
हालाँकि सेमाभाईको 70 फीट खोदने के बाद भी पानी नहीं मिला लेकिन उम्मीद है
सरकार को उनके इस परिश्र्म की खबर जरूर मिलेगी और हमारी सरकार सूखाग्रस्त
इलाकों के लिए जरूर कोई योजना जल्द ही लेकर आएगी।
बच्चे
एक बागीचे की कली की तरह होते हैं सो सावधानी और प्यार से पाले जाने
चाहिए। वे देश के भविष्य और कल के नागरिक हैं। – जवाहर लाल नेहरु के इस कथन
को अगर बिहार प्रशासन ने पढ़ा-सुना-समझा होता तो बिहार में शनिवार सुबह तक
83 बच्चे मर न गए होते।
Acute
Encephalitis Syndrome या चमकी बुखार या दिमागी बुखार – अलग-अलग नामों से
जाने जाने वाले इस सिंड्रोम ने 2012 में 120, 2013 में 39 और 2014 में 90
जान ले ली थी। इसके बाद 2015 में बिहार स्वास्थ्य विभाग और यूनीसेफ ने
मिलकर कुछ SOPs तय किए थे। यानी – Standard Operating Procedures.
SOPs के मुताबिक –
आशा
वर्कर्स, आंगनवाडी कर्मचारी, ऑक्ज़िलरी नर्स मिडवाइफ घर घर में जातीं और
जाँच करती कि बच्चों को तेज़ बुख़ार तो नहीं और ब्लड शुकर की मात्रा कम तो
नहीं है।
हर पंचायत में एक स्वास्थ्य केंद्र होता, जिसमें ब्लड शुगर जाँचने के लिए उपकरण और ORS के पर्याप्त पैकेट होना ज़रूरी है।
2015
में 11, 2016 – 04, 2017-11 और 2018-7 बच्चे Acute Encephalitis Syndrome
की वजह से मर गए। स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि इन SOPs ने
Acute Encephalitis Syndrome के कारण हो रही मौतों से निबटने में काफी मदद
की।
फर्सट्पोस्ट
की रिपोर्ट के मुताबिक इस साल उनको फॉलो नहीं किया गया। मुज़्जफरपुर की एक
आशा वर्कर ने बताया कि पिछले सालों में उन्हें डोर-टू-डोर विज़िट के आदेश
मिलते थे। लेकिन इस साल कोई ऐसा आदेश नहीं मिला। उन्होंने ये भी कहा कि
उन्हें न तो बल्ड शुगर जाँचने का उपकरण दिया गया न ही पर्याप्त मात्रा में
ORS के पैकेट।
ख़ैर,
ये मौतें क्यों हो रही हैं, इस पर कोई पुख़्ता जानकारी नहीं है। कोई कहता
है लीची के कारण। लेकिन अगर लीची ही एक कारण होती, तो हर साल होती। कुछ
रिसर्चर कहते हैं कि अत्यधिक नमी, गर्मी और साफ़-सफ़ाई भी Acute
Encephalitis Syndrome की एक वजह है। इस बार जितने भी केसेज़ अस्पतालों तक
पहुँचे उसमें से ज्यादातर बच्चे आर्थिक रूप से कमज़ोर परिवारों से थे।
ज्यादातर के अभिभावक निरक्षर थे। कुछ लोगों का मानना है कि रात को खाली पेट
सोने वाले बच्चों में शुगर लेवल की कमी भी इस सिंड्रोम का एक बड़ा कारण
है। बावजूद इन सबके सूबे के ज़मीनी स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के पास ORS के
पैकेट तक मौजूद नहीं हैं।
कभी
ऑक्सीजन की कमी से उत्तर प्रदेश में बच्चों की मौत तो लगभग हर साल चमकी
बुख़ार के कारण बच्चों की मौत – सरकारी और प्रशासनिक निर्लज्जता, कामचोरी
और नीति-नपुंसकता का प्रमाण हो सकता है।
Bishkek Summit: What is Shanghai Cooperation Organisation and why it is important for India. As PM Modi’s attends the SCO Summit in Bishkek, Kyrgyzstan, India-Pakistan ties have, to a certain degree, overshadowed the first multilateral visit of the Indian Prime Minister Narendra Modi.