CAB: India on its way to becoming a Hindu Pakistan!

CAB: हिंदू पाकिस्तान बनने की राह पर भारत!

“ये तो सीधे-सीधे असम में वोटबैंक की राजनीति करने के लिए और पूरे देश में हिंदुओं का मसीहा बनने के लिए इस देश के संविधान के साथ खिलवाड़ है।” United Against Hate के द्वारा NRC और CAB के विरोध में आयोजित एक कार्यक्रम में योगेंद्र यादव ने आगे बोला कि “सरकार की तरफ से कहते हैं कि ये बिल पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में अल्पसंख्यकों को बचाने के लिए है। मैं कहता हूँ कि बिल्कुल कीजिए। बेशक इन देशों में अल्पसंख्यकों के साथ अन्याय हुआ है लेकिन केवल हिंदुओं के साथ नहीं हुआ है। और लोगों के साथ भी अन्याय हुआ है।“

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क्या है बिल में?

संसद के दोनों सदनों, लोकसभा और राज्यसभा में CAB (नागरिकता संशोधन विधेयक) पास हो गया है। इस विधेयक के जरिए 64 वर्ष पूर्व के नागरिकता एक्ट में संशोधन किया गया। एक्ट के अनुसार बांग्लादेश, अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान से भारत आए हुए शरणार्थियों, जो ग़ैर मुस्लिम हैं को नागरिकता दी जाएगी। सरलीकरण के जरिए नागरिकता के लिए निश्चित 12 वर्ष की अवधि को घटाकर 6 वर्ष कर दिया गया है। इस बिल का असम में भारी विरोध हो रहा है। असम के लोग सड़कों पर हैं और राज्य में तनाव की स्थिति है।

क्या है पेंच?

सोशल मीडिया पर कहा जा रहा है कि घुसपैठियों की पहचान और उनके खिलाफ कार्यवाही ज़रूरी है। लेकिन असम में पहले NRC और उसके बाद CAB ये साबित करता है कि सरकार का उद्देश्य केवल घुसपैठियों की पहचान और उनके खिलाफ कार्यवाही नहीं बल्कि बहुसंख्यकों को ध्रुवीकृत करके सत्ता को सहेजे रखना है। एक्टिविस्ट उमर ख़ालिद कहते हैं कि “NRC की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हुई। 19 लाख लोग इस सूची में नहीं आ पाए। इनमें से ज्यादातर हिंदू थे। आँकड़े सरकार की अपेक्षा के अनुरूप नहीं होने की वजह से सरकार ने ऐलान किया कि असम में दोबारा NRC की सूची बनवाई जाएगी। इसके बाद CAB के जरिए सरकार खुलेतौर पर कह रही है कि जो मुसलमान नहीं हैं उनको नागरिकता दे दी जाएगी जबकि मुस्लिमों को घुसपैठिया क़रार दे दिया जाएगा, जो ख़तरनाक है।”

बिल की संवैधानिक वैधता

CAB की संवैधानिक वैधता भी सवालों के दायरे में है। संविधान का अनुच्छेद 14 कहता है कि राज्य, भारत के राज्यक्षेत्र में किसी व्यक्ति को कानून के समक्ष समता से या कानून के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा.’ 1954 के केदारनाथ बजौरिया बनाम स्टेट ऑफ वेस्ट बंगाल के केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 14 राज्य को समूहों के वर्गीकरण से नहीं रोकता, बशर्ते वह वर्गीकरण – 

  • उचित हो
  • तर्कसंगत उद्देश्यों की पूर्ति के लिए लक्षित हो
  • उसमें मनमानापन न हो।

CAB के जरिए जिस तर्कसंगत उद्देश्य पूर्ति का दावा अमित शाह कर रहे हैं, वह है – पड़ोसी देशों में जिन लोगों के साथ अन्याय हुआ है, अगर वो भारत में शरण चाहते हैं तो भारत उनको नागरिकता देगा। यह उद्देश्य भारत के मानवतावादी सिद्धांतों और विवेकानंद की शिक्षाओं से मेल खाता है लेकिन सरकार ने इस बिल में नागरिकता देने के लिए धर्म की शर्त रखी है। यह शर्त, इस तर्कसंगत उद्देश्य को सांप्रदायिक और राजनीति से प्रेरित बनाता है। जिसके कारण यह बिल तर्कसंगत उद्देश्यों की पूर्ति के लिए लक्षित नहीं रह जाता।

टू नेशन थ्योरी का समर्थन कैसे कर रहा है बिल?

अमित शाह ने लोकसभा में बिल पेश करते हुए कहा कि इसकी ज़रूरत इसलिए पड़ी क्योंकि कांग्रेस ने धर्म आधारित बँटवारा करवाया था। लेकिन गृहमंत्री भूल गए कि जिस टू नेशन थ्योरी के अनुसार देश बँटा उसके हिमायती RSS विचारक सावरकर थे। स्वराज इंडिया के प्रवक्ता अनुपम ने बताया, ”सिंध की असेंबली पहली असेंबली थी, जिसमें पाकिस्तान बनाने का औपचारिक संकल्प पेश हुआ। इस असेंबली में हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग के गठबंधन की सरकार थी। मुस्लिम लीग के चीफ थे ज़िन्ना औऱ हिंदू महासभा के चीफ़ थे सावरकर।”

NRC और CAB के बाद क्या?

NRC और CAB के बाद क्या? अनुपम कहते हैं कि “चलिए मान लेते हैं कि जो लोग NRC की सूची में नहीं आ पाते, सरकार उन्हें डिटेंशन सेंटर में डाल देगी। इन सेंटर्स में भी लोगों पर खर्च तो आएगा ही। मान लेते हैं वो खर्च 1000 रुपये प्रति माह है। केवल असम में 19 लाख लोग NRC की सूची में नहीं आ पाए। इन आंकड़ो को पूरे देश पर लागू किया जाए तो क्या सरकार देश के संपूर्ण आर्थिक बजट को NRC पर खर्च कर देगी?” उमर ख़ालिद कहते हैं कि “क्या सरकार समाज के एक बड़े तबके को saddistic pleasure के लिए उत्पीड़ित करना चाहती है?”

गाँधी और अंबेडकर के सिद्धांतों के खिलाफ है बिल

ये भी एक विडंबना है कि जिस विचारधारा को मानते हुए बीजेपी राजनीति करती रही है, उस विचारधारा को स्वीकार्य बिल पेश करते हुए भी उसका नाम गृहमंत्री नहीं ले पाए। NRC और CAB का विरोध कर रहे लोगों ने इसका कारण बताते हुए कहा कि, पता अमित शाह को भी है कि अहिंसा और प्यार का सिद्धांत भारत की मिट्टी में घुली हुई है। योगेंद्र यादव कहते हैं कि ”देश को हिदू-मुस्लिम में बाँटने की जो कोशिश है, उसके खिलाफ इस देश की मिट्टी है, उसके खिलाफ इस देश का संविधान है, उसके खिलाफ महात्मा गाँधी की विरासत है।”

मौजूदा सरकार के नेतृत्व में महात्मा गाँधी की इस विरासत को तोड़ने के काम प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर हो रहे हैं। विरोध कर रहे तारिक़ जमाल कहते हैं, “अनुच्छेद 370 को बिना किसी प्रासंगिक विमर्श के हटा देना, अप्रत्यक्ष तौर पर चुनावी राजनीति से मुस्लिमों का बहिष्कार, धर्म की आड़ में भीड़ द्वारा लोगों की हत्याओं पर सरकार की ख़ामोशी और देश के बहुसंख्यक समाज में अल्पसंख्यकों के खिलाफ पैदा किया जा रहा माहौल इन्हीं प्रयासों के तहत किए जा रहे हैं।” राजनैतिक/सामाजिक दलों के लोगों के द्वारा खुलेआम गाँधी के हत्यारे गोड्से का महिमामंडन और गाँधी के विरुद्ध टिप्पणियाँ इन्हीं प्रयासों के तहत हैं।

स्वराज इंडिया के अनुपम NRC और CAB को सामाजिक मुद्दों और पहलुओं से जोड़कर भी देखते हैं। वो कहते हैं, ”दिनोंदिन भुखमरी और गरीबी बढ़ रही है। बेरोज़गारी दर रोज़ नई ऊँचाई छू रही है। किसान परेशान हैं। इन असल मुद्दों को चर्चाओं से बाहर रखने के लिए सरकार CAB जैसा सांप्रदायिक कानून ला रही है। ये जानते हैं कि हिंदू औऱ मुस्लिमों में बढ़ता फ़ासला ही इनकी कुर्सी की ताकत को मजबूत करेगा।” आंदोलन में शामिल एक युवा कार्यकर्ता ने कहा कि बीजेपी सरकार की कार्यवाहियों को देखकर लगता है कि वो हर कीमत पर मुस्लिमों को दोयम दर्ज़े का नागरिक बनाकर रख देना चाहती है।

लोगों को करना होगा विरोध!

एक दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह भी है कि राजनैतिक विपक्ष उतनी मजबूती से सरकार की मुख़ालिफ़त नहीं कर पाया है। न तो उसमें सड़कों पर उतरने का हौसला दिखा न ही लोगों को इकट्ठा करने की क्षमता ही दिख पाई। इन हालातों में संघर्ष की पूरी ज़िम्मेदारी लोगों पर आ गई है। तमाम सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि लोगों को अपनी लड़ाई खुद लड़नी पड़ेगी। राजनैतिक अगुआ का इंतज़ार किए बग़ैर सड़कों पर संघर्ष का शंखनाद जल्दी से जल्दी करना होगा।

CAB यह तय करेगा कि हमारा देश गाँधी, बुद्ध और अंबेडकर के सिद्धांतों पर चलेगा या हिंदू पाकिस्तान बन जाएगा। CAB यह भी तय करेगा कि आज़ादी के 72 सालों बाद क्या गाँधी के सिद्धांत ज़िन्ना की ज़िद के आगे घुटने टेक देंगे।

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Why is there an uproar over Citizenship Amendment Bill?

Why is there an uproar over Citizenship Amendment Bill?

What actually is CAB, Citizenship Amendment Bill?  

The Citizenship Amendment Bill 2019, seeks to give citizenship rights to non-muslim refugees from Pakistan, Afghanistan and Bangladesh. The Bill seeks to amend the definition of illegal immigrants for Hindu, Sikh, Parsi, Buddhist and Christian immigrants from these three countries who have lived in India without documentation. 

The Bill has already been passed in Lower house of Parliament, though a lot of hue and cry was made by the opposition parties and social activists over its passage. If the bill is successfully passed in the Rajya Sabha, it will fast track the citizenship process as the duration will be reduced from 11 years to just six years. 

Debates over the introduction of this Bill are making rounds on social media as few say it is against the interest of the minority Muslim community. However, Bhartiya Janta Party is firm on its stand as it maintains that its part of the party manifesto.  

Does BJP have the required numbers for the successful passage of CAB in the Upper House?  

Based on the stand taken by various parties in Lok Sabha, it appears that the ruling party will have a narrow lead in Rajya Sabha. The parties which are likely to support BJP and their respective strength in the upper house goes like this: BJP (83), AIADMK (11), JD-U (6), SAD (3), AGP (1), BPF (1), LJP (1), PMK (1), RPI (1), Nominated (3), Independents (4).  

The sum totals to 115, which suggests BJP will secure the support of these political parties in the Rajya Sabha. 

With 5 seats lying vacant, the strength of the house is 240 and thus the halfway mark is 120.  

Parties opposing the Bill :  

UPA: Congress (46), DMK (5), IUML (1), Kerala Congress (1), NCP (4), RJD (4), MDMK (1), Nominated (1). Total: 63  

Non-UPA parties opposing the Bill: TMC (13), SP (9), TRS (6), CPM (5), CPI (1), BSP (4), AAP (3), PDP (2). Total: 43  

Thus, parties opposing the Bill have 106 MPs in the Rajya Sabha. Besides, two Independent MPs – MP Veerendra Kumar and Ritabrata Banerjee – are also more likely to go against the Bill. This takes the number of those opposing the Bill to 108, which is 12 less than the halfway mark.  

source: https://www.molitics.in/article/615/Why-is-there-an-uproar-over-Citizenship-Amendment-Bill

Onion price likely to fall over next few days

Onion price likely to fall over next few days

Onions remain the butt of jokes nationwide, the good news is that the onion prices have begun declining since Tuesday. The price sharply dropped in Coimbatore on Tuesday, as the wholesale price of onions was Rs 80 to Rs.90 per Kg, as against Rs.150 per Kg just four days back. In Wayanad, the price dropped to Rs.140 a kilo from Rs.155 on Monday.
Onion prices fell by Rs 5-15 per kg in the wholesale market till Monday.

As demand for the bulb has dropped and supplies are likely to increase further prices may come down further, said an APMC official. 
 
Reason for price rise 
Onion prices had soared to a record level in the last few days owing to the poor climatic conditions in key producing states of Maharashtra and Karnataka.

After the sudden upsurge in prices of onion, people had started making all sorts of funny jokes on social media platforms like Twitter, Facebook, Instagram and in our day to day conversations. Goan capital Panaji saw onions sold at Rs. 165, the highest rate in the country, whereas, the commodity was most affordable in Jhansi i..e Rs. 40 per Kg.  
 
What Nirmala Sitharaman said in Lok Sabha
Amidst all this, several politicians made irresponsible statements when they were asked about the soaring onion prices. Union Finance Minister Nirmala Sitharaman started making headlines again after she said she belongs to a family that doesn’t eat much onion and garlic. Just after this statement surfaced, #SayItLikeNirmalaTai started trending and a meme fest began on various social media platforms.  
 
Effective measures needed to deal with food inflation 
The rise in onion prices have left Indian citizens teary-eyed. With the rise in the unemployment rate, low GDP, surge in prices of essential commodities and a drop in GDP, one is forced to think if all is well with the Indian economy! Onion prices have toppled Governments in the past, it is high time that rather than diverting the issue of price rise, the BJP Govt undertakes effective measures to bring inflation under its control.

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Constitution and Democracy! Are we really following the boundaries?

Phases of Indo-Pak conflict over Kashmir Issue !

Amid the Chest Thumping Politics Over Odd-Even

source: https://www.molitics.in/article/616/onion-price-likely-to-fall-over-next-few-days

Constitution and Democracy! Are we really following the boundaries?

Constitution and Democracy! Are we really following the boundaries?

Democracy, a system which is adapted to give the power in the public’s hand by selecting their representatives amongst themselves and forming a governing body soothing their calls and needs. Opportunely, India is worldwide known as the ‘Biggest Democracy‘ of the world. But is it? While doubting the fact I have no questions on it being the ‘Biggest ‘ but my thoughts are forcing me to ponder over it’s functioning as a ‘Democracy’. As every Democracy has its Constitution which gives its citizens at least the fundamental rights irrespective of their caste, creed, religion, race or gender. No matter what kind of democracy a country works on, be it presidential or parliamentary, the power is in the ‘hands of the people’. 

But the recent reports of ‘World Press Freedom Index’ ranks India at 140 amongst 180 countries, which says it all about the suppression of the voice and brings the shame to the country by maligning the image of the ‘Biggest Democracy’.

Leaving the power in people’s hands means a strong follow up of basic human rights and other constitutional boundaries, analyzed through the eye lens of the ‘media’. Media is the voice of people and has the whole sole responsibility of analyzing the government’s steps with the eagle’s eye. Democracy may be very powerful in its terms and conditions but is not fully efficient in working without media, especially the free press. But this reality is a matter of threat for our country because the harsh reality hits hard targetting the authenticity of media roles and the appropriate implementation of fundamental rights in India. Though the Indian Constitution does not imply any term ‘Freedom of Press’ but it combines it with “Article 19(1)” i.e. Right to speech in the constitution, which enhances its importance as it protects the voice of every individual. 

The vigorous working of media is the effort that keeps the space for a constitution and maintains the difference between ‘Democracy’ and ‘Republic’. The World Press Freedom Index is not the only sign where we can notice this change. It is clearly visible the way people of J&K were house arrest, the way government is formed in Maharashtra or the way government has turned deaf ears towards the protests made by people over the closure of PMC Bank or Job losses. Moreover, there is a long-simmering crisis of credibility in the Indian news media, which was clearly seen in the distance Modi has created with media since his first tenure.

In J&K, removal of Article 370 was appreciable but the unconstitutional way the government had opted, has not only curbed the media’s rights but has added on to the feeling of indifference and insecurity in them. For the whole 2 months, the situation was no less than that of emergency 1984. Media powers were not curbed at once in the case but have been hindered since long by the government, either the channels are government favored or the journalists are censored for coming at the upfront level. Starting from abandoning Karan Thapar after Modi’s interview in 2007, to alienating Punya Prasun Bajpai for referencing PM Narendra Modi in his criticism of government policies during his prime-time show Masterstroke and Abhisar Sharma taken off air for 15 days after taking PM’s name on his show ‘Aaj Ki Badi Khabar’ in a shootout case in Uttar Pradesh’s Sultanpur district, there lies a series of such incidences. 

Such follow-ups seem to be abusive towards the ideology of Democracy and threatening in the case if we still think that we are the ‘Biggest Democracy’ in the world.

source: https://www.molitics.in/article/612/Democracy-Curbed-media-supression-of-fundamental-rights

Defecation in the tent, eating in the verandah; Story of CRPF jawans

तंबू में शौच, बरामदे में खाना; CRPF जवानों की कहानी

तंबू में शौच, बरामदे में खाना; CRPF जवानों की कहानी

महाराष्ट्र चुनावों की कहानी के शुरुआती अध्याय की इतिश्री लगभग हो चुकी है। झारखंड में शुरुआत होने वाली है। चुनावों के बेहतर संचालन के लिए सीआरपीएफ के जवानों को डिप्लॉय किया गया है। उसी सीआरपीएफ के जवान जिसको आजकल की राजनीति में खूब भुनाया जाता है। 

आतंकवादियों और नक्सलियों से भी कम ध्यान सुरक्षाकर्मियों के मानवाधिकार पर

मुमकिन है झारखंड चुनावों में भी जवानों के नाम का ट्रंप कार्ड चले। लेकिन झारखंड में जवानों की वास्तविक हालत क्या है, ये जाना जा सकता है मुख्य चुनाव आयुक्त को सीआरपीएफ कमांडेंट के द्वारा भेजी गई एक शिकायत से। कमांडेंट राहुल सोलंकी ने लिखा कि जवानों के मानवाधिकार को आतंकवादियों के मानवाधिकारों से भी कम गंभीरता से लिया जाता है।

राहुल सोलंकी ने चिट्ठी में आगे लिखा कि चुनावी ड्यूटी पर जिन जवानों की तैनाती हुई उनके रहने और खाने पीने का इंतज़ाम बेहद बुरा है। वो लिखते हैं कि अधिकारियों द्वारा जवानों के प्रति ऐसा रवैया उनकी गरिमा के साथ खिलवाड़ है। शिकायत के बाबत सीआरपीएफ के एक प्रवक्ता ने कहा कि बहुत सी चीज़े दुरुस्त की जा चुकी हैं। लेकिन द क्विंट के मुताबिक प्रवक्ता के दावे झूठे हैं।

प्लास्टिक और बाँस के तंबुओं में शौच को मजबूर हैं जवान

चुनावी ड्यूटी पर तैनात जवानों को एक स्कूल में ठहराया गया है। स्कूल में 600 छात्र-छात्राएँ पढ़ते हैं। लेकिन पूरे स्कूल में दो शौचालय हैं। ख़ैर सामान्य पुलिस ने रिज़र्व पुलिस बल का सहयोग किया और काली पॉलीथीन और बाँस के सहारे घेराबंदी करके अस्थायी टॉयलेट्स बनाए। कमांडेंट सोलंकी का कहना है कि प्रदेश भर में सीआरपीएफ के 3000 जवान तैनात हैं। ज्यादातर जवान इसी तरह के शौचालय का प्रयोग कर रहे हैं।

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Who looted the power workers in Uttar Pradesh ??

उत्तर प्रदेश में बिजली कर्मचारियों को किसने लूटा ??

उत्तर प्रदेश में बिजली कर्मचारियों को किसने लूटा ??

अगर 1 रूपया दिल्ली से निकलता है तो 15 पैसा गांव में पहुँचता है – भ्रष्टाचार किस कदर देश में फैल चुका है उसको समझाने के लिए ये शब्द थे हमारे पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के। 

इस भ्रष्टाचार का एक बार फिर सबूत मिला उत्तर प्रदेश में । और इस बार चर्चा का कारण बने बिजली कर्मचारी। दरअसल यहाँ पर करीब 45 हजार बिजली विभाग के कर्मचारियों ने अपने पीएफ के 2268 करोड़ रुपये निजी संस्था में फंस जाने के विरोध में 18  और 19  नवंबर को अपने कार्य का बहिष्कार किया।

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Who is at risk from the constitution?

किसे है संविधान से ख़तरा?

किसे है संविधान से ख़तरा?

चुने हुए प्रतिनिधियों को होटल की चाहरदीवारी में क़ैद करके रखे जाने का ट्रेंड लगभग स्थापित हो गया है। सरकार बनाने से पूर्व  खरीद-फ़रोख़्त को चाणक्यगिरी कहना नयी बुद्धिमत्ता हो गई है। संस्थानों का सरकार के हित में प्रयोग सामान्य समझा जाने लगा है। गवर्नर और प्रेसीडेंट की छवि पूरी तरह से कठपुतली वाली हो गई है।

दलित घोड़ी चढ़े – तो पिटाई। महिलाएँ अपनी मर्ज़ी से कपड़े पहनें – तो बवाल। विद्यार्थी शिक्षा के लिए आवाज़ उठाएँ – तो हो हल्ला। एक्टिविस्ट्स जन सरोकार के मुद्दों पर सरकार की आलोचना करें – तो शोर-शराबा। ये माहौल संविधान दिवस को अधिक प्रासंगिक बना रहा है।

संविधान का अनुच्छेद 15 कहता है कि धर्म, नस्ल, जाति, लिंग और जन्मस्थान के आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन वर्तमान राजनीति इन आधारों के साथ-साथ और बारीक आधार निकाल रही है विभाजन के लिए-बँटवारे के लिए।

बँटवाराअपनेचरमपर

पूर्वांचली, मराठा, गुजराती – जन्मस्थान के आधार पर इंसानों का वर्गीकरण आज़ादी के बाद अपने चरम पर है। हिंदुओं और मुस्लिमों का विभाजन बहुत पहले हो चुका था। ब्राह्मण अब दत्तात्रेय, गौड़ आदि-आदि में बँट गए, शूद्र, ज्यादा शूद्र और कम शूद्र हो गए हैं, ओबीसी वर्ग क्रीमी और नॉन क्रीमी लेयर में बँटे हुए हैं।

लोकतंत्रकेनामपरलोगोंकोबनायाजारहाहैगुलाम

इन सब बँटवारों को वोटबैंक नाम दिया जा रहा है। संविधान के दायरे में रहकर संविधान के तमाम अनुच्छेदों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं। लोकतंत्र के नाम पर लोगों को गुलाम बनाया जा रहा है।एक-दूसरे के नाम पर वोट हासिल करने वाली पार्टियाँ एक-दूसरे से लड़-भिड़ कर अलग हो जाती हैं। एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले लोग कुर्सी रानी के लिए हाथ मिलाने लगते हैं। इस दुश्मनी और दोस्ती में ठगे जा रहे हैं वोटर्स और अपमानित हो रही है संविधान की मूल भावना।

द टेलीग्राफ ने इस भावना के अपमान की कहानी अपने एक हेडलाइन We The Idiots के द्वारा बयान किया। संविधान का कवच होने के बावजूद लोग मूर्ख बनाए जा रहे हैं – सरेआम। 

लोगहाशिएपर

संविधान सभा द्वारा अंगीकृत किया गया संविधान लोगों को व्यवस्था का सिरमौर बनाने की भावना रखता है। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में लोगों के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों ने लोगों को इस व्यवस्था के हाशिए पर बिठा दाया है। हाशिए के अंदर नए हाशिए बनाए जा रहे हैं। लोगों के अंदर बँटवारे के नवीन बीज तलाशे जा रहे हैं।

एक तस्वीर तेज़ी से विकसित हो रही है – संविधान विरोधी ताकत बनाम संविधान की। लेकिन ये तस्वीर दिखे नहीं – इसके लिए एक संस्थान को दूसरे के खिलाफ खड़ा किया जा रहा है। आभासी तस्वीर खींची जा रही है पुलिस बनाम किसान, वकील बनाम पुलिस, या शिक्षक बनाम फोर्सेज़ आदि की।

संविधान एक सीमा तय करता है। सीमाएं स्वच्छंदता को रोकती हैं। पशु स्वच्छंदता चाहते हैं। राजनीति पाश्विक हो गई है। स्वाभाविक है आपके संवैधानिक हितों की रक्षा आपके तथाकथित प्रतिनिधि कभी नहीं करेंगे। आपकी जिम्मेदारी बस आपकी ही है।

source: https://www.molitics.in/article/609/constitution-is-at-stake-constitution-day-special

Democracy does not die today, the corpse has suffered a few more

लोकतंत्र आज नहीं मरी, लाश को कुछ लात और पड़े हैं

महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस द्वारा सीएम पद का शपथ लेने के साथ ही लोकतंत्र की हत्या के संदेश सोशल मीडिया पर तैरने लगे। असंवैधानिक, अलोकतांत्रिक और न जाने क्या-क्या विशेषण इस घटना को दिए जा रहे हैं।

लोकतंत्र की हत्या हुई कब?
लोकतंत्र की हत्या हुई। ये ख़बर अब आम हो गई है। इसलिए इस ख़बर के अन्य पहलुओं पर भी ध्यान देना ज़रूरी हो गया है। ख़बर सुनते ही मन में आना चाहिए कि हत्या हुई तो हुई पर हुई कब?

अब जब सवाल उठ ही गया तो अंदर तक गोता लगाना चाहिए। और अंदर तक गोता लगाने पर पता चलेगा कि लोकतंत्र की हत्या बहुत पहले ही हो चुकी थी। ये तो बर्फ़ के बीच रखी लोकतंत्र की लाश है जिसे देख-देख हम ख़ुश होते रहते हैं। 

कैसे हुई लोकतंत्र की हत्या?
जम्मू कश्मीर में भाजपा और पीडीपी, बिहर में राजद और जेडीयू, उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा – क्या ये गठबंधन ज़िंदा लोकतंत्र में स्वीकार्य होते? एक राज्य को केंद्र शासित प्रदेश में तोड़ देने पर विपक्ष की लगभग चुप्पी क्या ज़िंदा लोकतंत्र में स्वीकार्य होता। लाखों युवाओं की बेरोज़गारी, अर्थव्यवस्था की भयंकर हालत,  माइनॉरिटीज और दलितों के उपर लगातार बढ़ रहे हमलों पर विपक्ष का मौन क्या ज़िंदा लोकतंत्र का सूचक है? 

महाराष्ट्र में सबने मारे मृत लोकतंत्र को लात
ख़ैर, महाराष्ट्र पर लौटते हैं। शुक्रवार रात तक लगभग तय हो चुका था कि बेटे को सीएम बनाने की ज़िद पर अड़े उद्धव कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर खुद उस कुर्सी पर बैठ जाएंगे। लेकिन शनिवार सुबह नींद खुली तो ANI के ट्वीट ने बताया कि अजीत पवार के डिप्टी सीएम बनने के अलावा बाकी सब ख़बरें ग़लत निकली। देवेंद्र फडणवीस ने अजीत पवार के समर्थन से महाराष्ट्र की सत्ता फिर जीत ली।

रात में कुछ ऐसा हुआ कि तमाम बिस्तर इधर-उधर हो गए। कुछ ऐसा हुआ कि ट्विटर और फेसबुक पर लोकतंत्र की हत्या का ख़्याल रक़्स करने लगा। लेकिन इन सभी ख़्यालियों को सोचना चाहिए कि हत्या रोज़ हो रही है। हत्यारे बदल रहे हैं। BJP और शिवसेना का सरकार न बनाना, कांग्रेस और NCP का शिवसेना को समर्थन देने की बात ये सब मरी हुई लोकतंत्र को मारे गए लात ही थे।

इस बात पर बहस हो सकती है कि लोकतंत्र को ज्यादा बुरी तरह किसने मारा पर एक बात अकाट्य है कि मार सब रहे हैं। जब-जब एक जनप्रतिनिधि जन सरोकारों से मुंह मोड़ता है या जनभावनाओं को ठेंगा दिखाता है, तब-तब मरी हुई लोकतंत्र की एक और मौत की शुरुआत हो जाती है। जनता जब ऐसे प्रतिनिधियों से सवाल पूछने की जगह उन्हें पूजने लगती है- तब ये मौत मुक़म्मल हो जाती है।

 source: https://www.molitics.in/article/608/bjp-ncp-forms-government-in-maharastra

JNU – … finger is somewhere, but pointing somewhere

तो कौन ग़लत है –

  • फीस हाइक के विरोध में खड़े जेएनयू के छात्र या
  • उन छात्रों पर लाठीचार्ज़ करती पुलिस

अगर आपके पास सामान्य बौद्धिक क्षमता भी है तो आप लाठीचार्ज़ करती पुलिस को ग़लत मानेंगे। तर्कों में विश्वास कम है और बौद्धिकता को अलविदा कह चुके हैं तो छात्र भी ग़लत दिख सकते हैं।

पुलिस vs छात्रों की तस्वीर
एक तरफ़ डंडे बरसाती पुलिस और दूसरी तरफ नारे लगाती छात्रों की भीड़ – इस तस्वीर में समाज के दो धड़ों को एक दूसरे का दुश्मन दिखाया गया है। जो बिग बॉस इस पूरे खेल को चला रहा है वो यही चाहता है कि समाज इन दो धड़ों में बँटे। क्योंकि जितना बँटवारा होगा, समाज उतना ही कमज़ोर होता चला जाएगा। और समाज की कमज़ोरी ही बिग बॉस की ताकत बनेगी।

कैमरे पर बोलने से मना करने वाले कुछ पुलिसकर्मियों ने पहचान सुरक्षित रखने की शर्त पर बातचीत में स्वीकार किया है कि “सरकार और आला अधिकारी उनसे पाप करवा रही है।” एक पुलिसकर्मी ने कहा कि “बड़े-बड़े अधिकारी और नेता तो अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए विदेश भेज देते हैं या बड़ी-बड़ी प्राइवेट यूनीवर्सिटी में भेज देते हैं लेकिन हम जैसे ३०-३५ हज़ार कमाने वाले अपने बच्चों को कैसे पढ़ाएँ।”

पुलिस और छात्रों को दुश्मन के तौर पर दिखाता हुआ ये चित्र जानबूझ कर खींचा गया है। ताकि पुलिस के नाम पर भावनाओं को केंद्रीकृत किया जाए और विद्यार्थियों को विलेन साबित कर दिया जाए। पुलिस का विरोध करने वाले छात्रों को अराजक और कानून विरोधी बताकर इस छवि को मज़बूत किया जा सके।

निजीकरण की चौखट पर बेची जाएगी शिक्षा
बकौल वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण भारत पेट्रोलियम और एयर इंडिया मार्च 2020 तक बेचा जा चुका होगा। तेजस के साथ निजी रेल पटरी पर दौड़ने लगी है। बीएसएनएल और एमटीएनएल मृतप्राय हो गए हैं। सरकार की कार्यशैली से लगता है कि जो कुछ बेचा जा सकता है वो बेचा जाएगा – सरकार इस सिद्धांत पर काम कर रही है। शिक्षा सरकार की दृष्टि से एक बेचे जा सकने वाली सेवा है। अतः बेची जाएगी। भूलिए मत इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस के तहत ग्रीनफील्ड कैटेगरी में जियो यूनीवर्सिटी का नाम।

नए ब्रिटशर्स चाहते हैं शिक्षा में मैकाले नीति
मैकाले की शिक्षा नीति के बारे में ज़्यादातर लोगों ने पढ़ा-सुना होगा। ब्रिटिशर्स वह शिक्षा नीति इसलिए लाए ताकि भारतीयों को केवल क्लर्क बना कर छोड़ दिया जाए। पूँजीपति वर्ग के समर्थन से फली फूली सरकारें और पूंजीवादी व्यवस्था में विश्वास रखने वाले लोग आज के ब्रिटिशर्स हैं। जबकि ग़रीब, शोषित, वंचित आज के भारतीय। सो पूंजीवाद की हिमायती सरकार ग़रीबों को क्लर्क या उससे भी कहीं नीचे ही रखना चाहती है।

इसके लिए ज़रूरी है शिक्षा के अवसरों को वंचित वर्ग से दूर कर देना। यह तत्काल लिया जा सकने वाला फैसला नहीं है। इसके लिए माहौल बनाना पड़ेगा। ज़रूरतमंदों को विलेन साबित करना पड़ेगा। जिन्हें लगता है कि वो ज़रूरतमंद नहीं, उन्हें इस बात का यकीन दिलाया जाएगा ताकि ज़रूरतमंदों का विरोध समाज के बीच से ही हो। फूट डालो और राज करो की नीति पुरानी ज़रूर है लेकिन है बिल्कुल अचूक।

कुल मिलाकर –

“बड़े खेल की हैं बड़ी साज़िशें
है उंगली कहीं पर इशारा कहीं”

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source: https://www.molitics.in/article/604/reasons-behind-jnu-fees-hike-privatization

80,000 employees of BSNL apply for voluntary retirement

Nearly one lakh BSNL employees are eligible for the Voluntary Retirement Scheme (VRS) out of its total staff strength of about 1.50 lakh. BSNL has pegged its internal target for VRS at 80,000 employees, and the effective date of voluntary retirement under the present scheme is January 31, 2020.

source link: https://www.molitics.in/news/137120/80-000-employees-of-BSNL-apply-for-voluntary-retirement-